Bhagalpur Dharti Pakad Passes Away: इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले बिहार के 'धरती पकड़' नहीं रहे
Dharti Pakad Passed Away: पंचायत से राष्ट्रपति पद तक 280 चुनाव लड़ने वाले भागलपुर के चर्चित प्रत्याशी 'धरती पकड़' का निधन हो गया है। जानें उनका चुनावी सफर।
- Dharti Pakad Passed Away: पंचायत से राष्ट्रपति तक 280 चुनाव लड़ने वाले भागलपुर के 'धरती पकड़' का निधन, जानें उनकी अनोखी कहानी
- इंदिरा-राजीव से लेकर राष्ट्रपति चुनाव तक ठोकी ताल: भागलपुर के मशहूर 'धरती पकड़' का निधन, 280 बार लड़े थे चुनाव
- बिहार के चुनावी इतिहास का चर्चित नाम 'धरती पकड़' का भागलपुर में निधन, 280 बार लड़ा था चुनाव
भारतीय चुनावी राजनीति और लोकतंत्र के अनोखे इतिहास में दर्ज भागलपुर के मशहूर प्रत्याशी 'धरती पकड़' का 3 सितंबर 2026 को निधन हो गया है। ग्राम पंचायत चुनाव से लेकर देश के सर्वोच्च राष्ट्रपति पद तक 280 से अधिक बार चुनावी मैदान में उतरने वाले 'धरती पकड़' ने भारतीय लोकतांत्रिक प्रक्रिया में एक नया अध्याय लिखा था। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, राजीव गांधी जैसी कद्दावर हस्तियों के खिलाफ भी चुनाव लड़ने में कभी संकोच नहीं किया। भागलपुर स्थित उनके पैतृक निवास पर अंतिम सांस लेने के बाद स्थानीय लोगों और राजनीतिक विश्लेषकों ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। चुनावी मैदान में बिना हार की परवाह किए लगातार पर्चा दाखिल करने की उनकी इसी जिद ने उन्हें पूरे देश में 'धरती पकड़' के नाम से लोकप्रिय बना दिया था।
बिहार के भागलपुर जिले से ताल्लुक रखने वाले और देश के चुनावी इतिहास में अपनी अलग पहचान बनाने वाले निर्दलीय प्रत्याशी 'धरती पकड़' अब हमारे बीच नहीं रहे। पंचायत स्तर के वार्ड चुनाव से लेकर विधानसभा, लोकसभा और भारत के राष्ट्रपति पद के चुनाव तक 280 बार नामांकन दाखिल करने वाले 'धरती पकड़' का निधन हो गया है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी हार से बिना विचलित हुए हर चुनाव में खड़े होने का उनका जज्बा हमेशा से चर्चा का विषय रहा। उन्होंने देश के प्रधानमंत्री पद पर रहे शीर्ष नेताओं के खिलाफ भी बिना किसी झिझक के चुनाव लड़ा और हमेशा चुनावी प्रक्रिया में जनभागीदारी का संदेश दिया।
'धरती पकड़' का राजनीतिक सफर किसी सामान्य नेता जैसा नहीं था। वे राजनीतिक दलों के गणित और जीत-हार की गणितीय गणनाओं से दूर, चुनाव लड़ने की कला के प्रति समर्पित थे। उन्होंने दशकों तक लगातार हर उस चुनाव में अपना पर्चा भरा जहां आम नागरिक को चुनाव लड़ने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।
अपने लंबे चुनावी सफर के दौरान उन्होंने भारत के पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के खिलाफ भी चुनावी मुकाबले में दांव आजमाया। यही नहीं, उन्होंने देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद राष्ट्रपति चुनाव के लिए भी कई बार पर्चा दाखिल किया था। यद्यपि अधिकांश चुनाव में उनकी जमानत जब्त हो जाती थी, लेकिन हर नए चुनाव की अधिसूचना जारी होते ही वे पूरे उत्साह के साथ नामांकन फॉर्म खरीदने और कागजात तैयार करने में जुट जाते थे।
भागलपुर जिले के ग्रामीण और शहरी इलाकों में उन्हें एक बेहद अनोखे और उत्साही जनप्रत्याशी के रूप में जाना जाता था। हर चुनाव के समय मीडिया की सुर्खियां बनने वाले 'धरती पकड़' को स्थानीय जनता लोकतांत्रिक परंपराओं के एक जीवंत प्रतीक के तौर पर देखती थी।
'धरती पकड़' के निधन की खबर मिलते ही भागलपुर और बिहार के राजनीतिक गलियारों में शोक की लहर दौड़ गई। स्थानीय जनप्रतिनिधियों, वरिष्ठ पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उनके निधन पर संवेदना व्यक्त की है।
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि 'धरती पकड़' केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के उस पहलू के प्रतीक थे जो यह दर्शाता है कि एक आम नागरिक के लिए चुनावी दरवाजे हमेशा खुले हैं। भले ही वे कभी चुनाव नहीं जीत पाए, लेकिन उनके इस अनूठे जुनून और राजनीतिक निष्ठा की सराहना हमेशा की जाती रहेगी।
'धरती पकड़' का चुनावी इतिहास भारतीय लोकतंत्र की उस विविधता को सामने लाता है, जहां जीत-हार से परे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी ही सबसे बड़ा मूल्य मानी जाती है। उनकी इस जीवनशैली ने देश भर में कई उन निर्दलीय प्रत्याशियों को प्रेरित किया जो केवल चुनावी व्यवस्था में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए मैदान में उतरते हैं।
उनके निधन से भागलपुर ने एक ऐसा शख्सियत खो दिया है जो हर चुनाव के मौसम में चुनावी चौपालों, नामांकन स्थलों और राजनीतिक चर्चाओं का मुख्य केंद्र हुआ करता था। भारतीय चुनाव प्रणाली में लगातार सबसे ज्यादा चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों की सूची में उनका नाम हमेशा सम्मान के साथ दर्ज रहेगा।
'धरती पकड़' के अंतिम संस्कार में भागलपुर के अनेक गणमान्य लोग, स्थानीय नागरिक और राजनीतिक कार्यकर्ता शामिल होंगे। उनके इस अनूठे रिकॉर्ड और राजनीतिक सफर को लेकर आने वाले समय में चुनावी इतिहास पर शोध करने वाले अध्ययनकर्ताओं के बीच चर्चा बनी रहेगी।
निर्वाचन आयोग और भारतीय चुनावी अध्ययन के इतिहास में 'धरती पकड़' की यह अनवरत यात्रा हमेशा इस बात का उदाहरण रहेगी कि भारतीय लोकतंत्र अपने नागरिकों को अपनी आवाज और उम्मीदें प्रकट करने का कितना विस्तृत अवसर प्रदान करता है।
What's Your Reaction?







