Delhi High Court on Defamation Case: बिना सत्यापन पोस्ट करना उचित नहीं, मानहानि मामले में कोर्ट की आप नेताओं और गौरव भाटिया को नसीहत
दिल्ली हाईकोर्ट ने भाजपा प्रवक्ता गौरव भाटिया की मानहानि याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि तथ्यों के सत्यापन के बिना सोशल मीडिया पर पोस्ट करना उचित नहीं है।
- गौरव भाटिया मानहानि केस: दिल्ली हाईकोर्ट ने आप नेताओं को दी तथ्य जांचने की सलाह, दोनों पक्षों को संयम बरतने का निर्देश
- 'तथ्य जांचे बिना पोस्ट न करें'... मानहानि मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने आप नेताओं और गौरव भाटिया से क्या कहा?
- मानहानि मामला: बिना पुष्टि के सोशल मीडिया पोस्ट करने पर दिल्ली हाईकोर्ट सख्त, आप नेताओं और गौरव भाटिया को दी नसीहत
दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोशल मीडिया पर सार्वजनिक हस्तियों द्वारा की जाने वाली बयानबाजी और व्यक्तिगत टिप्पणियों को लेकर गंभीर रुख अख्तियार किया है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय प्रवक्ता और वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया द्वारा दायर मानहानि याचिका पर सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने आम आदमी पार्टी (आप) के नेताओं को स्पष्ट रूप से परामर्श दिया कि तथ्यों की आधिकारिक पुष्टि और सत्यापन किए बिना किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध डिजिटल मंचों पर सामग्री पोस्ट करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। इसके साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ता गौरव भाटिया को भी यह स्मरण कराया कि एक सार्वजनिक जीवन जीने वाले व्यक्ति और वरिष्ठ अधिवक्ता के तौर पर उन्हें सार्वजनिक मंचों पर संवाद करते समय उच्च स्तर के संयम और गरिमा का परिचय देना चाहिए।
न्यायमूर्ति की एकल पीठ के समक्ष हुई इस सुनवाई में अदालत ने कहा कि राजनीतिक संवाद या सार्वजनिक विमर्श में व्यक्तिगत मान-मर्यादा को ठेस पहुंचाने वाले दावों को बिना आधार के प्रसारित नहीं किया जाना चाहिए। सोशल मीडिया के इस दौर में किसी भी अपुष्ट वीडियो या बयान को साझा करने से पहले प्राथमिक स्तर पर यह सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है कि जो बात सार्वजनिक पटल पर रखी जा रही है, उसकी सत्यता क्या है।
इस कानूनी विवाद की शुरुआत उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) स्थित जिला अदालत परिसर में हुई एक घटना से जुड़ी है। कुछ समय पहले एक न्यायिक मामले के सिलसिले में गौरव भाटिया गौतम बुद्ध नगर की जिला अदालत में पेश होने पहुंचे थे। उस दौरान स्थानीय बार एसोसिएशन द्वारा किसी स्थानीय मुद्दे को लेकर हड़ताल का आह्वान किया गया था। आरोप है कि अदालत परिसर में कुछ वकीलों के साथ गौरव भाटिया की कहासुनी हुई और उनके साथ धक्का-मुक्की तथा कॉलर पकड़ने जैसी अप्रिय स्थिति उत्पन्न हुई।
इस पूरे घटनाक्रम को लेकर बाद में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी संज्ञान लिया था और वकीलों द्वारा एक साथी अधिवक्ता के साथ किए गए ऐसे दुर्व्यवहार पर नाराजगी जताई थी। हालांकि, इसी दौरान सोशल मीडिया पर इस घटना से जुड़े कई वीडियो और टिप्पणियां तेजी से प्रसारित होने लगीं। आम आदमी पार्टी के कई प्रमुख नेताओं और सोशल मीडिया विंग के सदस्यों ने इन वीडियो और घटनाक्रम को साझा करते हुए राजनीतिक स्तर पर टिप्पणियां शुरू कर दीं। गौरव भाटिया का आरोप था कि इन बयानों और पोस्टों में जानबूझकर घटना को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया और उनके मान-सम्मान को ठेस पहुंचाने के उद्देश्य से अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया गया।
- याचिकाकर्ता गौरव भाटिया का अदालत में पक्ष
उच्च न्यायालय में गौरव भाटिया की ओर से पक्ष रखते हुए दलील दी गई कि वे न केवल एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल के आधिकारिक प्रवक्ता हैं, बल्कि देश की शीर्ष अदालतों में वकालत करने वाले एक वरिष्ठ अधिवक्ता भी हैं। उनकी ओर से अदालत को अवगत कराया गया कि प्रतिवादियों जिनमें आम आदमी पार्टी के नेता और कुछ यूट्यूबर्स व सोशल मीडिया हैंडल शामिल हैं ने एक समन्वित अभियान चलाकर उनकी छवि को धूमिल करने का प्रयास किया।
भाटिया की कानूनी टीम ने अदालत के समक्ष तर्क रखा कि सोशल मीडिया पर शेयर किए गए पोस्ट और वीडियो में तथ्यात्मक शुद्धता का पूरी तरह अभाव था। जो घटना अदालत परिसर में घटी, उसे एक अलग संदर्भ देकर राजनीतिक लाभ लेने के लिए इस्तेमाल किया गया। याचिका में मांग की गई कि ऐसे मानहानिकारक और भ्रामक पोस्टों को डिजिटल प्लेटफॉर्मों से तत्काल हटाने (टेकडाउन) के निर्देश दिए जाएं और संबंधित व्यक्तियों को भविष्य में उनके खिलाफ इस तरह की आधारहीन सामग्री पोस्ट करने से रोका जाए। इसके साथ ही उन्होंने हर्जाने और सार्वजनिक माफी की भी कानूनी मांग रखी।
