Rashtriya Poshan Maah: यूपी में सुधर रही नौनिहालों की सेहत, बच्चों में नाटेपन की दर 8.2 प्रतिशत घटी

उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय पोषण माह के बीच बच्चों की सेहत में सुधार दर्ज हुआ है। एनएफएचएस आंकड़ों के अनुसार पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में नाटेपन की दर 8.2 प्रतिशत कम हुई।

By INA News Desk
Sep 18, 2026 - 23:21
38 Views
Rashtriya Poshan Maah: यूपी में सुधर रही नौनिहालों की सेहत, बच्चों में नाटेपन की दर 8.2 प्रतिशत घटी
Advertisement
Advertisement

लखनऊ। राष्ट्रीय पोषण माह के अंतर्गत उत्तर प्रदेश में बाल स्वास्थ्य और कुपोषण निवारण के मोर्चे पर एक उत्साहवर्धक प्रगति सामने आई है। राज्य में चलाए जा रहे सतत पोषण एवं स्वास्थ्य कार्यक्रमों के परिणामस्वरूप पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में नाटेपन (स्टंटिंग यानी उम्र के मुकाबले कम लंबाई) की समस्या में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के आंकड़ों के तुलनात्मक अध्ययन से पता चलता है कि विगत वर्षों में प्रदेश में ऐसे बच्चों के प्रतिशत में 8.2 प्रतिशत अंक की कमी आई है।

एनएफएचएस-5 के सर्वेक्षण में जहां उत्तर प्रदेश में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में नाटेपन का स्तर 39.7 प्रतिशत पर था, वहीं एनएफएचएस-6 के ताजा सर्वेक्षण परिणामों में यह आंकड़ा घटकर 31.5 प्रतिशत रह गया है। बच्चों के शारीरिक विकास और पोषण स्तर को दर्शाने वाले इस प्रमुख संकेतक में आई यह कमी दर्शाती है कि जमीनी स्तर पर गर्भवती माताओं और शिशुओं के लिए चलाए जा रहे स्वास्थ्य हस्तक्षेप सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

सुधार एक दिन में नहीं आता, दीर्घकालिक देखभाल का परिणाम: मिशन निदेशक

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम), उत्तर प्रदेश की मिशन निदेशक डॉ. पिंकी जोवल के अनुसार, उत्तर प्रदेश जैसी विशाल भौगोलिक और जनसांख्यिकीय विविधता वाले राज्य में नाटेपन के आंकड़ों में 8.2 प्रतिशत की यह कमी अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने स्पष्ट किया कि बच्चों के शारीरिक कद अथवा लंबाई में सुधार किसी अल्पकालिक उपाय से नहीं हो सकता। यह लंबे समय तक निरंतर मिलने वाले संतुलित पोषण, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की समयबद्ध उपलब्धता और परिवार व समुदाय स्तर पर बेहतर शिशु देखभाल का संचयी परिणाम होता है।

मिशन निदेशक ने कहा कि एनएफएचएस-5 से एनएफएचएस-6 के बीच दर्ज की गई गिरावट प्रदेश में बच्चों के समग्र स्वास्थ्य की बदलती तस्वीर को दर्शाती है। हालांकि, उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि 31.5 प्रतिशत का वर्तमान आंकड़ा इस बात की याद दिलाता है कि अभी भी बच्चों का एक बड़ा हिस्सा इस चुनौती से प्रभावित है। इसलिए वर्तमान प्रशासनिक रणनीति जीवन के पहले 1,000 दिनों की गहन निगरानी, गर्भवती महिलाओं के पोषण, जन्म के छह माह तक सिर्फ स्तनपान, छह माह बाद समय पर पूरक आहार देने और नियमित टीकाकरण पर केंद्रित है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर पोषण पोटली वितरण और गर्भवती महिलाओं के परामर्श अभियान को तेज किया गया है ताकि आने वाले वर्षों में सुधार की यह दर और तेज हो सके।

शुरुआती 1,000 दिन तय करते हैं शारीरिक और मानसिक क्षमता

किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) के बाल रोग विभाग की प्रोफेसर डॉ. शालिनी त्रिपाठी का कहना है कि किसी भी शिशु के जीवन के पहले 1,000 दिन (गर्भाधान से लेकर बच्चे के दो वर्ष की आयु तक) उसके जीवन भर के शारीरिक, संज्ञानात्मक (मानसिक) और रोग-प्रतिरोधक तंत्र के विकास की मजबूत नींव तैयार करते हैं।

