Asian Games 2026: सर्वेश अनिल कुशारे ने रचा इतिहास, 56 साल बाद भारत को पुरुषों की हाई जंप में दिलाया सिल्वर मेडल
एशियन गेम्स 2026 में सर्वेश अनिल कुशारे ने पुरुषों की ऊंची कूद (हाई जंप) में 2.25 मीटर की छलांग लगाकर सिल्वर मेडल जीता और भारत का 56 साल का लंबा इंतजार खत्म किया।
भारतीय एथलेटिक्स के इतिहास में रविवार 27 सितंबर 2026 का दिन एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज हो गया। जापान के आइची-नागोया में आयोजित हो रहे एशियन गेम्स 2026 के रोमांचक मुकाबलों के बीच भारतीय हाई जम्पर सर्वेश अनिल कुशारे ने पुरुषों की ऊंची कूद स्पर्धा में ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए रजत पदक (सिल्वर मेडल) अपने नाम कर लिया। लगातार हो रही तेज बारिश और फिसलन भरे ट्रैक की कठिन चुनौतियों के बावजूद 31 वर्षीय सर्वेश ने 2.25 मीटर की शानदार छलांग लगाकर पोडियम पर दूसरा स्थान हासिल किया। इस ऐतिहासिक पदक के साथ ही एशियन गेम्स के पुरुषों के हाई जंप इवेंट में भारत का 56 साल का लंबा पदक सूखा आखिरकार समाप्त हो गया।
इससे पहले एशियाई खेलों के पुरुषों के हाई जंप में भारत को आखिरी पदक वर्ष 1970 के बैंकॉक एशियन गेम्स में मिला था, जब भीम सिंह ने 2.03 मीटर की छलांग लगाकर कांस्य पदक (ब्रॉन्ज मेडल) जीता था। उसके बाद से साढ़े पांच दशकों से अधिक समय तक कोई भी भारतीय पुरुष एथलीट इस स्पर्धा में पदक तालिका तक नहीं पहुंच सका था। सर्वेश कुशारे की इस रजत उपलब्धि ने देश के खेल प्रेमियों को झूमने का अवसर दे दिया है।
काउंटबैक के रोमांच में चूके गोल्ड, बारिश के बीच दिखाया गजब का संयम
नागोया के स्टेडियम में जब पुरुषों का हाई जंप फाइनल शुरू हुआ, तब तेज बारिश हो रही थी। गीले ट्रैक और हवा के दबाव के कारण जम्पर्स को रन-अप लेने और टेक-ऑफ करने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। भारतीय सेना के 101 फील्ड रेजिमेंट में नायब सूबेदार के पद पर तैनात सर्वेश ने इस दबाव भरे माहौल में अपने गजब के मानसिक संयम और तकनीकी अनुशासन का परिचय दिया।
सर्वेश ने 2.22 मीटर तक की सभी ऊंचाइयों को अपने पहले ही प्रयास में बेहद आसानी से पार कर लिया। इसके बाद उन्होंने निर्णायक 2.25 मीटर की ऊंचाई को अपने दूसरे प्रयास में सफलतापूर्वक क्लीयर किया। चीनी ताइपे (ताइवान) के एथलीट फू चाओ-ह्सुआन ने भी 2.25 मीटर की समान ऊंचाई पार की। हालांकि, पूर्ववर्ती प्रयासों में कम फाउल होने के कारण 'काउंटबैक' के आधार पर स्वर्ण पदक फू चाओ-ह्सुआन की झोली में चला गया और सर्वेश को सिल्वर मेडल से संतोष करना पड़ा। वहीं टोक्यो ओलंपिक के फाइनलिस्ट और दक्षिण कोरिया के दिग्गज जम्पर वू सांग-ह्योक 2.22 मीटर के साथ तीसरे स्थान पर रहे और उन्हें कांस्य पदक मिला।
मकई के कचरे और रुई के गद्दों से शुरू हुआ था सफर
सर्वेश अनिल कुशारे की यह ऐतिहासिक सफलता किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। महाराष्ट्र के नासिक जिले के देवड़गांव (Devargaon) के एक साधारण प्याज किसान परिवार में 17 जून 1995 को जन्मे सर्वेश के पास शुरुआत में अभ्यास के लिए कोई आधुनिक संसाधन या लैंडिंग मैट नहीं थे। उनके पिता—जो उनके शुरुआती कोच भी थे—खेतों से मकई के सूखे छिलके, कपास (रुई) और कृषि अपशिष्ट जमा करके कूदने के लिए कच्चा गड्ढा तैयार करते थे।
मिट्टी और धूल से भरी उस जमीन से शुरू हुआ सफर आज विश्वस्तरीय सिंथेटिक ट्रैक तक पहुंचा है। साल 2016 में भारतीय सेना में शामिल होने के बाद सर्वेश को उच्च स्तरीय प्रशिक्षण और अनुशासन मिला, जिसने उनके खेल को नया जीवन दिया। पिछले दो सत्रों से वे निरंतर अपने प्रदर्शन में सुधार कर रहे हैं।
2026 का ऐतिहासिक सत्र: 2.31 मीटर का नेशनल रिकॉर्ड और दोहरे पदक
वर्ष 2026 सर्वेश कुशारे के खेल जीवन का सबसे स्वर्णिम वर्ष साबित हुआ है। इसी वर्ष भुवनेश्वर में आयोजित नेशनल इंटर-स्टेट चैंपियनशिप में उन्होंने 2.31 मीटर की छलांग लगाकर तेजस्विन शंकर के 2.29 मीटर के पुराने राष्ट्रीय रिकॉर्ड को ध्वस्त कर दिया था। वह 2.30 मीटर की ऐतिहासिक दीवार को लांघने वाले भारत के पहले हाई जम्पर बने।
इसके बाद हाल ही में ग्लासगो में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भी सर्वेश ने 2.25 मीटर की छलांग लगाकर ऐतिहासिक रजत पदक जीता था और राष्ट्रमंडल खेलों के पुरुषों के हाई जंप में भारत को पहला सिल्वर दिलाने वाले खिलाड़ी बने थे। इसके अलावा वे प्रतिष्ठित डायमंड लीग के पोडियम पर स्थान बनाने वाले भारत के पहले हाई जम्पर का गौरव भी इसी वर्ष हासिल कर चुके हैं।
एशियाई मंच पर बदला 2023 की टीस का रंग
वर्ष 2023 में आयोजित पिछले एशियाई खेलों में सर्वेश कुशारे बेहद करीबी अंतर से चौथे स्थान पर रहकर पदक से चूक गए थे। उस दिल तोड़ने वाली हार ने उन्हें कमजोर करने के बजाय और अधिक दृढ़ संकल्पित बनाया। उन्होंने 2023 की एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 2.26 मीटर के साथ सिल्वर मेडल जीता था और 2025 की वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप के फाइनल में पहुंचने वाले पहले भारतीय हाई जम्पर बनकर छठा स्थान हासिल किया था।
नागोया में जीता गया यह रजत पदक सर्वेश के अदम्य साहस, वर्षों के मौन तप और तिरंगे के प्रति उनके समर्पण का परिणाम है। भारतीय एथलेटिक्स महासंघ (AFI) और खेल जगत ने उनकी इस ऐतिहासिक छलांग की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। यह पदक आने वाली पीढ़ियों के लिए इस बात की प्रेरणा बन गया है कि साधन कितने भी सीमित क्यों न हों, यदि लक्ष्य के प्रति समर्पण अटूट हो तो आकाश की ऊंचाई भी नापी जा सकती है।
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