'शर्म करो' जब मीडिया पर बरसी प्रशासनिक 'धौंस', एसडीएम पर हमले के मामले में एडीएम के ऐसे बोल, क्या सवाल पूछने पर है पाबंदी?

हरदोई जनपद के शाहाबाद तहसील क्षेत्र के ग्राम परियल में उप जिलाधिकारी (एसडीएम) सुशील कुमार मिश्र पर हुए हमले की घटना ने

Jun 9, 2026 - 14:19
Jun 9, 2026 - 14:19
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'शर्म करो' जब मीडिया पर बरसी प्रशासनिक 'धौंस', एसडीएम पर हमले के मामले में एडीएम के ऐसे बोल, क्या सवाल पूछने पर है पाबंदी?
'शर्म करो' जब मीडिया पर बरसी प्रशासनिक 'धौंस', एसडीएम पर हमले के मामले में एडीएम के ऐसे बोल, क्या सवाल पूछने पर है पाबंदी?
  • लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर प्रशासनिक हनक- सूचना देने के बजाय एडीएम प्रफुल्ल त्रिपाठी की 'तिलमिलाहट' और 'शर्म करो' के बोल, क्या यही है जवाबदेही?

हरदोई जनपद के शाहाबाद तहसील क्षेत्र के ग्राम परियल में उप जिलाधिकारी (एसडीएम) सुशील कुमार मिश्र पर हुए हमले की घटना ने जहां एक ओर कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक संवादहीनता पर गंभीर सवाल खड़े किए थे, वहीं अब इस पूरे मामले ने एक नया और बेहद चिंताजनक मोड़ ले लिया है। यह मोड़ कानून-व्यवस्था से इतर सीधे तौर पर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया की स्वतंत्रता, उसके अधिकारों और प्रशासनिक अधिकारियों की लोकतांत्रिक जवाबदेही से जुड़ा हुआ है। घटना की कवरेज करने और वस्तुस्थिति जानने पहुंचे पत्रकारों के साथ जनपद के अपर जिलाधिकारी (एडीएम) प्रफुल्ल त्रिपाठी का जो रवैया सामने आया है, उसने प्रशासनिक साख को एक बार फिर कटघरे में खड़ा कर दिया है।

जब इस पूरे संवेदनशील और हिंसक घटनाक्रम की प्रामाणिक जानकारी हासिल करने के लिए लोकतंत्र के सजग प्रहरियों यानी पत्रकारों ने एडीएम प्रफुल्ल त्रिपाठी से संपर्क किया और वस्तुस्थिति जाननी चाही, तो जिम्मेदार पद पर बैठे अधिकारी ने विनम्रता और तथ्यात्मक स्पष्टता दिखाने के बजाय कैमरे के सामने तिलमिलाकर पत्रकारों को ही 'शर्म कर लो' जैसी अमर्यादित नसीहत दे डाली। एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी का मीडिया के तीखे लेकिन जायज सवालों पर इस कदर बिफर जाना और 'शर्म करो' जैसे असभ्य शब्दों का प्रयोग करना न केवल उनकी व्यक्तिगत कार्यशैली को दर्शाता है, बल्कि यह उस व्यापक प्रशासनिक हनक का भी जीवंत प्रमाण है जो खुद को किसी भी प्रकार की जन-जवाबदेही से ऊपर मानती है।

  • सवाल पूछने पर पाबंदी या सच का खौफ?

जब एक जिम्मेदार प्रशासनिक पद पर आसीन अधिकारी सार्वजनिक रूप से अपना आपा खो देता है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि तंत्र के भीतर संवाद की भारी कमी है। मीडिया का काम किसी भी अप्रिय घटना के सभी पहलुओं को सामने लाना है। ऐसे में अधिकारी का यह कड़ा और अमर्यादित रुख यह सोचने पर विवश करता है कि आखिर प्रशासन इस मामले में ऐसा क्या है जिसे छिपाना चाहता है?

  • सुविधा की 'मित्रता' और संकट में 'शत्रुता'- सरकारी योजनाओं के प्रचार में प्रिय, सच पूछने पर अप्रिय क्यों?

