'खाद्य' सुरक्षा के बीच सुलगता जन-आक्रोश, क्या प्रशासनिक हठधर्मिता और संवादहीनता ने ली हिंसक झड़प की शक्ल?

उत्तर प्रदेश के हरदोई जनपद अंतर्गत शाहाबाद तहसील क्षेत्र से आई एक बेहद विचलित और हैरान करने वाली खबर ने शासन

Jun 9, 2026 - 14:26
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'खाद्य' सुरक्षा के बीच सुलगता जन-आक्रोश, क्या प्रशासनिक हठधर्मिता और संवादहीनता ने ली हिंसक झड़प की शक्ल?
'खाद्य' सुरक्षा के बीच सुलगता जन-आक्रोश, क्या प्रशासनिक हठधर्मिता और संवादहीनता ने ली हिंसक झड़प की शक्ल?

उत्तर प्रदेश के हरदोई जनपद अंतर्गत शाहाबाद तहसील क्षेत्र से आई एक बेहद विचलित और हैरान करने वाली खबर ने शासन, प्रशासन और आम जनता के बीच के संवेदनशील रिश्तों पर एक बार फिर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। शाहाबाद के उप जिलाधिकारी (एसडीएम) सुशील कुमार मिश्र पर क्षेत्र के ग्राम परियल में ग्रामीणों द्वारा किया गया हमला और उसके बाद फैली अराजकता केवल एक कानून-व्यवस्था का संकट भर नहीं है। पहली नजर में यह भले ही एक उग्र भीड़ द्वारा प्रशासनिक अधिकारी पर किया गया जानलेवा हमला दिखे, लेकिन यदि इसकी तह में जाकर निष्पक्ष विश्लेषण किया जाए, तो यह शासन और जनता के बीच टूट चुके 'संवाद' और प्रशासनिक तंत्र के उस रवैये की बानगी है, जहां जनसुनवाई और विनम्रता के बजाय 'आदेश' और 'कड़े रुख' को प्राथमिकता दी जाती है।

इस पूरे घटनाक्रम में एसडीएम सुशील कुमार मिश्र गंभीर रूप से घायल हुए हैं, उनके सिर पर गहरी चोटें आई हैं और अस्पताल में उन्हें टांके लगाने पड़े हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी रूप में हिंसा को स्वीकार नहीं किया जा सकता। कानून को हाथ में लेना पूरी तरह दंडनीय अपराध है और दोषी ग्रामीणों पर सख्त कार्रवाई होनी ही चाहिए। परंतु, इसके साथ ही सिक्के के दूसरे पहलू को देखना भी बेहद अनिवार्य है। आखिर क्या वजह थी कि जो जनता अमूमन प्रशासनिक अमले के सामने अपनी फरियाद लेकर खड़ी होती है, वह अचानक इतनी उग्र हो गई कि पत्थर उठाने पर आमादा हो गई?

क्या यह घटना एक दिन की किसी अचानक उपजी गलतफहमी का नतीजा थी, या फिर यह प्रशासनिक अधिकारियों के उस अलोकतांत्रिक और संवेदनहीन व्यवहार का चरम था, जो अक्सर आम नागरिकों को न्याय की उम्मीद के बदले अपमान और उपेक्षा की खाई में धकेल देता है? अक्सर देखा गया है कि जब सरकारी नुमाइंदे खुद को जनता का 'सेवक' न मानकर 'शासक' समझने की भूल कर बैठते हैं, तब इस प्रकार के विस्फोटक और दुर्भाग्यपूर्ण हालात पैदा होते हैं।

  • आखिर उस दिन ग्राम परियल में क्या हुआ था?

