UP Police Constable to SI Recovery: सिपाही से दरोगा बने 1700 जवानों को बड़ा झटका, जॉइनिंग से पहले 7.34 लाख रुपये जमा करने का नोटिस

उत्तर प्रदेश पुलिस में सिपाही से उपनिरीक्षक (SI) बने करीब 1700 जवानों को विभाग ने पदभार ग्रहण करने से पहले 7.34 लाख रुपये जमा कराने का नोटिस थमा दिया है। जानिए क्या है पूरा विवाद।

By INA News Desk
Sep 10, 2026 - 23:25
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UP Police Constable to SI Recovery: सिपाही से दरोगा बने 1700 जवानों को बड़ा झटका, जॉइनिंग से पहले 7.34 लाख रुपये जमा करने का नोटिस
  • UP Police Promotion Controversy: ट्रेनिंग भत्ते की रिकवरी पर फंसा पेंच, नवनियुक्त सब-इंस्पेक्टरों के सामने लाखों की वसूली का संकट
  • Uttar Pradesh Police News: सिपाही से उपनिरीक्षक बने पुलिसकर्मियों से ट्रेनिंग खर्च की मांग, नोटिस जारी होते ही महकमे में हलचल
  • UP Police SI Joining Update: पदोन्नति पाकर दरोगा बने जवानों पर वित्तीय रिकवरी की गाज, जानिए क्या है 7 लाख 34 हजार रुपये का पूरा विवाद

लखनऊ। उत्तर प्रदेश पुलिस में अपनी कठिन सेवा के आधार पर विभागीय प्रक्रिया और परीक्षा उत्तीर्ण कर सिपाही से उपनिरीक्षक (सब-इंस्पेक्टर) के पद पर चयनित हुए करीब 1700 पुलिसकर्मियों के सामने एक बड़ा वित्तीय संकट खड़ा हो गया है। पुलिस प्रशिक्षण अकादमियों और केंद्रों में एक वर्ष का कड़ा प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद जब ये जवान थानों और विभिन्न इकाइयों में उपनिरीक्षक पद का कार्यभार संभालने की तैयारी कर रहे थे, तभी संबंधित प्रशासनिक शाखाओं द्वारा उन्हें 7.34 लाख रुपये की भारी-भरकम राशि सरकारी कोष में वापस जमा कराने का नोटिस जारी कर दिया गया है।

विभाग की ओर से जारी इस निर्देश के बाद नव-प्रोन्नत दरोगाओं में असमंजस और भारी निराशा का माहौल है। नोटिस में स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि सिपाही के रूप में पूर्व में लिए गए विशिष्ट प्रशिक्षण भत्तों या संबंधित मद की इस धनराशि को जमा कराने के बाद ही उनके नए पदस्थापन और जॉइनिंग से जुड़ी औपचारिक प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया जाएगा।

क्या है ₹7.34 लाख की वसूली का पूरा मामला?

विभागीय स्तर पर सामने आई जानकारी के अनुसार, यह पूरा विवाद पुलिस सेवा नियमावली, विभागीय परीक्षा और प्रशिक्षण अवधि के दौरान मिलने वाले वेतन व भत्तों की तकनीकी व्याख्या से जुड़ा हुआ है। उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल या हेड कांस्टेबल के पद पर कार्यरत इन जवानों ने विभागीय कोटे (रैंकर्स कोटे अथवा सीधी भर्ती के विभागीय विकल्प) के तहत उपनिरीक्षक पद की चयन प्रक्रिया में भाग लिया था। लिखित परीक्षा, शारीरिक दक्षता और साक्षात्कार के चरणों को पार करने के बाद इन जवानों को नागरिक पुलिस व पीएसी में उपनिरीक्षक पद के आधारभूत प्रशिक्षण के लिए विभिन्न पुलिस प्रशिक्षण महाविद्यालयों (पीटीसी) और अकादमियों में भेजा गया था।

प्रशिक्षण के दौरान जवानों को उनके मूल पद का वेतन या स्टाइपेंड और निर्धारित भत्ते मिलते रहे। इसके अतिरिक्त, सिपाही पद पर सेवा में रहते हुए उन्हें पूर्व में मिले कुछ विशिष्ट वित्तीय लाभ और प्रशिक्षण के दौरान उन पर आए कुल प्रशासनिक व्यय को लेकर ऑडिट विभाग ने आपत्ति दर्ज कराई थी। वित्तीय नियमों के तहत लेखा शाखा का यह तर्क है कि सेवा संवर्ग में बदलाव और तकनीकी त्यागपत्र (टेक्निकल रेजिग्नेशन) या नए पद पर सीधे कार्यभार ग्रहण करने के कारण पूर्व में उठाए गए कुछ भत्ते अथवा ट्रेनिंग व्यय की यह राशि नियमानुसार वापस जमा कराई जानी है। इसी गणना के आधार पर प्रत्येक जवान से लगभग ₹7,34,000 की रिकवरी निर्धारित की गई है।