- दिल्ली उच्च न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणियां और आप नेताओं को सलाह
याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय की पीठ ने डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर राजनीतिक नेताओं द्वारा की जाने वाली बयानबाजी पर गहरी चिंता व्यक्त की। अदालत ने कहा कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता अपनी जगह हो सकती है, लेकिन जब किसी व्यक्ति के चरित्र या उसकी पेशेवर प्रतिष्ठा पर सवाल खड़े किए जाते हैं, तो उससे पहले तथ्यों की स्वतंत्र रूप से जांच करना अनिवार्य कर्तव्य बन जाता है।
अदालत ने प्रतिवादी नेताओं को सलाह देते हुए कहा कि किसी वीडियो क्लिप को इंटरनेट पर देखकर बिना यह जाने कि उसका पूरा संदर्भ क्या है, उस पर टिप्पणी करना और दूसरों की छवि पर हमला बोलना सही परंपरा नहीं है। पीठ ने रेखांकित किया कि राजनीतिक दलों के पदाधिकारियों के सोशल मीडिया पर लाखों फॉलोअर्स होते हैं, इसलिए उनके द्वारा किया गया एक भी अपुष्ट पोस्ट जनता के बीच तेजी से भ्रामक धारणा तैयार कर देता है। इसलिए एक जिम्मेदार राजनीतिक दल के प्रतिनिधियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे किसी भी संवेदनशील सामग्री को साझा करने से पहले उसकी सत्यता का न्यूनतम सत्यापन अवश्य करें।
- गौरव भाटिया के प्रति अदालत और सार्वजनिक जीवन की गरिमा
सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने केवल प्रतिवादियों तक ही अपनी टिप्पणियों को सीमित नहीं रखा, बल्कि याचिकाकर्ता गौरव भाटिया के आचरण और उनके सार्वजनिक संवाद की भाषा पर भी बात की। पीठ ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले व्यक्तियों को अक्सर आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है और इसके लिए सहनशीलता का दायरा थोड़ा व्यापक होना चाहिए।
अदालत ने गौरव भाटिया को संबोधित करते हुए कहा कि एक वरिष्ठ अधिवक्ता और प्रमुख राजनीतिक दल के प्रवक्ता के रूप में समाज में उनकी एक विशेष पहचान है। जब वे स्वयं टेलीविजन बहसों या सार्वजनिक मंचों पर संवाद करते हैं, तो उन्हें भी अपनी शब्दावली और लहजे में मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए। अदालत का संकेत था कि सार्वजनिक विमर्श में दोनों पक्षों की ओर से संयम बरता जाना चाहिए ताकि राजनीतिक संवाद का स्तर न गिरे। जब एक पक्ष आक्रामक या कटु भाषा का प्रयोग करता है, तो उससे प्रतिशोध की भावना को बढ़ावा मिलता है, जिससे बचा जाना आवश्यक है।
- प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही और टेकडाउन निर्देश
मामले में सोशल मीडिया कंपनियों (जैसे एक्स और यूट्यूब आदि) की भूमिका पर भी चर्चा हुई। उच्च न्यायालय ने पूर्व में दिए गए अंतरिम आदेशों का संदर्भ लेते हुए कहा कि यदि कोई सामग्री प्रत्यक्ष रूप से मानहानिकारक पाई जाती है या अदालत द्वारा उसे हटाने का आदेश दिया जाता है, तो इंटरमीडियरी प्लेटफॉर्मों को उसका समयबद्ध पालन करना चाहिए।
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस पहलू पर भी विचार किया कि क्या इंटरनेट पर मौजूद सामग्री से याचिकाकर्ता की अपूरणीय क्षति हो रही है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार संविधान के तहत संरक्षित है, लेकिन यह अधिकार किसी की प्रतिष्ठा को गैर-कानूनी तरीके से नुकसान पहुंचाने का असीमित लाइसेंस नहीं देता। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्ति की प्रतिष्ठा की सुरक्षा के बीच संतुलन साधना अदालत का प्राथमिक उद्देश्य है।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों की प्राथमिक दलीलों को सुनने के बाद मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया तय की है। अदालत ने आप नेताओं और अन्य संबंधित प्रतिवादियों को निर्देश दिया है कि वे अदालत की टिप्पणियों को ध्यान में रखें और याचिका के संबंध में अपना औपचारिक जवाब दाखिल करें।
अदालत ने दोनों पक्षों से कहा कि वे अनावश्यक तनाव को बढ़ावा देने के बजाय मामले को सौहार्दपूर्ण तरीके से देखने का प्रयास करें। यदि किसी पोस्ट में तथ्यात्मक त्रुटि है, तो उसे स्वयं सुधारना या हटाना एक परिपक्व कदम हो सकता है। मामले की अगली सुनवाई के लिए अदालत ने आगे की तारीख तय की है, जिसमें यह तय किया जाएगा कि किन विशिष्ट यूआरएल और पोस्टों को स्थायी रूप से हटाने की आवश्यकता है और क्या मानहानि के दावों पर कोई अंतरिम निषेधाज्ञा जारी की जानी चाहिए।.
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