डॉ. त्रिपाठी के अनुसार, यदि इस नाजुक समय में बच्चे को सूक्ष्म पोषक तत्वों और प्रोटीन की कमी का सामना करना पड़े, तो शरीर की कोशिकाओं की वृद्धि धीमी पड़ जाती है, जिसे नाटेपन के रूप में देखा जाता है। नाटापन केवल बाहरी कद-काठी का मामला नहीं है, बल्कि यह दीर्घकालिक कुपोषण का स्पष्ट प्रमाण होता है, जो भविष्य में बच्चे की सीखने की क्षमता, कार्यक्षमता और वयस्क जीवन में रोगों से लड़ने की ताकत को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। बार-बार होने वाले श्वसन व पेट के संक्रमण को रोककर, समय पर टीकाकरण कराकर और मां के पोषण स्तर को सुरक्षित रखकर इस स्थिति को स्थायी रूप से सुधारा जा सकता है।

हॉट कुक्ड मील योजना: आंगनबाड़ी केंद्रों से 32 लाख से अधिक बच्चे लाभान्वित

राज्य में बच्चों को सीधे पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने के लिए 'सक्षम आंगनबाड़ी एवं पोषण-2.0' दिशा-निर्देशों के तहत संचालित हॉट कुक्ड मील योजना ने जमीनी स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस व्यवस्था के माध्यम से 3 से 6 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों को आंगनबाड़ी केंद्रों में नियमित रूप से गर्म, ताजा और पोषक तत्वों से भरपूर पका हुआ भोजन प्रदान किया जा रहा है।

विभागीय आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में लगभग 1.45 लाख सह-स्थित (को-लोकेटेड प्राथमिक विद्यालयों में स्थित) और 0.44 लाख गैर-सह-स्थित (नॉन को-लोकेटेड) आंगनबाड़ी केंद्रों का संचालन हो रहा है। इन दोनों प्रकार के केंद्रों के माध्यम से वर्तमान में राज्य के लगभग 32.88 लाख बच्चों को नियमित भोजन और प्रारंभिक बाल्यकाल देखभाल की सुविधा मिल रही है। स्थानीय स्तर पर पोषक सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित होने से गरीब और वंचित परिवारों के बच्चों में पोषण स्तर सुधर रहा है।

राष्ट्रीय स्तर की तुलना में यूपी की स्थिति

यदि राष्ट्रीय औसत से तुलना की जाए, तो पूरे देश में भी बच्चों के पोषण संकेतकों में सकारात्मक बदलाव देखा गया है। राष्ट्रीय स्तर पर पांच साल से कम आयु वर्ग में नाटापन 35.5 प्रतिशत से कम होकर 29.3 प्रतिशत के स्तर पर आया है। राष्ट्रीय स्तर पर आई 6.2 प्रतिशत की गिरावट की तुलना में उत्तर प्रदेश में 8.2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है, जो राष्ट्रीय सुधार दर से अधिक है।

उल्लेखनीय है कि एनएफएचएस-5 के दौरान प्रदेश में जहां नाटापन 39.7 प्रतिशत था, वहीं 17.3 प्रतिशत बच्चे दुबलेपन (वेस्टिंग - ऊंचाई के अनुपात में कम वजन) और 32.1 प्रतिशत बच्चे कम वजन (अंडरवेट - उम्र के अनुपात में कम वजन) की श्रेणी में दर्ज किए गए थे। स्वास्थ्य और महिला एवं बाल विकास विभाग अब संयुक्त रूप से ग्राम स्वास्थ्य, स्वच्छता एवं पोषण दिवस (वीएचएसएनडी) के जरिए हर बच्चे के वजन और लंबाई की ट्रैकिंग कर रहे हैं, ताकि सैम (अति कुपोषित) और मैम (मध्यम कुपोषित) बच्चों की पहचान कर उन्हें समय रहते पोषण पुनर्वास केंद्रों (एनआरसी) तक पहुंचाया जा सके।

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow

Advertisement
Advertisement