इस पूरे प्रकरण ने प्रशासनिक तंत्र के उस दोहरे चरित्र को उजागर कर दिया है, जिसे अक्सर 'सुविधा की पत्रकारिता' पसंद आती है। अमूमन यह देखा गया है कि जब सरकार की विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं, विकास कार्यों या किसी भी प्रशासनिक उपलब्धि का ढिंढोरा पीटना होता है, तो यही प्रशासनिक अमला मीडिया को अपना सबसे बड़ा और घनिष्ठ सहयोगी मानता है। बकायदा प्रेस नोट जारी किए जाते हैं, पत्रकारों को आमंत्रित किया जाता है और यह अपेक्षा की जाती है कि मीडिया प्रशासन की हर छोटी-बड़ी बात को प्रमुखता से जनता के बीच ले जाए।

परंतु, जैसे ही पासा पलटता है और मामला प्रशासन की अपनी किसी विफलता, आपसी टकराव या किसी अधिकारी से जुड़े विवाद का आता है, तो वही मीडिया अचानक तंत्र की आंखों में खटकने लगता है। शाहाबाद के परियल गांव में जो कुछ भी हुआ, वह निश्चित रूप से प्रशासन की कार्यप्रणाली और उसकी 'पब्लिक डीलिंग' पर सवाल उठाता था। इस मामले की सच्चाई, एसडीएम के घायल होने की सही वजह और मौके पर उपजे हालातों की सटीक जानकारी लेना मीडिया का न केवल अधिकार था, बल्कि आम जनता के प्रति उसका कर्तव्य भी था।

आखिर यह विषय एक सरकारी अधिकारी पर हुए हमले और क्षेत्र की कानून-व्यवस्था से जुड़ा था, तो फिर एडीएम प्रफुल्ल त्रिपाठी जानकारी देने से बचते क्यों नजर आए? जब पत्रकारों ने केवल अपना दायित्व निभाते हुए सवाल पूछे, तो एडीएम के भीतर का प्रशासनिक अहंकार इस कदर क्यों जाग उठा कि वे यह भी भूल गए कि वे एक संवैधानिक पद पर बैठे हैं और उनके सामने खड़ा व्यक्ति कोई फरियादी नहीं, बल्कि जनता की आवाज उठाने वाला पत्रकार है।

  • क्या 'शर्म करो' कहना संवैधानिक है? प्रशासनिक हनक और अभिव्यक्ति की आजादी पर गहराता संकट

भारत का संविधान हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, और मीडिया इसी स्वतंत्रता के तहत समाज और सत्ता के बीच एक सेतु का काम करता है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह कतई संवैधानिक या न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता कि एक लोक सेवक (Public Servant) देश के चौथे स्तंभ को सार्वजनिक रूप से अपमानित करे या उनके पेशेवर दायित्वों के लिए उन्हें 'शर्म' करने की बात कहे। 'शर्म' तो वास्तव में उस व्यवस्था को आनी चाहिए जो एक संवेदनशील मामले पर पारदर्शिता बरतने के बजाय सूचनाओं को दबाने और पत्रकारों को डराने का प्रयास करती है।

प्रशासनिक नियमावली और शिष्टाचार स्पष्ट रूप से यह निर्देशित करते हैं कि किसी भी अधिकारी को मीडिया और जनता के साथ अत्यंत संयमित, मर्यादित और सभ्य भाषा का उपयोग करना चाहिए। एडीएम प्रफुल्ल त्रिपाठी का पत्रकारों को देखकर बिफर जाना और अमर्यादित शब्दावली का प्रयोग करना साफ तौर पर सिविल सेवा के मूल सिद्धांतों जैसे कि धैर्य, निष्पक्षता और संवेदनशीलता के पूर्ण उल्लंघन को प्रदर्शित करता है।

जब अधिकारी इस प्रकार की 'प्रशासनिक हनक' दिखाते हैं, तो वे भूल जाते हैं कि वे किसी रजवाड़े के राजा नहीं हैं, बल्कि जनता के टैक्स से वेतन पाने वाले जनसेवक हैं। मीडिया को दी जाने वाली ऐसी धमकियां या असभ्य टिप्पणियां वास्तव में अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने का एक परोक्ष प्रयास हैं। यदि एक वरिष्ठ अधिकारी का व्यवहार पत्रकारों के प्रति ऐसा है, तो सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि आम गरीब जनता जब अपनी शिकायतें लेकर इनके पास जाती होगी, तो उन्हें किस कदर मानसिक प्रताड़ना और अपमान का सामना करना पड़ता होगा।

  • सूचना का अधिकार और मीडिया की स्वायत्तता

लोकतंत्र में सूचनाएं छिपाना तानाशाही की पहली निशानी माना जाता है। शाहाबाद की घटना में जो कुछ भी घटित हुआ, उसकी पल-पल की रिपोर्ट जनता तक पहुंचना आवश्यक था। जब एडीएम प्रफुल्ल त्रिपाठी जैसे जिम्मेदार अधिकारी कैमरे के सामने जानकारी देने से कतराते हैं और आक्रोशित होते हैं, तो वे अनजाने में ही सही, लेकिन जनता के मन में यह संदेह पैदा कर देते हैं कि दाल में कुछ काला है। मीडिया का अधिकार है कि वह हर उस मामले की तह तक जाए जो सार्वजनिक हित या सरकारी तंत्र से जुड़ा है। जानकारी छिपाने की यह प्रशासनिक प्रवृत्ति लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत घातक है।

  • क्या अपनी विफलता छुपाने के लिए अपनाया गया यह आक्रामक रुख?

