Gomti Book Festival Day 3: गोमती पुस्तक महोत्सव के तीसरे दिन 1300 से अधिक बच्चों ने सीखी कामिशिबाई कला, शाम को कथक से सजी सांस्कृतिक संध्या

लखनऊ में आयोजित गोमती पुस्तक महोत्सव के तीसरे दिन 1300 विद्यार्थियों ने रचनात्मक कार्यशालाओं में भाग लिया। मानसिक शांति, महिला वित्तीय स्वावलंबन और कथक संध्या रही मुख्य आकर्षण।

By INA News Desk
Sep 15, 2026 - 00:29
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Gomti Book Festival Day 3: गोमती पुस्तक महोत्सव के तीसरे दिन 1300 से अधिक बच्चों ने सीखी कामिशिबाई कला, शाम को कथक से सजी सांस्कृतिक संध्या
  • लखनऊ पुस्तक मेला: 'मंकी माइंड' से 'मॉन्क माइंड' की यात्रा और महिला वित्तीय साक्षरता पर हुआ गहरा विमर्श, बिरजू महाराज कथक संस्थान ने बांधा समां
  • Gomti Book Festival 2026: चिल्ड्रन्स कॉर्नर में उमड़ा स्कूली बच्चों का उत्साह, राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय और माइंडफुलनेस सत्रों ने खींचा ध्यान
  • लखनऊ में साहित्योत्सव: आर्थिक स्वावलंबन और मानसिक शांति पर मंथन, गोमती पुस्तक
  • महोत्सव में तीसरे दिन राग मियाँ मल्हार की गूंज

राजधानी लखनऊ के लखनऊ विश्वविद्यालय स्थित स्पोर्ट्स ग्राउंड में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत (NBT) द्वारा आयोजित नौ दिवसीय ‘गोमती पुस्तक महोत्सव’ के पांचवें संस्करण का तीसरा दिन रचनात्मकता, वैचारिक विमर्श और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के नाम रहा। 12 से 20 सितंबर तक चलने वाले इस महोत्सव के तीसरे दिन चिल्ड्रन्स कॉर्नर विशेष गतिविधियों का केंद्र बना रहा, जहां नगर के विभिन्न विद्यालयों से पहुंचे 1,300 से अधिक छात्र-छात्राओं ने कहानी वाचन, व्यावहारिक माइंडफुलनेस, पर्यावरण कला और डिजिटल साक्षरता से जुड़े अभिनव सत्रों में अपनी भागीदारी दर्ज कराई।

सुबह के सत्र का शुभारंभ पारंपरिक जापानी शैली ‘कामिशिबाई’ (पेपर थिएटर) कहानी वाचन से हुआ। कहानीकार रंजीता सचदेवा ने सचित्र कार्डों और मॉड्यूलर लकड़ी के फ्रेम के माध्यम से बच्चों को दृश्य-श्रव्य कथा प्रस्तुति की इस प्राचीन विधा से परिचित कराया। बच्चों ने चित्रों के बदलते दृश्यों के साथ कहानी के नैतिक और सामाजिक संदेशों को समझा। इसके उपरांत संचार प्रशिक्षक एवं कहानीकार प्रियंका सागर के संचालन में ‘माइंडफुलनेस फॉर क्यूरियस माइंड्स’ कार्यशाला आयोजित की गई। इस सत्र में विद्यार्थियों को दैनिक जीवन में एकाग्रता बढ़ाने, भावनाओं को पहचानने तथा वर्तमान क्षण में सजग रहकर तनाव प्रबंधन के सरल अभ्यास सिखाए गए।

कचरे से कला और डिजिटल पठन संस्कृति का विस्तार

पर्यावरण संरक्षण के संदेश को रचनात्मक अभिव्यक्ति देते हुए ‘वेस्ट टू वंडर वर्कशॉप’ का आयोजन किया गया। शिल्पकार सुग्रीव विश्वकर्मा के निर्देशन में बच्चों ने अनुपयोगी और अपशिष्ट घरेलू सामग्रियों से कई सुरुचिपूर्ण हस्तशिल्प तैयार किए। इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य बाल मन में पुनर्चक्रण और सतत जीवनशैली के प्रति व्यावहारिक चेतना विकसित करना रहा।

पठन-पाठन की बदलती तकनीकों से विद्यार्थियों को जोड़ने के क्रम में केंद्र सरकार की डिजिटल पहल ‘राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय’ (ReP) पर एक विशेष उन्मुखीकरण सत्र संपन्न हुआ। सत्र में छात्र-छात्राओं को अवगत कराया गया कि इस डिजिटल मंच पर 23 भारतीय भाषाओं में 7,000 से अधिक गुणवत्तापूर्ण ई-पुस्तकें निःशुल्क उपलब्ध हैं, जिन्हें मोबाइल और कंप्यूटर पर आसानी से पढ़ा जा सकता है। सत्र के अंत में आयोजित सामान्य ज्ञान और पुस्तक आधारित प्रश्नोत्तरी में उत्कृष्ट उत्तर देने वाले प्रतिभागियों को राष्ट्रीय ई-पुस्तकालय से जुड़ी विशेष किट और उपहार सामग्री प्रदान की गई।