यह सनसनीखेज मामला हरदोई जिले के शाहाबाद तहसील क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्राम परियल का है। शाहाबाद तहसील क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा नदी के तटीय इलाकों से सटा हुआ है, जिसके चलते प्रशासन मानसून और संभावित बाढ़ की तैयारियों को लेकर लगातार सतर्कता बरत रहा है। इसी सिलसिले में उप जिलाधिकारी सुशील कुमार मिश्र अपनी सरकारी टीम के साथ क्षेत्र में स्थापित की गई बाढ़ चौकियों की जमीनी हकीकत और तैयारियों का औचक निरीक्षण करने पहुंचे थे।

बाढ़ चौकी का निरीक्षण पूरा करने के बाद जब वे अपनी सरकारी गाड़ी से वापस मुख्यालय की ओर लौट रहे थे, तभी उनकी नजर परियल गांव के निकट नवनिर्मित सरकारी अन्नपूर्णा राशन की दुकान (अन्नपूर्णा भवन) और आरआरसी सेंटर पर पड़ी। इस सरकारी भवन के संचालन, उपयोग और वहां के गेट आदि न लगे होने जैसी अव्यवस्थाओं को देखकर एसडीएम ने अपनी गाड़ी रुकवाई और खंड विकास अधिकारी से फोन पर जानकारी लेते हुए मौके पर ही जांच व आपत्ति जताना शुरू कर दिया।

  • विवाद से विप्लव तक का सफर

जांच के दौरान ही वहां स्थानीय जनप्रतिनिधि के परिजनों और कुछ ग्रामीणों की मौजूदगी थी। आरोप है कि अव्यवस्थाओं पर आपत्ति जताने के दौरान अधिकारियों की तरफ से जनता की बात सुनने या स्थानीय पक्ष को समझने के बजाय सख्त और दमनकारी रुख अख्तियार किया गया। जब एसडीएम ने शासकीय कार्य में बाधा डालने का आरोप लगाते हुए वहां मौजूद व्यक्ति को हिरासत में लेने का प्रयास किया, तो वहां मौजूद ग्रामीणों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। देखते ही देखते विवाद एक बड़े हिंसक टकराव में बदल गया। आक्रोशित ग्रामीणों और महिलाओं ने प्रशासनिक टीम को घेर लिया और उनकी गाड़ी पर लाठी-डंडों व पत्थरों से हमला कर दिया। इस हिंसक पथराव की चपेट में आने से एसडीएम सुशील कुमार मिश्र के सिर पर गंभीर चोटें आईं। बाकी स्टाफ ने किसी तरह अधिकारी को वाहन सहित वहां से सुरक्षित निकाला और आनन-फानन में सीएचसी शाहाबाद ले गए, जहां से उन्हें हरदोई मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया।

  • विवादों से पुराना नाता- एसडीएम सुशील कुमार मिश्र की कार्यप्रणाली पर उठते यक्ष प्रश्न

इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में मौजूद प्रशासनिक चेहरे, यानी एसडीएम सुशील कुमार मिश्र का इतिहास टटोलना भी इस मामले की पृष्ठभूमि को समझने के लिए जरूरी है। हरदोई जनपद की विभिन्न तहसीलों (जैसे पूर्व में सदर तहसील) में उनकी तैनाती का यह कोई पहला विवाद नहीं है। स्थानीय सूत्रों और प्रशासनिक गलियारों में इस बात की चर्चा आम है कि इससे पहले भी जब वे विभिन्न क्षेत्रों में तैनात रहे, तब भी उनका नाता विवादों से लगातार जुड़ा रहा। एक कुशल प्रशासनिक अधिकारी की पहचान उसकी त्वरित निर्णय क्षमता के साथ-साथ उसकी 'क्राइसिस मैनेजमेंट' (संकट प्रबंधन) और 'पब्लिक डीलिंग' (जन-व्यवहार) से होती है। लेकिन मिश्र के संदर्भ में बार-बार उठने वाले विवाद यह दर्शाते हैं कि कहीं न कहीं उनके और आम जनता के बीच एक गहरी खाई मौजूद रही है।

जब कोई अधिकारी विवादों के साये में लगातार घिरा रहता है, तो यह माना जाना चाहिए कि उसकी संवाद शैली में कहीं न कहीं खोट है। लोकतंत्र में जनता का विश्वास जीतना सबसे बड़ी चुनौती होती है। यदि एक अधिकारी बार-बार विवादों के केंद्र में आ रहा है, तो शासन को भी इसकी समीक्षा करनी चाहिए कि क्या उस अधिकारी का व्यवहार 'पब्लिक-फ्रेंडली' है या फिर वह दमनकारी नीतियों के सहारे व्यवस्था चलाना चाहता है।

