Religious News: निर्बल और दीन-दुखियों की सहायता में लगे धन का सदुपयोग ही सच्चा धर्म- आचार्य संतोष भाई जी
सात दिवसीय संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा का पूर्णाहुति के साथ समापन, सुदामा चरित्र सुनकर भाव-विभोर हुए श्रद्धालु
हरदोई। गल्ला मंडी स्थित श्री राम जानकी मंदिर में पितृपक्ष के अवसर पर आयोजित सात दिवसीय संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा का अंतिम दिन श्रद्धा और भक्ति के वातावरण में संपन्न हुआ। कथा व्यास आचार्य श्री संतोष भाई जी ने श्रद्धालुओं को धन के सदुपयोग, दान की महत्ता, निष्काम भक्ति, सच्ची मित्रता और जीवन में गुरु के महत्व का संदेश दिया। कथा का समापन पूर्णाहुति के साथ हुआ।
आचार्य श्री संतोष भाई जी ने लक्ष्मी के तीन स्वरूपों का वर्णन करते हुए कहा कि एक लक्ष्मी धर्म के मार्ग पर चलकर घर में आती है और सुख-शांति प्रदान करती है। दूसरी लक्ष्मी स्वार्थ की पूर्ति के लिए अर्जित की जाती है, जबकि तीसरी लक्ष्मी पाप के मार्ग से घर में आती है। उन्होंने कहा कि ऐसा धन जो परिवार में क्लेश उत्पन्न करे और दूसरों के दुख का कारण बने, उसका कोई वास्तविक महत्व नहीं है। श्रेष्ठ धन वही है, जो निर्बल, दीन-दुखियों और जरूरतमंदों की सहायता में लगाया जाए।
उन्होंने कहा कि भगवान के सच्चे भक्त अपनी कमाई का एक हिस्सा धर्म और परोपकार के कार्यों में लगाते हैं। धर्म के मार्ग पर किया गया सद्कर्म समाज और मानवता के कल्याण का माध्यम बनता है।
राजा नृग के प्रसंग का वर्णन करते हुए आचार्य जी ने बताया कि राजा नृग ने अपने जीवन में बहुत अधिक दान किया, लेकिन दान की गई गाय के स्वामित्व से जुड़ी भूल के कारण उन्हें अगले जन्म में गिरगिट की योनि प्राप्त हुई। इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने संदेश दिया कि दान करते समय सावधानी, ईमानदारी और धर्म के नियमों का पालन करना आवश्यक है।
सुदामा चरित्र का संगीतमय वर्णन करते हुए आचार्य जी ने कहा कि सुदामा भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त और परम मित्र थे। सुदामा के जीवन में अभिमान नहीं, बल्कि विनम्रता, प्रेम और समर्पण था। उन्होंने कहा कि सच्ची मित्रता में धन-दौलत और पद-प्रतिष्ठा का कोई स्थान नहीं होता। भगवान अपने भक्तों पर अनुग्रह करते हैं और जिन्हें संसार में प्रेम तथा अपनापन नहीं मिलता, वे भी भगवान की शरण में जाकर वास्तविक सुख प्राप्त कर सकते हैं।
आचार्य जी ने भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरुओं का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि मनुष्य प्रकृति और अपने आसपास के जीवन से भी अनेक महत्वपूर्ण शिक्षाएं प्राप्त कर सकता है। पृथ्वी से धैर्य और क्षमा, वायु से अनासक्ति, जल से पवित्रता, अग्नि से संयम तथा सूर्य से समयानुसार ग्रहण और त्याग की शिक्षा मिलती है। उन्होंने कहा कि जीवन में प्रत्येक अनुभव से सीखने की भावना रखनी चाहिए और अपने ज्ञान का उपयोग दूसरों के कल्याण के लिए करना चाहिए।
आचार्य श्री संतोष भाई जी ने कहा कि श्रीमद् भागवत कथा केवल सुनने का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन में भक्ति, सदाचार, सेवा, विनम्रता और परोपकार अपनाने की प्रेरणा है। भगवान के चरणों में समर्पण तथा जरूरतमंदों की सहायता ही मानव जीवन को सार्थक बनाती है।
इसी के साथ पिछले सात दिनों से चल रही संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा का विधिवत पूर्णाहुति के साथ समापन हुआ। इस अवसर पर मुख्य रूप से उमेश अग्रवाल पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष, गुलशन गुप्ता, पंकज गुप्ता, अरुण गुप्ता, राजेंद्र भाई पटेल, अपूर्व माहेश्वरी सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं भक्तजन उपस्थित रहे।
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