साहित्यिक विमर्श: मानसिक अनुशासन और ध्यान का मार्ग

महोत्सव के साहित्यिक मंच पर दोपहर के समय मानसिक स्वास्थ्य और जीवनशैली पर आधारित पुस्तक ‘लिविंग लाइक ए मॉन्क: ए जर्नी टू सॉल्व द माइंड’ पर केंद्रित एक संवाद सत्र हुआ। पुस्तक के लेखक अर्नव शुक्ला ने उपस्थित युवाओं और विद्यार्थियों से संवाद करते हुए आज की आपाधापी भरी जिंदगी में मानसिक शांति और आत्मअनुशासन के व्यावहारिक पहलुओं को साझा किया। सत्र का अकादमिक समन्वय राजाजीपुरम स्थित पं. दीनदयाल उपाध्याय राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. नेहा जैन ने किया।

संवाद के दौरान लेखक ने बताया कि आधुनिक डिजिटल युग में निरंतर सूचना प्रवाह के कारण मानव मस्तिष्क अक्सर असंतुलित और विचलित (मंकी माइंड) रहता है। इसे ध्यान, नियमित डायरी लेखन (जर्नलिंग), सकारात्मक दृष्टिकोण, आत्मचिंतन और अनुशासित दिनचर्या के जरिए एक शांत, एकाग्र और स्थिर चेतना (मॉन्क माइंड) में रूपांतरित किया जा सकता है। उन्होंने रेखांकित किया कि साधु या भिक्षु की तरह मानसिक संतुलन साधना किसी सांसारिक दायित्व से भागना नहीं, बल्कि दैनिक जीवन को बेहतर ढंग से जीने की सतत आंतरिक यात्रा है।

'अस्मिता का आर्थिक पक्ष': महिला वित्तीय आत्मनिर्भरता पर चर्चा

तीसरे दिन के दूसरे मुख्य साहित्यिक संवाद का विषय ‘अस्मिता का आर्थिक पक्ष’ रहा, जिसका संचालन डॉ. उमेशचन्द्र सिरसवारी ने किया। वित्तीय साक्षरता पर कार्य कर रहीं लेखिका आरती गुप्ता ने अपनी पुस्तक ‘आई एम माई ओन लक्ष्मी’ के आलोक में महिलाओं के आर्थिक अधिकारों और वित्तीय समझ पर विस्तृत विचार रखे।

सत्र में इस बिंदु को प्रमुखता से रेखांकित किया गया कि किसी भी महिला की वास्तविक सामाजिक अस्मिता और स्वतंत्रता तब तक अधूरी रहती है जब तक कि उसे आर्थिक निर्णयों में स्वायत्तता न मिले। उन्होंने कहा कि केवल नौकरी करना या आय अर्जित करना ही पर्याप्त नहीं है; आय के एक हिस्से की सही बचत, सुनियोजित निवेश, पारिवारिक वित्तीय चर्चाओं में बराबरी की भागीदारी और अपने नाम पर अचल संपत्ति का निर्माण महिलाओं को स्थायी सुरक्षा प्रदान करता है। परिचर्चा में पारिवारिक स्तर पर पुरुषों द्वारा महिलाओं को वित्तीय निर्णयों में बराबर साझीदार बनाए जाने की मानसिकता विकसित करने पर भी बल दिया गया।

सत्रों के औपचारिक समापन पर राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत के हिंदी संपादक डॉ. ललित किशोर मंडोरा ने न्यास की परंपरा के अनुरूप मंचस्थ अतिथियों का शाल और पुस्तकें भेंट कर अभिनंदन किया।

शाम को राग मियाँ मल्हार और कथक की मनमोहक प्रस्तुति

महोत्सव के तीसरे दिन की शाम शास्त्रीय कलाओं के सौंदर्य से सुशोभित रही। सांस्कृतिक संध्या के अंतर्गत बिरजू महाराज कथक संस्थान, लखनऊ के कलाकारों और प्रशिक्षुओं ने मंच संभाला। कार्यक्रम की विधिवत शुरुआत प्रथम पूज्य भगवान गणेश की भावपूर्ण वंदना से हुई।

इसके बाद शास्त्रीय एवं उप-शास्त्रीय संगीत के माध्यम से ऋतु-राग, भक्ति और ब्रज की लोक-सांस्कृतिक परंपरा को मंच पर उतारा गया। वर्षा ऋतु के शास्त्रीय स्वरूप को जीवंत करते हुए राग मियाँ मल्हार में निबद्ध बंदिश ‘बिजुरी चमके’ की गायन प्रस्तुति ने श्रोताओं को वर्षाकालीन सौंदर्य का अनुभव कराया।

कार्यक्रम के अंतिम चरण में कथक नृत्य का उत्कृष्ट प्रदर्शन देखने को मिला। तीनताल और राग मियाँ मल्हार पर आधारित पारंपरिक बंदिश ‘बरसन लागी रे बदरिया’ पर नृत्यांगनाओं ने भाव, गत-निकास और पैरों के द्रुत काम (तत्कार) से सभागार को तालियों की गूंज से भर दिया। लयकारी और नृत्यात्मक संतुलन के साथ प्रस्तुत किए गए इस कार्यक्रम ने तीसरे दिन के आयोजनों को स्मरणीय बना दिया।

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