Hijab Row: स्कूल में यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने की इजाजत नहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज की छात्रा की याचिका

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने की मांग वाली छात्रा की याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा कि ड्रेस कोड सभी पर समान रूप से लागू होता है।

Aug 25, 2026 - 19:30
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Hijab Row: स्कूल में यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने की इजाजत नहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज की छात्रा की याचिका
  • इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: स्कूल ड्रेस कोड से अलग हिजाब की मांग खारिज, जानिए कोर्ट ने क्या कहा
  • स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हिजाब की अनुमति नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज की मुस्लिम छात्रा की याचिका, दिया बड़ा फैसला
  • इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला: स्कूल में यूनिफॉर्म के साथ हिजाब की अनुमति नहीं, छात्रा की याचिका खारिज

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्कूल यूनिफॉर्म के साथ अतिरिक्त रूप से स्कार्फ या हिजाब पहनने की अनुमति मांगने वाली एक मुस्लिम छात्रा की याचिका को खारिज कर दिया है। न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि शैक्षणिक संस्थानों द्वारा निर्धारित ड्रेस कोड सभी विद्यार्थियों पर समान रूप से लागू होता है और इसका उद्देश्य अनुशासन, समानता तथा पंथनिरपेक्ष (धर्मनिरपेक्ष) माहौल बनाए रखना है। यह मामला प्रयागराज स्थित एक निजी स्कूल में 11वीं कक्षा में दाखिले और हिजाब पहनने को लेकर उपजे विवाद से जुड़ा था। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता यह साबित करने के लिए पर्याप्त कानूनी और तथ्यात्मक साक्ष्य पेश नहीं कर सकी कि यह प्रथा अनिवार्य धार्मिक हिस्सा है। इस निर्णय के बाद स्कूल के निर्धारित ड्रेस कोड का पालन करना अनिवार्य रहेगा। 

इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने प्रयागराज के अत्तरसुइया स्थित टैगोर पब्लिक स्कूल की एक नाबालिग छात्रा द्वारा दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्णय सुनाया है। छात्रा ने अपनी याचिका में मांग की थी कि उसे स्कूल के निर्धारित ड्रेस कोड के साथ अतिरिक्त रूप से स्कार्फ यानी हिजाब पहनकर कक्षाओं में उपस्थित होने और कक्षा 11 में दाखिला लेने की अनुमति दी जाए।

अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए रेखांकित किया कि जब तक किसी स्कूल का ड्रेस कोड निष्पक्ष, गैर-भेदभावपूर्ण और सभी विद्यार्थियों पर एक समान रूप से लागू होता है, तब तक संस्थागत अनुशासन और पहचान बनाए रखने के लिए प्रबंधन को अपना यूनिफॉर्म कोड लागू करने का पूरा अधिकार है। 

याचिकाकर्ता छात्रा का कहना था कि उसने संबंधित स्कूल से ही कक्षा 6 से 10 तक की पढ़ाई पूरी की है और इस दौरान वह स्कार्फ पहनकर स्कूल आती रही थी, जिस पर पूर्व में स्कूल की ओर से कोई आपत्ति नहीं जताई गई थी। जब उसने 10वीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उसी संस्थान में कक्षा 11 में प्रवेश लेना चाहा, तो स्कूल प्रबंधन ने स्पष्ट किया कि निर्धारित ड्रेस कोड में किसी भी प्रकार का संशोधन या अतिरिक्त परिधान पहनना स्कूल नियमों का उल्लंघन है और बिना यूनिफॉर्म नियमों के पालन के प्रवेश संभव नहीं होगा।

