New Delhi: जमीअत उलमा-ए-हिंद की कार्यकारी समिति का स्पष्ट मत- नफरत, विभाजन और असुरक्षा का माहौल देश के भविष्य के लिए खतरनाक

जमीअत उलमा-ए-हिंद की कार्यकारी समिति ने 11 जून, 2026 को हुई विशेष बैठक में देश की वर्तमान परिस्थितियों पर

Jun 14, 2026 - 11:28
 0  6
New Delhi: जमीअत उलमा-ए-हिंद की कार्यकारी समिति का स्पष्ट मत- नफरत, विभाजन और असुरक्षा का माहौल देश के भविष्य के लिए खतरनाक

नई दिल्ली: जमीअत उलमा-ए-हिंद की कार्यकारी समिति ने 11 जून, 2026 को हुई विशेष बैठक में देश की वर्तमान परिस्थितियों पर गंभीर आशंका व्यक्त करते हुए एक संयुक्त बयान जारी किया है। अध्यक्ष हजरत मौलाना महमूद असद मदनी की अध्यक्षता में हुई इस सभा में प्रस्तुत मसौदे पर विस्तार से विचार-विमर्श कर इसे सर्वसम्मति से पारित किया गया।
बयान में कहा गया है कि देश एक संवेदनशील मोड़ पर खड़ा है और हाल के वर्षों में सरकारी प्राथमिकताओं व सामाजिक व्यवहार में आए परिवर्तनों ने न सिर्फ अल्पसंख्यकों बल्कि समूचे लोकतांत्रिक तंत्र के सामने चिंता के गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। जमीअत ने घृणास्पद भाषणों, धार्मिक उन्माद और धमकी-आधारित राजनीति के बढ़ते प्रकोप को लोकतंत्र व संवैधानिक ढाँचे के लिए खतरा बताया। संगठन ने न्यायपालिका की भूमिका और उसके रवैये पर भी चिंताएं जताई हैं, साथ ही कहा कि संवैधानिक स्वरूप को बदलने की संगठित कोशिशें दिखाई दे रही हैं।
अल्पसंख्यकों के प्रति बढ़ते लक्षित हमलों, पूजा स्थलों, मदरसों और कब्रिस्तानों पर हमलों और उनके प्रतिष्ठान के खिलाफ कार्यवाहियों पर चिंता जताते हुए जमीअत ने कहा कि कई बार इन कार्रवाइयों के पीछे सामान्य बहानों का उपयोग किया जा रहा है और इससे अल्पसंख्यकों के बीच भय और असुरक्षा की भावना बढ़ रही है। बयान में यह भी कहा गया कि यह प्रवृत्ति "आंतरिक उपनिवेशवाद" जैसी स्थिति उत्पन्न कर रही है, जहाँ कुछ वर्गों को अधिकारों और सुरक्षा से वंचित किया जा रहा है।
मतदाता सूची, नागरिकता और पहचान से जुड़े हालिया कार्यवाहियों पर भी संगठन ने सवाल उठाए हैं। जमीअत ने कहा कि नागरिकता और पहचान के नाम पर की जा रही कार्रवाइयों ने लाखों नागरिकों में अविश्वास और असमंजस पैदा कर दिया है और इनका उद्देश्य राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सीमित करना हो सकता है। संगठन ने चेतावनी दी कि यदि मतदान के अधिकार पर विश्वास डगमगा गया तो उसके दूरगामी नकारात्मक प्रभाव होंगे।
देश के असली मुद्दे जैसे बेरोजगारी, महँगाई, कृषि संकट, शिक्षा व स्वास्थ्य की चुनौतियाँ पीछे छूट रही हैं, जबकि सार्वजनिक विमर्श बार-बार धार्मिक विवादों और सांप्रदायिक बहसों की ओर मोड़ दिया जा रहा है। जमीअत ने कहा कि राष्ट्रों की प्रगति न्याय, विश्वास और समानता से होती है, न कि नफरत और विभाजन से, और यदि संवैधानिक मूल्यों की रक्षा नहीं हुई तो आने वाली पीढ़ियाँ नाखुश रहेंगी।
प्रस्तावित मांग-पत्र में जमीअत ने सरकार, न्यायपालिका, संसद, मीडिया और नागरिक समाज से अपील की कि वह नफरत और विभाजन के बढ़ते रुझान को गंभीरता से लें और संविधान, कानून व लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा सुनिश्चित करें। संगठन ने स्पष्ट किया कि वह किसी संघर्ष या घृणास्पद राजनीति का समर्थन नहीं करता बल्कि न्याय, संविधान और समानता के पक्ष में है। साथ ही जमीअत ने 2015 के अपने संकल्प का पुनरुत्थान कर कहा कि "हम न किसी से डरेंगे और न ही उकसावे में आकर सीमा लाघेंगे"।
