Neeru Dhanda Success Story: अभावों के बीच साधा अचूक निशाना, मां राशन लेने निकली तो बेटी ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर लहराया तिरंगा

बीपीएल कार्ड लेकर सरकारी राशन लेने जा रही मां को फोन पर बेटी नीरू ढांडा के गोल्ड मेडल जीतने की खबर मिली। जानिए आर्थिक तंगी और संघर्ष से निकलकर निशानेबाजी में इतिहास रचने की पूरी कहानी।

By INA News Desk
Sep 30, 2026 - 17:02
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Neeru Dhanda Success Story: अभावों के बीच साधा अचूक निशाना, मां राशन लेने निकली तो बेटी ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर लहराया तिरंगा
  • कभी सरकारी राशन पर निर्भर था परिवार, अब बेटी ने देश को दिलाया गोल्ड: शूटर नीरू ढांडा के संघर्ष की प्रेरक दास्तान
  • BPL कार्ड लेकर राशन की कतार में खड़ी थीं मां, फोन बजा और बेटी नीरू ढांडा ने शूटिंग में गोल्ड जीतकर रचा इतिहास
  • टूटी छत और कर्ज के साए से शूटिंग रेंज के पोडियम तक, जानिए भारतीय निशानेबाज नीरू ढांडा के स्वर्णिम सफर की कहानी

By Vijay Laxmi Singh (Editor- In- Chief)

हाथ में गरीबी रेखा से नीचे (BPL) जीवन यापन करने वाला राशन कार्ड, मन में महीने भर के सस्ते अनाज की चिंता और पैरों में राशन डिपो की तरफ बढ़ते कदम। उसी दौरान मोबाइल की घंटी बजी और दूसरी तरफ से आई आवाज ने वर्षों के अभाव, संघर्ष और आंसुओं को एक झटके में देश के गौरव में बदल दिया। फोन पर बेटी ने बताया- "मां, मैंने देश के लिए गोल्ड मेडल जीत लिया है।" यह कोई फिल्मी पटकथा नहीं, बल्कि भारतीय शॉटगन ट्रैप शूटर नीरू ढांडा और उनके परिवार के उस ऐतिहासिक क्षण की हकीकत है, जिसने खेल जगत को भावुक कर दिया।

हरियाणा की मिट्टी से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का मान बढ़ाने वाली नीरू ढांडा का यह सफर आसान नहीं रहा। जिस खेल को भारत में सबसे महंगे खेलों में गिना जाता है, जहां एक-एक कारतूस और बंदूक की कीमत लाखों में होती है, वहां एक अत्यंत साधारण और आर्थिक तंगी से जूझते परिवार की बेटी का विश्व स्तर पर स्वर्ण पदक तक पहुंचना किसी चमत्कार से कम नहीं है।

  • मिट्टी के चूल्हे से शूटिंग रेंज तक का सफर

नीरू का बचपन आर्थिक सीमाओं के बीच बीता। परिवार के पास नियमित आय का कोई ठोस साधन नहीं था और गुजारा सरकारी राशन व सीमित संसाधनों के भरोसे चलता था। जब नीरू ने पहली बार खेल के मैदान में कदम रखा, तो निशानेबाजी जैसा महंगा खेल उनके परिवार की पहुंच से कोसों दूर दिखाई देता था। गांव और आस-पड़ोस के लोग भी यह सवाल उठाते थे कि जिस घर में दैनिक जरूरतों के लिए मशक्कत करनी पड़ती हो, वहां बंदूक और कारतूस का खर्च कैसे उठाया जाएगा।

परिवार ने सामाजिक तानों की परवाह किए बिना बेटी के जज्बे पर भरोसा जताया। पिता और मां ने अपनी जरूरतों को सीमित कर बेटी के सपनों को प्राथमिकता दी। कई मौकों पर रिश्तेदारों और परिचितों से उधार लेकर अभ्यास सामग्री का प्रबंध किया गया।

  • महंगे खेल की चुनौतियां और संसाधनों की कमी

शॉटगन और ट्रैप शूटिंग खेल तकनीकी रूप से बेहद खर्चीला माना जाता है। क्ले टारगेट, विशेष गन, कारतूस और रेंज की फीस का खर्च वहन करना किसी भी मध्यम या निम्न आय वर्ग के एथलीट के लिए सबसे बड़ी बाधा बनता है। नीरू के करियर में भी ऐसे कई मोड़ आए जब कारतूसों की कमी के कारण उनका अभ्यास प्रभावित हुआ।

कई बार प्रतियोगिताओं में जाने के लिए यात्रा खर्च जुटाना भी चुनौती बन जाता था। ऐसे समय में नीरू ने मानसिक दृढ़ता का परिचय दिया। बिना आधुनिक सुविधाओं के भी उन्होंने तकनीकी बारीकियों पर ध्यान केंद्रित किया और घंटों सूखी ट्रेनिंग (Dry Practice) कर अपनी एकाग्रता को मजबूत बनाए रखा।

  • मां के उस एक फोन कॉल का भावुक पल

जिस दिन नीरू ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर फाइनल मुकाबले में सटीक निशाना साधते हुए गोल्ड मेडल अपने नाम किया, उस वक्त उनकी मां घर के राशन के लिए डिपो की कतार में लगने जा रही थीं। हाथ में राशन कार्ड पकड़े मां को जब बेटी की ऐतिहासिक जीत की सूचना मिली, तो उनकी आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े।

गांव और आसपास के लोगों को जैसे ही यह जानकारी मिली कि जिस परिवार को कल तक आर्थिक संघर्षों के लिए जाना जाता था, उनकी बेटी ने तिरंगा लहराकर पूरे विश्व में भारत का डंका बजा दिया है, तो बधाई देने वालों का तांता लग गया। जो राशन कार्ड कभी मजबूरी का प्रतीक था, वह उस दिन एक मां के अटूट त्याग और बेटी की ऐतिहासिक सफलता का साक्षी बन गया।

  • अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सटीक निशाने का कमाल

प्रतियोगिता के फाइनल राउंड में दबाव बेहद कड़ा था। दुनिया के शीर्ष निशानेबाजों के सामने नीरू ने जबरदस्त मानसिक संतुलन दिखाया। शुरुआती राउंड से ही उन्होंने दबाव को अपने खेल पर हावी नहीं होने दिया और सटीक टाइमिंग के साथ क्ले बर्ड्स को हवा में ही ध्वस्त किया। निर्णायक पलों में जब हर एक शॉट पर पदक का रंग तय हो रहा था, नीरू के अचूक निशानों ने उन्हें पोडियम के शीर्ष पर पहुंचा दिया और राष्ट्रगान की गूंज के साथ तिरंगा सबसे ऊपर फहराया गया।

  • खेल जगत और युवा एथलीटों के लिए नई मिसाल

नीरू ढांडा की यह उपलब्धि केवल एक पदक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के उन हजारों प्रतिभावान युवाओं के लिए एक बड़ा संदेश है जो सीमित साधनों की वजह से अपने सपनों को अधूरा छोड़ देते हैं। उनका यह सफर साबित करता है कि यदि अनुशासन, समर्पण और लक्ष्य के प्रति निष्ठा हो, तो अभावों की दीवारें भी रास्ते का रोड़ा नहीं बन सकतीं।

प्रशासन और खेल संघों की ओर से भी अब ऐसे जमीनी एथलीटों को समय रहते वित्तीय सहायता और आधुनिक उपकरण उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर बल दिया जा रहा है, ताकि गरीबी किसी भी उभरती प्रतिभा की उड़ान में बाधा न बन सके।

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