भाषा के आधार पर नहीं होगा अन्याय, ऑटो-टैक्सी चालक हमारे अपने: मराठी सिखाने के फैसले पर बोले देवेंद्र फडणवीस

महाराष्ट्र में ऑटो-टैक्सी चालकों को मराठी सिखाने के फैसले पर सीएम देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि भाषा के आधार पर किसी से अन्याय नहीं होगा, वे सब हमारे अपने हैं।

By INA News Desk
Aug 25, 2026 - 19:35
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भाषा के आधार पर नहीं होगा अन्याय, ऑटो-टैक्सी चालक हमारे अपने: मराठी सिखाने के फैसले पर बोले देवेंद्र फडणवीस
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए
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  • ऑटो-टैक्सी ड्राइवरों को मराठी सिखाने की पहल पर सीएम देवेंद्र फडणवीस का बयान, कही यह बड़ी बात
  • 'ये सब हमारे अपने लोग हैं': ऑटो-टैक्सी चालकों को मराठी सिखाने की योजना पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का बड़ा रुख
  • महाराष्ट्र: भाषा के आधार पर किसी से भेदभाव नहीं होगा, ऑटो-टैक्सी चालकों को मराठी सिखाने पर सीएम फडणवीस की दो टूक

महाराष्ट्र में ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों को स्थानीय भाषा मराठी सिखाने के प्रशासनिक प्रस्ताव और निर्णय पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने स्थिति स्पष्ट की है। मुंबई में पत्रकारों और जनसंवाद के दौरान उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भाषा के आधार पर राज्य में किसी भी नागरिक अथवा कामगार के साथ कोई अन्याय या भेदभाव नहीं होने दिया जाएगा। मुख्यमंत्री ने रेखांकित किया कि राज्य में आजीविका कमाने वाले सभी चालक हमारे अपने समाज का अभिन्न हिस्सा हैं। परिवहन विभाग द्वारा यात्रियों की सुविधा और बेहतर संवाद के उद्देश्य से शुरू की जाने वाली इस पहल को लेकर सरकार ने विश्वास दिलाया है कि इसका मकसद किसी पर दबाव बनाना नहीं, बल्कि सौहार्दपूर्ण संवाद को बढ़ावा देना है।

महाराष्ट्र सरकार के परिवहन विभाग और संबंधित नियामक संस्थाओं की ओर से राज्य में सार्वजनिक परिवहन सेवा से जुड़े चालकों, विशेष रूप से ऑटो-रिक्शा और कैब-टैक्सी चालकों को बुनियादी मराठी भाषा का प्रशिक्षण देने का विचार सामने आया है। इस पहल का मूल उद्देश्य यह बताया गया कि महानगरों और अन्य कस्बों में सफर करने वाले स्थानीय यात्रियों और चालकों के बीच दैनिक बातचीत सहज हो सके। हालांकि, इस तरह के प्रस्ताव सामने आने के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में यह चर्चा शुरू हो गई थी कि क्या गैर-मराठी भाषी चालकों पर इसे अनिवार्यता के रूप में थोपा जाएगा।

इन आशंकाओं और उठते सवालों के बीच राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने सार्वजनिक रूप से सरकार का रुख साफ किया है। उन्होंने दो टूक कहा कि इस योजना को किसी भी तरह के दबाव या दंडात्मक कदम के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। मुख्यमंत्री ने भरोसा दिलाया कि राज्य सरकार का दृष्टिकोण समावेशी है और भाषा के नाम पर किसी भी मेहनतकश व्यक्ति के अधिकारों या उसकी रोजी-रोटी पर कोई आंच नहीं आने दी जाएगी।

महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई, ठाणे, पुणे, नवी मुंबई और नागपुर जैसे बड़े औद्योगिक शहरों में उत्तर भारत, पूर्वी भारत और देश के अन्य हिस्सों से आए लाखों लोग परिवहन क्षेत्र में कार्यरत हैं। ऑटो और टैक्सी सेवाओं की रीढ़ माने जाने वाले इन चालकों में एक बड़ी तादाद उन लोगों की है, जिनकी मातृभाषा मराठी नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में स्थानीय भाषा के इस्तेमाल और प्रशासनिक कामकाज को लेकर समय-समय पर क्षेत्रीय दलों द्वारा मांगें उठाई जाती रही हैं।

