Bela Estate Row: राहुल गांधी के बाद CJP के सौरव दास पहुंचे बेला एस्टेट, मुख्य चुनाव आयुक्त पर उठाए गंभीर सवाल
दिल्ली के बेला एस्टेट में राहुल गांधी के दौरे के बाद CJP के एक्टिविस्ट सौरव दास पहुंचे। उन्होंने विस्थापन और प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त पर गंभीर आरोप लगाए।
- Delhi Bela Estate News: बेला एस्टेट बेदखली मामले में गरमाई सियासत, सौरव दास ने CEC ज्ञानेश कुमार को लेकर लगाए आरोप
- Bela Estate Eviction Controversy: यमुना खादर में विस्थापन पर बढ़ा विवाद, राहुल गांधी के बाद एक्टिविस्ट सौरव दास ने किया दौरा
- बेला एस्टेट मामला: राहुल गांधी के दौरे के बाद सीजेपी की एंट्री, एक्टिविस्ट्स ने प्रशासन और चुनाव आयोग की भूमिका पर खड़े किए सवाल
नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के यमुना डूब क्षेत्र (खादर) स्थित बेला एस्टेट इलाके में प्रशासनिक बेदखली (Eviction Drive) को लेकर सियासी और सामाजिक हलचल तेज हो गई है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के औचक दौरे के बाद अब 'सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस' (CJP) से जुड़े प्रमुख खोजी पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट सौरव दास बेला एस्टेट पहुंचे। उन्होंने वहां प्रभावित परिवारों से मुलाकात कर उनकी समस्याएं सुनीं और विस्थापन की इस पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया तथा जमीन के आवंटन को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार की पूर्व भूमिका पर सवाल उठाते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं।
बेला एस्टेट में डीडीए और स्थानीय प्रशासन द्वारा की गई तोड़फोड़ की कार्रवाई के बाद से सैकड़ों परिवार खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं। राहुल गांधी के दौरे ने जहां इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक तूल दिया, वहीं सौरव दास के हस्तक्षेप ने इस मामले में प्रशासनिक फैसलों और सरकारी विभागों के पुराने आदेशों की वैधता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
- सौरव दास ने क्या आरोप लगाए?
सौरव दास ने बेला एस्टेट में संवाददाताओं और स्थानीय निवासियों से बातचीत करते हुए दावा किया कि यमुना डूब क्षेत्र की इस जमीन के नियमन, पर्यावरण संबंधी मंजूरियों और विस्थापन की पृष्ठभूमि में केंद्रीय शहरी विकास और गृह मंत्रालय के पुराने प्रशासनिक फैसलों का हाथ रहा है।
दास ने आरोप लगाया कि वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, जो पूर्व में केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में वरिष्ठ प्रशासनिक पदों पर रहे हैं, उनके कार्यकाल के दौरान लिए गए नीतिगत फैसलों की निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए। एक्टिविस्ट ने दावा किया कि नियमों को ताक पर रखकर दशकों से बसे लोगों को बिना किसी वैकल्पिक पुनर्वास योजना के उजाड़ा गया है। हालांकि, इन आरोपों पर संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों अथवा चुनाव आयोग की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है और इसे केवल एक्टिविस्ट द्वारा लगाए गए आरोपों के परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है।
- राहुल गांधी के दौरे से गरमाई थी सियासत
इससे पहले कांग्रेस सांसद और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी अचानक बेला एस्टेट पहुंचे थे। उन्होंने विस्थापित महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों से सीधे बात की थी।राहुल गांधी ने आरोप लगाया था कि गरीबों और झुग्गीवासियों के आशियानों को बिना कानूनी प्रक्रिया और पर्याप्त नोटिस के बुलडोजर से ढहाया जा रहा है। उन्होंने केंद्र सरकार और उपराज्यपाल (LG) प्रशासन की नीतियों की आलोचना करते हुए कहा था कि विकास के नाम पर कमजोर तबकों को हाशिए पर धकेला जा रहा है। राहुल गांधी के इस दौरे के बाद विपक्षी दलों ने भी विस्थापित परिवारों के पुनर्वास और मुआवजे की मांग को लेकर दिल्ली सरकार और केंद्र को घेरना शुरू कर दिया था।
- बेला एस्टेट का जमीनी विवाद क्या है?
यमुना नदी के किनारे स्थित बेला एस्टेट और आसपास का इलाका वर्षों से कानूनी और प्रशासनिक विवादों के केंद्र में रहा है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के यमुना खादर के सौंदर्यीकरण, बाढ़ क्षेत्र के संरक्षण और जैव-विविधता पार्क विकसित करने के निर्देशों के तहत दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) द्वारा अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाए जा रहे हैं।
दूसरी ओर, स्थानीय निवासियों का कहना है कि वे यहां 40 से 50 वर्षों से अधिक समय से निवास कर रहे हैं। उनके पास वैध पहचान पत्र, बिजली के बिल और मतदाता पहचान पत्र मौजूद हैं। अचानक की गई इस कार्रवाई से बच्चों की स्कूली शिक्षा, आजीविका और दैनिक जीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का तर्क है कि मास्टर प्लान और अदालती आदेशों के अनुपालन के नाम पर बिना किसी पुनर्वास व्यवस्था के घरों को गिराना मानवाधिकारों का उल्लंघन है।
- कानूनी और सामाजिक लड़ाई की तैयारी
नागरिक अधिकार संगठनों और एक्टिविस्ट्स ने घोषणा की है कि वे बेला एस्टेट के पीड़ितों के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे। इसके साथ ही, विस्थापन की पूरी प्रक्रिया, भूमि उपयोग परिवर्तन (Land Use Change) और संबंधित प्रशासनिक फैसलों से जुड़े दस्तावेजों को सूचना के अधिकार (RTI) के तहत सार्वजनिक करने की मांग की जा रही है।
एक तरफ जहां राजनीतिक दल इसे चुनावी और मानवाधिकार के मुद्दे के रूप में उठा रहे हैं, वहीं प्रशासनिक अमले का कहना है कि वे एनजीटी और अदालतों के वैध आदेशों के तहत ही नदी तटों को अतिक्रमण मुक्त कराने का अभियान चला रहे हैं। आने वाले दिनों में यह विवाद कानूनी और सियासी दोनों मोर्चों पर और अधिक गरमाने के आसार हैं।
What's Your Reaction?