अवैध घुसपैठ व जनसांख्यिकीय परिवर्तनों पर भी जमीअत ने चिंता जताई। उसने कहा कि असम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में जनसांख्यिकीय बदलावों के बहाने एक विशेष धार्मिक अल्पसंख्यक को देश का खतरा बताने वाली प्रवृत्तियाँ पनप रही हैं। संगठन ने यह भी कहा कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने संसद में स्वीकार किया है कि अवैध घुसपैठियों की निश्चित संख्या उपलब्ध नहीं है, बावजूद इसके कुछ राज्यों व उनके नेतृत्व द्वारा असत्यापित दावे पेश किए जा रहे हैं। जमीअत ने कहा कि पुशबैक जैसी कार्रवाइयों में कानूनी और मानवाधिकार संबंधी त्रुटियाँ देखी गई हैं और सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बावजूद प्रशासनिक रवैये में आवश्यक बदलाव स्पष्ट नहीं हैं।
मांग-पत्र की छह प्रमुख मांगें
घृणास्पद भाषणों, लिंचिंग और संगठित उत्पीड़न रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए।
सांप्रदायिक दंगों व मॉब लिंचिंग की स्थिति में प्रशासन को जवाबदेह ठहराया जाए तथा लापरवाही सिद्ध होने पर संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई और पीड़ितों को मुआवजा व पुनर्वास दिया जाए, फास्ट-ट्रैक अदालतों के माध्यम से शीघ्र निपटान सुनिश्चित किया जाए।
शिक्षा, रोजगार और सरकारी संस्थानों में वंचित समूहों व अल्पसंख्यकों का प्रभावी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए।
धार्मिक स्वतंत्रता, पूजा स्थानों, मदरसों और अल्पसंख्यकों के शैक्षिक अधिकारों की रक्षा की जाए तथा संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों पर प्रशासनिक या कानूनी बहानों से पाबंदी न लगाई जाए।
मतदाता सूची, नागरिकता और पहचान से संबंधित प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और न्याय सुनिश्चित किया जाए; एनआरसी व विदेशी नागरिक मामलों में किसी को भी कानूनी प्रक्रिया दिए बिना देश से निष्कासित न किया जाए।
भारत सरकार से अनुरोध है कि वह फिलिस्तीनी लोगों के आत्मनिर्णय और मानवीय सहायता के समर्थन में अपनी विदेश नीति, अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवाधिकार सिद्धांतों के अनुरूप प्रभावी भूमिका निभाए तथा इजरायल के साथ सैन्य-रक्षा सहयोग पर पुनर्विचार करे।
बैठक में मौजूद प्रमुख सदस्यों में जमीअत के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी, महासचिव मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन कासमी, दारुल उलूम देवबंद के मोहतमिम मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी, स्थायी समिति के अध्यक्ष मौलाना रहमतुल्लाह मीर सहित कई अन्य वरिष्ठ धर्मगुरु और संगठन के प्रतिनिधि शामिल थे।
जमीअत ने अंतिम रूप से कहा कि अल्पसंख्यक कोई विशेष छूट नहीं मांगते, बल्कि वे संविधान के अनुरूप वही समान सुरक्षा, सम्मान और अधिकार चाहते हैं जो हर नागरिक को प्राप्त हैं। संगठन ने सभी लोकतांत्रिक ताकतों से आह्वान किया कि वे संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करके देश को विभाजन और नफरत की राजनीति से बचाएँ।

Also Read- मौसम का मिजाज बिगड़ने से दिल्ली में विजिबिलिटी घटने से आठ उड़ानों का मार्ग बदला, लखनऊ डायवर्ट

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow

INA News_Admin आई.एन. ए. न्यूज़ (INA NEWS) initiate news agency भारत में सबसे तेजी से बढ़ती हुई हिंदी समाचार एजेंसी है, 2017 से एक बड़ा सफर तय करके आज आप सभी के बीच एक पहचान बना सकी है| हमारा प्रयास यही है कि अपने पाठक तक सच और सही जानकारी पहुंचाएं जिसमें सही और समय का ख़ास महत्व है।