धार्मिक बयानों को फतवा बताना गलत: मौलाना इसहाक गोरा बोले- मीडिया रखे सावधानी, भ्रम न फैलाएं
देवबंद के मौलाना इसहाक गोरा ने कहा कि हर धार्मिक बयान फतवा नहीं होता। उन्होंने सारा अली खान और उमर अब्दुल्ला के मामलों पर मीडिया से सावधानी बरतने की अपील की।
देवबंद में धार्मिक विषयों पर आने वाली टिप्पणियों को बिना संदर्भ और वास्तविकता समझे फतवे के तौर पर प्रसारित करने की प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त की गई है। इस्लामी विद्वानों का कहना है कि फतवा एक अत्यंत गंभीर और विधिक धार्मिक व्यवस्था है, जिसे किसी भी व्यक्ति के निजी वक्तव्य अथवा सामान्य टिप्पणी से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। ऐसा करने से आम जनमानस में अनावश्यक भ्रम और गलतफहमी उत्पन्न होती है।
जमीयत दावतुल मुस्लिमीन के संरक्षक मौलाना कारी इसहाक गोरा ने कहा कि हाल के दिनों में अभिनेत्री सारा अली खान के मंदिर दर्शन और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के विवाह से जुड़े मामलों में बरेली के मुफ्ती शहाबुद्दीन रिजवी के बयानों को कई संचार माध्यमों द्वारा फतवे के रूप में प्रचारित किया गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के निजी विचार और विधिपूर्वक जारी किए गए शरई फतवे के स्वरूप व प्रभाव में जमीन-आसमान का अंतर होता है।
उन्होंने कहा कि फतवा जारी करने के लिए धार्मिक विधिशास्त्र, सामाजिक परिस्थितियों और सिद्धांतों की गहन समझ व प्रामाणिक ज्ञान की आवश्यकता होती है। केवल किसी धार्मिक व्यक्ति की वेशभूषा देखकर उसके हर वक्तव्य को फतवे का नाम दे देना पत्रकारिता और सामाजिक दृष्टि से उचित नहीं है। इस तरह के अतिशयोक्तिपूर्ण प्रचार से न केवल समाज में भ्रांतियां जन्म लेती हैं, बल्कि गंभीर मुद्दों पर मार्गदर्शन देने वाले विद्वानों की साख और महत्व पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
मौलाना ने संचार माध्यमों से आग्रह किया कि संवेदनशील और धार्मिक विषयों की प्रस्तुति में पूरी सावधानी और निष्पक्षता बरती जाए। किसी भी बयान को सनसनीखेज बनाने के बजाय उसके वास्तविक संदर्भ और स्वरूप के अनुसार ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए, जिससे समाज में सही जानकारी पहुंचे और शांति व सौहार्द का वातावरण बना रहे।
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