पिछले कार्यकालों के दौरान भी कई बार ऐसी स्थितियां बनीं जहां स्थानीय नागरिकों, किसानों और जनप्रतिनिधियों ने उनके कड़े और कथित रूप से असंवेदनशील रवैये के खिलाफ नाराजगी जाहिर की थी। जब एक अधिकारी के प्रति जनता के मन में पहले से ही असंतोष का गुबार तैर रहा हो, और वह अधिकारी एक बार फिर किसी संवेदनशील औचक निरीक्षण के दौरान बिना किसी पुख्ता जमीनी तैयारी और संवेदनशील संवाद के आपत्तियां दर्ज कराने लगता है, तो वहां चिंगारी भड़कना लगभग तय हो जाता है।

  • जब 'सेवक' बन जाते हैं 'सुल्तान'- न्यायपूर्ण व्यवहार का अभाव और उग्र होती जनता

आधुनिक भारत की प्रशासनिक व्यवस्था 'सिविल सर्विसेज' यानी नागरिक सेवाओं पर टिकी है। इसके नाम में ही 'सेवा' शब्द समाहित है। परंतु, धरातल पर स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत नजर आती है। अमूमन यह देखा गया है कि जिलों में तैनात कुछ आला अधिकारी खुद को ब्रिटिश काल के 'कलेक्टर' या 'हाकिम' के रूप में पेश करते हैं। आम गरीब जनता जब अपनी फरियाद लेकर या किसी व्यवस्था के तहत इन वातानुकूलित दफ्तरों या गाड़ियों के चक्कर काटती है, तो उनके साथ किया जाने वाला व्यवहार न्यायपूर्ण और सहानुभूतिपूर्ण होने के बजाय दुत्कार और झिड़की से भरा होता है।

जब जनता को यह महसूस होने लगता है कि उनके अधिकारों की रक्षा करने वाला और उन्हें न्याय देने वाला तंत्र ही उनके प्रति संवेदनहीन हो चुका है, तो उनके भीतर का धैर्य धीरे-धीरे टूटने लगता है। हरदोई की घटना इसी टूटते धैर्य और सुलगते आक्रोश का एक बेहद डरावना उदाहरण है।

जब अधिकारी किसी भी विवादित या अव्यवस्थित स्थल पर जाकर सीधे 'सजा सुनाने' वाले अंदाज में काम करते हैं और स्थानीय लोगों की दलीलों को अनसुना कर देते हैं, तो वहां मौजूद जनसमूह को लगता है कि उनके साथ अन्याय हो रहा है। यही 'अन्याय का बोध' शांत और सीधे-साधे ग्रामीणों को भी एक उग्र भीड़ में तब्दील कर देता है। परियल गांव के इस पूरे मामले में भी इसी तरह के किसी तात्कालिक ट्रिगर या संवाद के पूरी तरह ठप होने की प्रबल आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

  • 'कम्युनिकेशन गैप' का आत्मघाती परिणाम?

किसी भी प्रशासनिक कार्रवाई की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि मौके पर मौजूद अधिकारी वहां के स्थानीय समीकरणों और जनभावनाओं को कितनी अच्छी तरह संभालता है। हरदोई के परियल गांव मामले में यदि एसडीएम और ग्रामीणों के बीच सही तरीके से बातचीत हुई होती, यदि उन्हें कानून और जांच की प्रक्रिया को विनम्रतापूर्वक समझाया गया होता, तो शायद माहौल इतना तनावपूर्ण न होता। जब अधिकारी सीधे आदेशात्मक लहजे में बात करते हैं और जनता की शिकायतों या स्पष्टीकरण को 'बकवास' समझकर खारिज कर देते हैं, तो संवाद के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं। यह कम्युनिकेशन गैप ही अंततः पथराव और हिंसा का रूप ले लेता है।

  • अन्नपूर्णा भवन की अव्यवस्था और ग्रामीण राजनीति

राशन की दुकानें और नए बन रहे अन्नपूर्णा भवन ग्रामीण इलाकों में राजनीति और जीविका का मुख्य केंद्र होते हैं। अक्सर इन सरकारी निर्माणों में होने वाली कमियों, भ्रष्टाचार या देरी को लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधि और अधिकारी आमने-सामने होते हैं। जब भी कोई अधिकारी ऐसी संवेदनशील जगह पर बिना सुरक्षा के सीधे तीखे तेवर दिखाता है, तो स्थानीय गुट और उनके समर्थक सक्रिय हो जाते हैं। ऐसे में अधिकारी को अत्यंत निष्पक्ष, पारदर्शी और शांत चित्त होना चाहिए। यदि अधिकारी का व्यवहार किसी को नीचा दिखाने या अपनी हनक साबित करने का महसूस हो, तो बरसों से जमा हुआ जनता का गुस्सा फूट पड़ता है।

