Rahul Gandhi Mallikarjun Kharge Skip Independence Day: 80वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले के समारोह में नहीं दिखे राहुल गांधी और खरगे, जानें वजह

80वें स्वतंत्रता दिवस समारोह में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे लाल किले पर उपस्थित नहीं रहे। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

Aug 15, 2026 - 16:47
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Rahul Gandhi Mallikarjun Kharge Skip Independence Day: 80वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले के समारोह में नहीं दिखे राहुल गांधी और खरगे, जानें वजह
  • लाल किले के स्वतंत्रता दिवस समारोह से दूर रहे राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे, लगातार दूसरे साल गैरमौजूदगी पर सियासी चर्चा तेज
  • 80वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले में नहीं पहुंचे राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे: लगातार दूसरे साल समारोह से बनाई दूरी
  • Independence Day 2026: लाल किले के स्वतंत्रता दिवस समारोह में शामिल नहीं हुए राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे

देश के 80वें स्वतंत्रता दिवस के ऐतिहासिक अवसर पर दिल्ली स्थित लाल किले की प्राचीर से आयोजित मुख्य राष्ट्रीय समारोह में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे उपस्थित नहीं हुए। प्रधानमंत्री के राष्ट्र के नाम संबोधन और मुख्य ध्वजारोहण कार्यक्रम के दौरान वीआईपी दीर्घा में दोनों शीर्ष विपक्षी नेताओं की कुर्सियां खाली रहीं। यह लगातार दूसरा वर्ष है जब राहुल गांधी लाल किले के मुख्य स्वतंत्रता दिवस समारोह से दूर रहे हैं। राष्ट्रीय पर्व के इस औपचारिक मंच से शीर्ष विपक्षी नेतृत्व की गैरमौजूदगी ने देश के राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है, जिस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष की ओर से प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

15 अगस्त 2026 को देश की राजधानी नई दिल्ली स्थित ऐतिहासिक लाल किले पर आजादी की 80वीं वर्षगांठ का मुख्य राष्ट्रीय समारोह आयोजित हुआ। इस गरिमामय समारोह में केंद्रीय मंत्रिमंडल के सदस्य, विदेशी राजनयिक, सैन्य अधिकारी, न्यायपालिका के प्रतिनिधि और विभिन्न क्षेत्रों की प्रमुख हस्तियां उपस्थित थीं।

समारोह के दौरान वीवीआईपी इनक्लोजर में विपक्षी नेताओं के लिए निर्धारित सीटों पर राहुल गांधी और राज्यसभा में विपक्ष के नेता तथा कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की अनुपस्थिति स्पष्ट रूप से चर्चा का केंद्र बन गई। राष्ट्रीय पर्व के प्रोटोकॉल के अनुसार नेता प्रतिपक्ष और प्रमुख राष्ट्रीय दलों के अध्यक्षों को इस मुख्य आयोजन के लिए आधिकारिक आमंत्रण भेजा जाता है, किंतु दोनों वरिष्ठ नेता इस कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए।

लाल किले पर स्वतंत्रता दिवस समारोह की शुरुआत सुबह विधिवत सैन्य सम्मान और प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रीय ध्वज फहराने के साथ हुई। समारोह के सीधे प्रसारण और वहां मौजूद प्रतिनिधियों के बीच यह बात तेजी से सामने आई कि विपक्षी खेमे के दोनों शीर्ष चेहरे उपस्थित नहीं हैं।

कांग्रेस पार्टी के आंतरिक सूत्रों और पूर्व निर्धारित कार्यक्रमों के अनुसार, दोनों नेताओं ने पार्टी मुख्यालय (24 अकबर रोड) पर आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह में भाग लिया, जहां पार्टी स्तर पर ध्वजारोहण कार्यक्रम संपन्न हुआ। कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम में नेताओं ने तिरंगा फहराया और कार्यकर्ताओं को संबोधित किया। इससे पहले भी राष्ट्रीय दिवसों पर प्रोटोकॉल, बैठक व्यवस्था और पार्टी के समानांतर कार्यक्रमों के समय को लेकर पूर्व में चर्चाएं होती रही हैं, और इस वर्ष भी लाल किले के मुख्य कार्यक्रम के बजाय पार्टी कार्यालय में उपस्थिति दर्ज कराई गई।

सत्तारूढ़ दल के नेताओं और प्रवक्ताओं ने इस गैरमौजूदगी पर टिप्पणी करते हुए कहा कि स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व राजनीति और दलीय सीमाओं से ऊपर होते हैं। सत्ता पक्ष का कहना था कि लोकतंत्र में नेता प्रतिपक्ष का पद संवैधानिक गरिमा से जुड़ा है और ऐसे ऐतिहासिक अवसरों पर मुख्य राष्ट्रीय समारोह में भागीदारी से देश की लोकतांत्रिक एकजुटता का संदेश जाता है।

वहीं कांग्रेस पार्टी से जुड़े पदाधिकारियों का कहना है कि स्वतंत्रता दिवस का सम्मान हर भारतीय के दिल में है और पार्टी नेतृत्व ने इस अवसर पर विधिवत ध्वजारोहण कर स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को याद किया है। विपक्षी खेमे के अनुसार, राष्ट्रीय पर्व को किसी एक स्थान या औपचारिकता तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए और पार्टी अपने निर्धारित कार्यक्रमों के जरिए देश के कोने-कोने में स्वतंत्रता दिवस का उल्लास मना रही है।

राष्ट्रीय समारोहों में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच की दूरी का यह दृश्य देश के राजनीतिक माहौल की मौजूदा तल्खी को भी दर्शाता है। संसद के हालिया सत्रों में विभिन्न विधायी मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच बने गतिरोध के बाद राष्ट्रीय पर्व के मंच पर भी यह अलगाव राजनीतिक विश्लेषकों की नजरों से नहीं बच सका।

इस घटनाक्रम से राजनीतिक और सार्वजनिक विमर्श में संवैधानिक पदों पर आसीन नेताओं के राष्ट्रीय आयोजनों में अनिवार्य प्रोटोकॉल और परंपराओं के पालन को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है। नागरिक समाज के एक वर्ग का मानना है कि राष्ट्रीय एकता के प्रतीकों पर सभी दलों का एक मंच पर दिखना लोकतांत्रिक परिपक्वता को दर्शाता है।

स्वतंत्रता दिवस के आयोजनों के बाद अब राजनीतिक दलों का ध्यान आगामी विधायी प्राथमिकताओं और संगठनात्मक कार्यक्रमों पर केंद्रित होगा। दोनों पक्षों की ओर से जारी बयानबाजियों के बीच आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक बहसों का हिस्सा बना रह सकता है।

संसदीय परंपराओं और राष्ट्रीय समारोहों में सर्वदलीय सहभागिता को सुदृढ़ करने के लिए भविष्य में प्रोटोकॉल समन्वय को और बेहतर बनाने की आवश्यकता पर भी चर्चाएं हो सकती हैं, ताकि राष्ट्रीय महत्व के अवसरों पर पक्ष-विपक्ष की साझा उपस्थिति सुनिश्चित की जा सके।

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