अक्सर देखा गया है कि जब प्रशासनिक अधिकारी किसी मामले में बैकफुट पर होते हैं, या जब उन्हें लगता है कि उनकी अपनी ही किसी नीति या सहकर्मी के अड़ियल रवैये के कारण स्थिति बिगड़ी है, तो वे अपनी कमियों को छुपाने के लिए 'आक्रामकता' को एक ढाल की तरह इस्तेमाल करते हैं। एडीएम की तिलमिलाहट संभवतः इसी मनोवैज्ञानिक दबाव का परिणाम थी। परियल गांव में एसडीएम के साथ जो हुआ, उसमें कहीं न कहीं प्रशासनिक चूक और खुफिया तंत्र की विफलता साफ नजर आ रही थी। इसी विफलता के चुभते सवालों से बचने के लिए पत्रकारों को निशाना बनाया गया और उन पर 'शर्म करो' के तीर छोड़े गए।

  • पत्रकारों की सुरक्षा और सम्मान का गंभीर प्रश्न

उत्तर प्रदेश समेत देश के कई हिस्सों में फील्ड पर काम करने वाले पत्रकारों को अक्सर ऐसी प्रशासनिक प्रताड़ना और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है। एक तरफ जहां पत्रकार अपनी जान जोखिम में डालकर धरातल से सच रिपोर्ट करते हैं, वहीं दूसरी तरफ वातानुकूलित कमरों में बैठे अधिकारी उनके साथ अपराधियों जैसा सुलूक करने से भी नहीं हिचकते। एडीएम हरदोई का यह कृत्य केवल उन पत्रकारों का व्यक्तिगत अपमान नहीं है जो वहां मौजूद थे, बल्कि यह पूरी पत्रकारिता बिरादरी के सम्मान और उनकी सुरक्षा पर एक करारा प्रहार है।

  • शासन को लेना होगा कड़ा संज्ञान

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार लगातार यह दावा करती है कि सूबे में 'भ्रष्टाचार और निरंकुश नौकरशाही' के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाई जा रही है। ऐसे में हरदोई के एडीएम प्रफुल्ल त्रिपाठी का यह अमर्यादित आचरण सरकार के दावों की हवा निकालता हुआ प्रतीत होता है। शासन को इस मामले का स्वतः संज्ञान लेना चाहिए और यह संदेश देना चाहिए कि कोई भी अधिकारी, चाहे वह कितने ही ऊंचे पद पर क्यों न बैठा हो, उसे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को अपमानित करने और असंवैधानिक भाषा का प्रयोग करने की छूट नहीं दी जा सकती।

  • जब तक बदलेगा नहीं नजरिया, तब तक सुधरेगा नहीं तंत्र

हरदोई के परियल गांव का पूरा घटनाक्रम दो बड़े प्रशासनिक सबकों को रेखांकित करता है। पहला सबक यह कि जनता के साथ किया गया 'संवादहीन' और कड़ा व्यवहार किसी भी क्षण हिंसक आक्रोश का रूप ले सकता है, जैसा कि एसडीएम सुशील कुमार मिश्र के मामले में देखने को मिला। और दूसरा सबक यह कि अपनी विफलताओं को छुपाने के लिए मीडिया को डराना या अपमानित करना प्रशासनिक हठधर्मिता का सबसे निकृष्ट रूप है, जैसा कि एडीएम प्रफुल्ल त्रिपाठी के आचरण से सिद्ध हुआ।

प्रशासन को यह समझना होगा कि भय और धौंस के बल पर व्यवस्थाएं कुछ समय के लिए चलाई तो जा सकती हैं, लेकिन लोकतांत्रिक समाज में सम्मान और सहयोग केवल 'न्यायपूर्ण व्यवहार' और 'पारदर्शिता' से ही अर्जित किया जा सकता है। मीडिया से जानकारी छिपाना और 'शर्म करो' जैसे शब्दों का प्रयोग करना प्रशासनिक साख को और अधिक लहूलुहान ही करेगा। वक्त आ गया है कि नौकरशाही अपने इस सामंती चश्मे को उतारे और यह स्वीकार करे कि वे जनता और संविधान के प्रति पूरी तरह जवाबदेह हैं, और मीडिया उनसे यह जवाब मांगने का पूरा हक रखता है।

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