Allahabad High Court News: डीयू छात्रा आकृति चौधरी की रासुका निरुद्धि अवैध, हाई कोर्ट का तुरंत रिहाई और मुआवजे का निर्देश
Allahabad High Court: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने डीयू छात्रा आकृति चौधरी की रासुका निरुद्धि रद कर दी है और डीएम गौतमबुद्ध नगर के वेतन से 5 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया।
- NSA Detained DU Student Aakriti Chaudhary Release: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आकृति चौधरी पर लगा रासुका किया रद, DM की सैलरी से 5 लाख मुआवजा देने का आदेश
- इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: डीयू छात्रा आकृति चौधरी की रासुका निरुद्धि रद, कोर्ट ने कहा- डीएम के वेतन से दिया जाए 5 लाख रुपये मुआवजा
- इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा झटका: डीयू छात्रा आकृति चौधरी पर लगी रासुका रद, नोएडा-ग्रेटर नोएडा मजदूर आंदोलन से जुड़ा मामला
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण और कड़ा फैसला सुनाते हुए नोएडा और ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में हुए श्रमिक आंदोलन से जुड़ी दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा व सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी पर लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका/NSA) को अवैध करार देकर रद कर दिया है। 3 सितंबर 2026 को न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की दो सदस्यीय खंडपीठ ने आकृति चौधरी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए किसी अन्य मामले में वांछित न होने पर उन्हें तुरंत जेल से रिहा करने का आदेश जारी किया। इसके साथ ही, अदालत ने पुलिस व प्रशासन की इस कार्रवाई को आधारहीन मानते हुए याचिकाकर्ता को 5 लाख रुपये का आर्थिक मुआवजा देने का आदेश दिया है, जो गौतमबुद्ध नगर की जिलाधिकारी के वेतन से काटा जाएगा।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सामाजिक कार्यकर्ता और दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत की गई निरुद्धि को पूरी तरह से गैर-कानूनी और साक्ष्यों से परे माना है। अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार और जिला प्रशासन निरुद्धि के पक्ष में ऐसा कोई ठोस आधार या साक्ष्य पेश करने में नाकाम रहे जिससे सार्वजनिक व्यवस्था के बिगड़ने का स्पष्ट खतरा साबित हो सके।
अदालत ने मानवाधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संज्ञान लेते हुए न केवल निरुद्धि आदेश को निरस्त किया, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और शक्तियों के दुरुपयोग पर कड़ा रुख अपनाते हुए जिम्मेदार अधिकारी के वेतन से मुआवजा वसूलने का ऐतिहासिक निर्देश भी जारी किया।
यह मामला अप्रैल माह में नोएडा और ग्रेटर नोएडा के औद्योगिक क्षेत्र में वेतन वृद्धि की मांग को लेकर हुए एक व्यापक श्रमिक आंदोलन से जुड़ा हुआ है। 13 अप्रैल को हुए इस प्रदर्शन के दौरान क्षेत्र में हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आई थीं, जिससे सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हुई थी। पुलिस ने आरोप लगाया था कि आकृति चौधरी ने प्रदर्शनकारी मजदूरों को भड़काने, वॉट्सऐप ग्रुप्स के जरिए असंतोष फैलाने और हिंसा उकसाने में मुख्य भूमिका निभाई थी। इसके बाद स्थानीय प्रशासन ने उनके खिलाफ रासुका के तहत निरुद्धि की कार्रवाई की थी।
आकृति चौधरी ने इस निरुद्धि को इलाहाबाद हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के जरिए चुनौती दी। अदालत ने सुनवाई के दौरान केंद्र और राज्य सरकार से निरुद्धि के आधार, पुलिस कार्रवाई के समर्थन में एकत्र किए गए साक्ष्य, डिजिटल दस्तावेज और वॉट्सऐप चैट पेश करने को कहा था। पीठ ने यह भी पूछा कि एफआईआर दर्ज करने से पूर्व क्या कानून-व्यवस्था बनाए रखने या शांति भंग की आशंका के तहत कोई कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था। उपलब्ध कराई गई सामग्रियों की गहन जांच के बाद अदालत ने पाया कि लगाए गए आरोपों के समर्थन में पर्याप्त और प्रामाणिक साक्ष्य मौजूद नहीं थे।
हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद न्यायिक गलियारों और नागरिक अधिकार समूहों में हलचल तेज हो गई है। याचिकाकर्ता के अधिवक्ताओं ने अदालत के निर्णय का स्वागत करते हुए इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और विधि के शासन की जीत करार दिया है। उनका कहना है कि बिना पर्याप्त जांच और ठोस सबूतों के किसी भी नागरिक पर रासुका जैसे कठोर कानून का इस्तेमाल करना असंवैधानिक है।
वहीं, दूसरी ओर राज्य सरकार और जिला प्रशासन के विधिक प्रतिनिधियों ने फैसले की समीक्षा करने की बात कही है। प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि उच्च न्यायालय के विस्तृत आदेश का अध्ययन करने के उपरांत आगे के कानूनी विकल्पों पर विचार किया जाएगा।
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के दृष्टिकोण से अत्यंत दूरगामी प्रभाव रखने वाला माना जा रहा है। आमतौर पर निरुद्धि रद होने के मामलों में राज्य सरकार पर हर्जाना लगाया जाता है, परंतु किसी वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के व्यक्तिगत वेतन से मुआवजे की राशि वसूलने का आदेश अधिकारियों को अपनी शक्तियों का उपयोग पूरी जिम्मेदारी और निष्पक्षता से करने के लिए बाध्य करेगा।
इसके अतिरिक्त, यह फैसला नागरिक अधिकारों की सुरक्षा और आंदोलन करने की स्वतंत्रता के संतुलन को रेखांकित करता है। यह स्पष्ट संदेश देता है कि कठोर निवारक निरोध अधिनियमों का प्रयोग केवल अत्यंत असाधारण स्थितियों में ही होना चाहिए, न कि सामान्य विरोध प्रदर्शनों को दबाने के लिए।
उच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देश के बाद यदि आकृति चौधरी के खिलाफ कोई अन्य लंबित मामला नहीं है, तो उनकी तत्काल रिहाई की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। गौतमबुद्ध नगर जिला प्रशासन और राज्य का गृह विभाग न्यायालय के मुआवजे संबंधी आदेश के अनुपालन की दिशा में आवश्यक कागजी कार्रवाई करेगा।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से भविष्य में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) जैसे कड़े कानूनों के तहत की जाने वाली प्रशासनिक कार्यवाहियों पर कड़ी न्यायिक जांच का दबाव रहेगा और पुलिस जांच एजेंसियों को साक्ष्यों के संकलन में अधिक सतर्कता बरतनी होगी।
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