  • पुलिस और प्रशासन का 'ओवर-कॉन्फिडेंस'

अक्सर देखा गया है कि प्रशासनिक अधिकारी अपने साथ दो-चार पुलिसकर्मियों को लेकर खुद को पूरी तरह सुरक्षित मान लेते हैं। वे भूल जाते हैं कि लोकतंत्र में असली ताकत जनता के पास है। परियल गांव के मामले में भी ऐसा ही कुछ देखने को मिला। जब एसडीएम ने एक व्यक्ति को हिरासत में लेने या उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की कोशिश की, तो वहां मौजूद भीड़ ने न सिर्फ विरोध किया बल्कि पुलिस के चंगुल से उसे छुड़ाने का प्रयास भी किया। यह साफ तौर पर दर्शाता है कि प्रशासन मौके पर मौजूद भीड़ के गुस्से और उनकी संख्या का सही आकलन करने में पूरी तरह नाकाम रहा, जिसे इंटेलिजेंस और प्रशासनिक विफलता ही कहा जाएगा।

  • क्या प्रशासनिक प्रशिक्षण में 'सहानुभूति' की कमी है?

आज की तारीख में अधिकारियों को बड़ी-बड़ी अकादमियों में प्रबंधन और कानून का पाठ तो पढ़ाया जाता है, लेकिन शायद 'सहानुभूति' और 'मानवीय व्यवहार' का व्यावहारिक प्रशिक्षण देना वे भूल जाते हैं। जब तक एक अधिकारी खुद को जनता के स्तर पर रखकर सोचना शुरू नहीं करेगा, तब तक ऐसे टकराव होते रहेंगे। अधिकारी को यह समझना होगा कि उनके सामने खड़ा व्यक्ति भले ही अनपढ़ या गरीब हो, लेकिन स्वाभिमान उसका भी है। यदि उसके स्वाभिमान को ठेस पहुंचेगी, तो वह कानून की सीमाओं को लांघने से भी पीछे नहीं हटेगा।

  • सुधरे व्यवहार, तभी बचेगा प्रशासनिक गरिमा का संसार

हरदोई की यह घटना उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश के समस्त प्रशासनिक अमले के लिए एक गंभीर चेतावनी और आत्ममंथन का क्षण है। किसी भी सूरत में सरकारी अधिकारी पर हमला बर्दाश्त नहीं किया जा सकता और दोषियों को कानून के तहत कड़ी से कड़ी सजा मिलनी ही चाहिए ताकि भविष्य में कोई सरकारी कर्मचारी पर हाथ उठाने की हिम्मत न कर सके।

परंतु, इसके साथ ही शासन को अपने अधिकारियों की कार्यशैली, उनके जन-व्यवहार और उनकी छवि की भी समय-समय पर 'स्क्रीनिंग' करनी होगी। जो अधिकारी बार-बार विवादों में घिर रहे हैं, जिनकी कार्यशैली निरंकुश और दमनकारी है, उन्हें फील्ड पोस्टिंग से दूर रखा जाना चाहिए। प्रशासन को भय का पर्याय नहीं, बल्कि भरोसे का प्रतीक होना चाहिए। जब तक 'साहब' संस्कृति खत्म नहीं होगी और अधिकारी 'सच्चे जनसेवक' की भूमिका में नहीं आएंगे, तब तक संवादहीनता के ऐसे दुखद और हिंसक परिणाम सामने आते रहेंगे। न्याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिए, बल्कि वह न्यायपूर्ण ढंग से होता हुआ दिखना भी चाहिए। बहरहाल, डीएम अनुनय झा ने इस मामले से गंभीरता से लेते हुए कड़ी कानूनी कार्रवाई के निर्देश दिए हैं, पुलिस जांच में ही यह सामने आएगा कि असल में मामला क्या रहा और दोषी कौन है?

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