Gomti Book Festival: लखनऊ विश्वविद्यालय में बोले तरनजीत सिंह संधू, राष्ट्र निर्माण के लिए डिग्री के साथ कौशल और तकनीकी समझ जरूरी
गोमती पुस्तक महोत्सव में पूर्व राजनयिक तरनजीत सिंह संधू ने युवाओं को कौशल विकास, तकनीकी समझ और राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरित किया। महोत्सव में एनबीटी की पुस्तकों का विमोचन भी हुआ।
लखनऊ। युवाओं के सर्वांगीण विकास के लिए केवल औपचारिक शैक्षणिक उपाधि पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके साथ व्यावहारिक कौशल, आधुनिक तकनीक का संतुलन और राष्ट्र निर्माण का दृढ़ संकल्प होना अनिवार्य है। लखनऊ विश्वविद्यालय परिसर में चल रहे गोमती पुस्तक महोत्सव के विशेष वैचारिक सत्र ‘कूटनीति से नेतृत्व तक-राष्ट्र सर्वोपरि’ के दौरान प्रतिष्ठित पूर्व राजनयिक सरदार तरनजीत सिंह संधू ने छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए यह विचार व्यक्त किए। उन्होंने स्पष्ट किया कि निरंतर बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारतीय युवाओं को भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप खुद को तैयार करना होगा।
कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत राष्ट्रगान और ‘वंदे मातरम्’ के सामूहिक गायन के साथ हुई। इस अवसर पर राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (एनबीटी), भारत के निदेशक युवराज मलिक ने मुख्य वक्ता सरदार तरनजीत सिंह संधू और लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर जयप्रकाश सैनी का पारंपरिक रूप से शॉल ओढ़ाकर तथा ज्ञान के प्रतीक स्वरूप पुस्तकें भेंट कर स्वागत किया। सत्र के आरंभ में संधू के तीन दशकों से अधिक के सार्वजनिक जीवन, कूटनीतिक योगदान और उपलब्धियों को रेखांकित करने वाली एक लघु वृत्तचित्र फिल्म भी विद्यार्थियों के समक्ष प्रदर्शित की गई।
विदेश सेवा के अनुभवों से युवाओं को मिली सीख
भारतीय विदेश सेवा (IFS) में अपने 36 वर्षों के लंबे और विविधतापूर्ण अनुभव का उल्लेख करते हुए सरदार तरनजीत सिंह संधू ने विद्यार्थियों से सीधा संवाद स्थापित किया। उन्होंने कहा कि आज का भारत एक अभूतपूर्व जनसांख्यिकीय लाभांश (डेमोग्राफिक डिविडेंड) के दौर से गुजर रहा है। देश की विशाल युवा आबादी उसकी सबसे बड़ी प्रतिस्पर्धी पूंजी है, लेकिन इस क्षमता का वास्तविक लाभ तभी मिल सकता है जब युवाओं को सही दिशा, उचित मार्गदर्शन और आधुनिक अवसरों से जोड़ा जाए।
उन्होंने विद्यार्थियों को सचेत करते हुए कहा कि वर्तमान दौर में केवल कॉलेज या विश्वविद्यालय की डिग्री हासिल कर लेना सफलता की अंतिम गारंटी नहीं है। वैश्विक अर्थव्यवस्था और उद्योग जगत तेजी से रूपांतरित हो रहे हैं। ऐसे में उद्योग की मांग और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप व्यावहारिक कौशल सीखना प्रत्येक युवा की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। असफलता से घबराने के बजाय उससे सबक लेकर लगातार आगे बढ़ते रहने की मानसिकता ही व्यक्ति को सक्षम नेतृत्वकर्ता बनाती है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और तकनीकी संतुलन पर जोर
सत्र के दौरान आधुनिक युग की सबसे प्रभावशाली तकनीक यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) पर विशेष चर्चा हुई। संधू ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि एआई और डिजिटल टूल्स का प्रयोग समय की मांग है, लेकिन युवाओं को इसका इस्तेमाल बेहद विवेकपूर्ण और सतर्क होकर करना चाहिए। तकनीक मानव सोच, मौलिक विश्लेषण और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता का विकल्प कभी नहीं बन सकती। मशीनों पर अति-निर्भरता बौद्धिक सक्रियता को सीमित कर सकती है, इसलिए तकनीक को केवल सहायक उपकरण के रूप में देखा जाना चाहिए।
इसके साथ ही उन्होंने छात्रों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के संतुलन के लिए खेलकूद की गतिविधियों से नियमित जुड़ने का आह्वान किया। उन्होंने रेखांकित किया कि खेल के मैदान से सीखी गई टीम भावना, सहयोग और अनुशासन जीवन के हर पेशेवर क्षेत्र में नेतृत्व क्षमता को मजबूत करते हैं।
ऐतिहासिक व्यक्तित्वों और साहित्य से प्रेरणा लेने का आह्वान
युवाओं के बौद्धिक विकास में साहित्य और इतिहास की भूमिका को रेखांकित करते हुए संधू ने सरदार तेजा सिंह समुंदरी के संघर्षपूर्ण जीवन और समाज निर्माण में उनके योगदान का विशेष संदर्भ दिया। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि वे भारतीय इतिहास के ऐसे त्यागी और प्रेरणादायी व्यक्तित्वों की जीवनियों का गहन अध्ययन करें।