यातायात को सुगम बनाने, पर्यटकों को सही जानकारी देने और दैनिक शिकायतों को कम करने के लिए प्रशासन ने एक ऐसा मॉड्यूल तैयार करने का प्रस्ताव रखा, जिससे अन्य राज्यों से आए चालक आम बोलचाल की मराठी के बुनियादी शब्द और वाक्य सीख सकें। इस प्रस्ताव के सार्वजनिक होते ही इसे लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जाने लगे थे। विपक्ष और विभिन्न श्रमिक संगठनों द्वारा यह सवाल उठाया जा रहा था कि क्या इस माध्यम से परमिट नवीनीकरण या लाइसेंसिंग में नई बाधाएं खड़ी की जाएंगी। इन्हीं अटकलों को विराम देते हुए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने स्पष्ट किया कि भाषा सीखने की व्यवस्था केवल सहयोग और सुविधा के लिए है, किसी पर जबरन नियम लागू करने के लिए नहीं।

मुख्यमंत्री के इस संतुलित बयान के बाद राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर व्यापक प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। सत्तापक्ष के नेताओं का कहना है कि सरकार का उद्देश्य स्थानीय संस्कृति और भाषा का सम्मान बनाए रखते हुए राज्य में काम करने वाले हर वर्ग के हितों की रक्षा करना है। मुख्यमंत्री का यह कहना कि 'ये सब हमारे अपने लोग हैं' इस बात का प्रमाण है कि सरकार राज्य के आर्थिक विकास में योगदान देने वाले सभी प्रवासियों को समान नागरिक मानती है।

दूसरी ओर, क्षेत्रीय अस्मिता से जुड़े मुद्दों पर मुखर रहने वाले संगठनों का मानना है कि जो लोग राज्य में वर्षों से रहकर रोजगार चला रहे हैं, उन्हें स्थानीय भाषा का प्राथमिक ज्ञान होना ही चाहिए ताकि जनसंपर्क सुचारू रहे। वहीं, ऑटो-रिक्शा और टैक्सी यूनियन के प्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री के आश्वासन का स्वागत किया है। यूनियनों का कहना है कि यदि सरकार चालकों के लिए भाषा सीखने की स्वैच्छिक और सरल कार्यशालाएं चलाती है तो इसमें किसी को आपत्ति नहीं होगी, बशर्ते इसे रोजगार छीनने या जुर्माना लगाने का साधन न बनाया जाए।

मुख्यमंत्री के इस बयान से मुंबई और उपनगरीय इलाकों में काम करने वाले लाखों गैर-मराठी ऑटो और टैक्सी चालकों में राहत की लहर देखी जा रही है। लंबे समय से भाषा को लेकर पैदा होने वाले राजनीतिक तनाव और क्षेत्रीय विवादों के कारण ड्राइवरों में अक्सर अनिश्चितता का माहौल बन जाता था। सरकार के इस सकारात्मक रुख से जहां एक तरफ सामाजिक सौहार्द मजबूत होगा, वहीं दूसरी तरफ अनावश्यक कानूनी और प्रशासनिक विवादों पर भी रोक लगेगी।

इस फैसले का सीधा असर सार्वजनिक परिवहन की कार्यप्रणाली पर भी सकारात्मक रूप से पड़ने की उम्मीद है। जब चालकों को यह भरोसा होगा कि प्रशासन उनके साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं कर रहा है, तो वे यात्रियों के साथ और अधिक सहजता एवं आत्मविश्वास से पेश आ सकेंगे। इसके साथ ही, स्थानीय भाषा सीखने की यह प्रक्रिया टकराव के बजाय आपसी समझ और सांस्कृतिक जुड़ाव का जरिया बनेगी।

राज्य सरकार की योजना के अनुसार, परिवहन विभाग अब इस प्रशिक्षण कार्यक्रम को अत्यंत सरल, व्यावहारिक और डिजिटल माध्यमों से जोड़ने की रूपरेखा तैयार करेगा। इसमें चालकों को मार्ग, दिशा, किराया और शिष्टाचार से जुड़े बुनियादी वाक्यों की जानकारी दी जाएगी ताकि वे दैनिक कामकाज में बिना किसी परेशानी के स्थानीय लोगों से संवाद कर सकें।

प्रशासन यह भी सुनिश्चित करेगा कि इस प्रशिक्षण को किसी भी तरह से अनिवार्य शर्त या कानूनी अड़चन न बनाया जाए। आने वाले दिनों में विभिन्न यूनियनों के साथ मिलकर जागरूकता शिविर आयोजित किए जा सकते हैं, जिससे समाज के सभी वर्गों के बीच तालमेल बेहतर हो सके और किसी भी तरह की भ्रांति को दूर किया जा सके।

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