इसके उपरांत छात्रा की ओर से प्रशासनिक स्तर पर जिलाधिकारी और शिक्षा विभाग के अधिकारियों के समक्ष शिकायत दर्ज कराई गई। विभागीय सुनवाई के दौरान स्कूल प्रशासन ने अपना पक्ष रखते हुए बताया कि यह एक सह-शिक्षा (को-एड) संस्थान है, जहां सभी वर्गों और समुदायों के बच्चे पढ़ते हैं और सभी के लिए बिना किसी भेद के एक समान ड्रेस कोड लागू है। प्रशासनिक स्तर पर राहत न मिलने के बाद छात्रा ने अपनी मां के जरिए हाईकोर्ट का रुख किया और संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 25 के तहत अपने अधिकारों का हवाला दिया।

अदालत ने प्रस्तुत रिकॉर्ड और तस्वीरों का अवलोकन करने के बाद पाया कि स्कूल में उसी समुदाय की अन्य छात्राएं भी सामान्य ड्रेस कोड का पालन कर रही हैं। खंडपीठ ने कहा कि अतीत में यदि स्कूल ने आपत्ति नहीं की थी, तो उससे भविष्य के लिए कोई स्थायी विधिक अधिकार उत्पन्न नहीं हो जाता। कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिका में ऐसे कोई अकाट्य तथ्यात्मक आधार नहीं रखे गए जिससे यह साबित हो कि कक्षा के भीतर स्कार्फ पहनना धार्मिक अनिवार्यता का हिस्सा है। 

अदालत की इस व्यवस्था पर कानूनी विशेषज्ञों और शिक्षाविदों ने अपनी राय रखी है। विधिक जानकारों का मानना है कि हाईकोर्ट का यह फैसला शैक्षणिक संस्थानों में समानता और गैर-भेदभावपूर्ण नीतियों को मजबूती प्रदान करता है। स्कूल प्रशासन के अधिवक्ताओं ने तर्क दिया था कि व्यक्तिगत पसंद के आधार पर ड्रेस कोड में छूट देने से संस्था का अनुशासन और यूनिफॉर्म की मूल भावना प्रभावित होती है।

वहीं, याचिकाकर्ता पक्ष का कहना था कि स्कार्फ पहनना व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धार्मिक आस्था से जुड़ा विषय था, जिसे पूर्व में भी अनुमति मिलती रही थी। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि केवल आस्था का दावा करना संविधान के अनुच्छेद 25 का संरक्षण पाने के लिए पर्याप्त नहीं है, जब तक कि इसके पीछे पुख्ता वैधानिक और तथ्यात्मक आधार न हो। 

इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस आदेश का व्यापक प्रभाव राज्य भर के शैक्षणिक संस्थानों की प्रशासनिक व्यवस्था और ड्रेस कोड नीतियों पर पड़ेगा। इस फैसले से यह सिद्धांत फिर से स्थापित हुआ है कि शिक्षण संस्थानों में सभी विद्यार्थियों के बीच समानता का भाव जगाने और सामाजिक भेद समाप्त करने के लिए यूनिफॉर्म का एकसमान पालन जरूरी है।

निजी और सरकारी दोनों तरह के स्कूलों को अपने अनुशासनात्मक दिशानिर्देशों को निष्पक्ष तरीके से लागू करने में कानूनी स्पष्टता मिलेगी। साथ ही, यह फैसला कक्षाओं के भीतर पंथनिरपेक्ष और समतावादी वातावरण बनाए रखने के प्रयासों को भी बल देता है। 

हाईकोर्ट की खंडपीठ द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद अब संबंधित छात्रा को स्कूल में प्रवेश और अध्ययन जारी रखने के लिए निर्धारित यूनिफॉर्म कोड का पालन करना होगा।

यदि याचिकाकर्ता पक्ष हाईकोर्ट के इस आदेश से असंतुष्ट रहता है, तो उसके पास देश की शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर करने का कानूनी विकल्प खुला है। फिलहाल उत्तर प्रदेश के शैक्षणिक संस्थानों में निर्धारित ड्रेस कोड की अनिवार्यता को लेकर न्यायिक स्पष्टता बनी हुई है।

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