उन्होंने हिंदी साहित्य के मूर्धन्य रचनाकारों मुंशी प्रेमचंद और भगवती चरण वर्मा के योगदान को याद करते हुए कहा कि आधुनिक तकनीकी ज्ञान जितना आवश्यक है, उतना ही जरूरी अपनी जड़ों, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और शाश्वत मानवीय मूल्यों से जुड़ाव बनाए रखना भी है। साहित्य व्यक्ति को समाज की वास्तविक संवेदनाओं से जोड़ता है और संवेदनशीलता ही एक अच्छे नेतृत्वकर्ता की पहचान होती है।
तीन महत्वपूर्ण कृतियों का लोकार्पण
गोमती पुस्तक महोत्सव के इस मंच से राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (NBT) द्वारा प्रकाशित तीन नवीन पुस्तकों का औपचारिक अनावरण किया गया। इनमें ‘तमिल कहानियाँ (पंजाबी अनुवाद)’, महान सिख सेनापति पर आधारित पुस्तक ‘हरि सिंह नलवा’ और पंजाबी भाषा की कृति ‘वीह विस्वे’ शामिल रहीं।
पुस्तक लोकार्पण के पश्चात आयोजन में उल्लेखनीय योगदान देने वाले शिक्षाविदों और आयोजकों का सम्मान किया गया। इनमें चंद्र प्रकाश, प्रोफेसर रोली मिश्रा और सुश्री सांत्वना तिवारी को उनके विशेष सहयोग के लिए मंच से सम्मानित किया गया। साथ ही महोत्सव के तहत आयोजित विभिन्न अकादमिक और साहित्यिक प्रतियोगिताओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को भी मंच पर आमंत्रित कर पुरस्कृत किया गया।
किशोर साहित्य की बदलती दिशा पर मंथन
मुख्य व्याख्यान के अलावा महोत्सव परिसर में विभिन्न विषयों पर समानांतर बौद्धिक सत्रों का सिलसिला जारी रहा। ‘किशोर मन और साहित्य : नए पाठकों की, नई दुनिया’ विषयक विशेष संगोष्ठी में विषय विशेषज्ञों ने विस्तार से अपने विचार रखे। इस सत्र में डॉ. अमिता दुबे, डॉ. कुमकुम शर्मा और प्रख्यात साहित्यकार प्रोफेसर सूर्य प्रसाद दीक्षित ने वक्ता के रूप में सहभागिता की, जबकि सत्र का संचालन अरुण सिंह द्वारा किया गया।
विशेषज्ञों ने माना कि डिजिटल युग में किशोरों की पढ़ने की आदतें और उनकी पसंद तेजी से बदल रही हैं। आज का नया पाठक केवल पारंपरिक उपदेशात्मक शैली को स्वीकार नहीं करता, बल्कि वह तार्किकता, समकालीन विषयों और मनोवैज्ञानिक द्वंद्वों को छूने वाले साहित्य की तलाश में है। इसलिए लेखकों और प्रकाशकों को किशोरों की इस बदलती मानसिक दुनिया और वैश्विक रुझानों को समझकर नए साहित्य का सृजन करना होगा।
युवाओं के लिए बुनियादी वित्तीय साक्षरता कार्यशाला
विश्वविद्यालय के छात्रों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और जागरूक बनाने के उद्देश्य से वित्तीय साक्षरता पर एक व्यावहारिक सत्र भी आयोजित किया गया। इस सत्र में विशेषज्ञ वक्ता के रूप में संजीव त्रिपाठी, विशाल आर्या और श्रुति शर्मा ने विद्यार्थियों को धन प्रबंधन और सुरक्षित निवेश के मूल सिद्धांतों से अवगत कराया।
विशेषज्ञों ने इक्विटी मार्केट, डेट इंस्ट्रूमेंट्स, हाइब्रिड फंड, म्यूचुअल फंड्स और सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) की तकनीकी बारीकियों को आसान भाषा में समझाया। इसके अलावा नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (NSDL) की कार्यप्रणाली और डीमैट खातों की सुरक्षा पर रोशनी डाली गई। वक्ताओं ने युवाओं को यह महत्वपूर्ण सलाह दी कि किसी भी आकर्षक स्कीम या निवेश योजना में पैसा लगाने से पहले अपनी जोखिम क्षमता का आकलन करें और संबंधित संस्था या मध्यस्थ के कानूनी पंजीकरण (SEBI/RBI अप्रूवल) की भली-भांति जांच अवश्य करें।
संगीत और साहित्य के संगम से सजी शाम
गंभीर वैचारिक विमर्शों के बाद महोत्सव की संध्या सांस्कृतिक और संगीतमय प्रस्तुतियों से जीवंत हो उठी। सांस्कृतिक सत्र की शुरुआत प्रख्यात गजल गायक मिथिलेश लखनवी की मखमली आवाज के साथ हुई। उन्होंने दर्शकों और विद्यार्थियों की मांग पर कई लोकप्रिय प्रस्तुतियां दीं। विशेष रूप से ‘चौदहवीं का चांद’ और प्रसिद्ध सूफी रचना ‘दमादम मस्त कलंदर’ की प्रस्तुति ने पूरे सभागार को झूमने पर मजबूर कर दिया।
मिथिलेश लखनवी के साथ मंच पर तबले पर रत्नेश मिश्रा, गिटार पर राकेश आर्या, कीबोर्ड पर रिंकू राज और ऑक्टोपैड पर विकास कुमार ने उत्कृष्ट वादन संगति दी। शास्त्रीय और सूफियाना रंग के बाद पॉप गायिका नैना लायल ने मंच संभाला। उन्होंने अपने अनूठे गायन अंदाज और ऊर्जावान प्रस्तुति से समां बांध दिया। आधुनिक पॉप और सूफी शैली के फ्यूजन गीतों पर उपस्थित श्रोताओं ने तालियों की गड़गड़ाहट से कलाकारों का उत्साहवर्धन किया।
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