जॉइनिंग से ऐन पहले नोटिस, जवानों में बढ़ी चिंता

एक वर्ष तक पीटीसी मुरादाबाद, सीतापुर, उन्नाव, मेरठ या अन्य केंद्रों में कड़ा शारीरिक और कानूनी प्रशिक्षण पूरा करने के बाद इन जवानों की पासिंग आउट परेड संपन्न हुई। इसके बाद सभी अपने-अपने आवंटित जिलों में सब-इंस्पेक्टर के रूप में आमद दर्ज कराने की तैयारी में थे। इसी बीच संबंधित जनपदों के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक/पुलिस अधीक्षक कार्यालयों और पुलिस मुख्यालय की लेखा शाखा से यह नोटिस थमा दिया गया।

नोटिस मिलने के बाद जवानों का कहना है कि वे पिछले कई वर्षों से विभाग में पूरी निष्ठा के साथ काम कर रहे हैं। वे किसी बाहरी स्रोत से सीधी भर्ती में नहीं आए हैं, बल्कि विभाग के ही अनुभवी अंग रहे हैं। एक साथ 7 लाख रुपये से अधिक की राशि का इंतजाम करना किसी भी मध्यमवर्गीय पुलिस परिवार के लिए अत्यंत कठिन है। कई जवानों ने अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों, बच्चों की पढ़ाई और होम लोन जैसी देनदारियों का हवाला देते हुए इस आदेश को अव्यावहारिक और मानसिक रूप से परेशान करने वाला बताया है।

विभागीय नियमों और ऑडिट आपत्तियों में फंसा पेंच

पुलिस प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि यह स्थिति सेवा नियमों की जटिलता और ऑडिट आपत्तियों के समय पर निस्तारण न होने के कारण उत्पन्न हुई है। सरकारी सेवा में जब कोई कर्मचारी एक पद से दूसरे बड़े पद पर सीधी भर्ती या विशेष विभागीय प्रक्रिया से जाता है, तो वित्तीय सेवा पुस्तिका (सर्विस बुक) और पे-प्रोटेक्शन से जुड़े प्रावधान लागू होते हैं।

अक्सर देखा जाता है कि पुलिस प्रशिक्षण निदेशालय और वित्त विभाग के बीच सेवा की निरंतरता (कंटिन्यूटी ऑफ सर्विस) और प्रशिक्षण व्यय के दायित्व को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं होती हैं। ऑडिट विंग ने इसे अतिरिक्त भुगतान या सेवा शर्तों के उल्लंघन की श्रेणी में रखकर रिकवरी की संस्तुति कर दी। संबंधित शाखाओं ने बिना किसी मध्य मार्ग या किस्तों में समायोजन के सीधे एकमुश्त राशि जमा करने का नोटिस जारी कर दिया, जिससे यह स्थिति गंभीर हो गई।

कानूनी और विभागीय विकल्पों पर विचार

इस नोटिस के सामने आने के बाद प्रभावित पुलिसकर्मियों का एक प्रतिनिधिमंडल विभागीय उच्चाधिकारियों और पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) मुख्यालय के समक्ष अपनी बात रखने की रूपरेखा तैयार कर रहा है। जवानों की मांग है कि:

  • पहली बात, चूंकि वे विभाग के ही सेवारत कर्मचारी थे और विभागीय नियमों के तहत ही परीक्षा देकर प्रमोट हुए हैं, इसलिए उनसे प्रशिक्षण व्यय या पुराने भत्तों की वसूली पूरी तरह अनुचित है।

  • दूसरी बात, यदि नियमों के तहत कोई वैधानिक वित्तीय देनदारी बनती भी है, तो उसे जॉइनिंग की शर्त न बनाया जाए और भविष्य में उनके वेतन से आसान मासिक किस्तों में समायोजित किया जाए।

कई प्रभावित जवान इस मामले को लेकर उत्तर प्रदेश राज्य लोक सेवा अधिकरण (स्टेट पब्लिक सर्विसेज ट्रिब्यूनल) या उच्च न्यायालय की शरण में जाने पर भी कानूनी विशेषज्ञों से सलाह ले रहे हैं। उनका तर्क है कि पूर्व में भी विभिन्न विभागों में ऐसे मामलों में अदालतों ने कर्मचारियों के पक्ष में राहत देते हुए एकमुश्त रिकवरी पर रोक लगाई है।

पुलिस मुख्यालय की प्रतिक्रिया का इंतजार

इस पूरे घटनाक्रम ने उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग के भीतर हलचल पैदा कर दी है। जमीनी स्तर पर कानून व्यवस्था को संभालने वाले सब-इंस्पेक्टरों के 1700 पदों पर तैनाती से ठीक पहले इस प्रकार की तकनीकी और वित्तीय अड़चन से जिलों में नए दरोगाओं की फील्ड पोस्टिंग भी प्रभावित हो सकती है। फिलहाल पुलिस मुख्यालय के वरिष्ठ प्रशासनिक और वित्तीय अधिकारी इस पूरे मामले की विधिक और वित्तीय समीक्षा कर रहे हैं। देखना यह होगा कि शासन और डीजीपी मुख्यालय इस मानवीय व प्रशासनिक मुद्दे पर क्या अंतिम निर्णय लेते हैं।

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