Special Article: Gen Z होने के नाम पर बच्चों को बिगड़ने न दें, Gen Z होने पर गर्व कीजिए, लेकिन संस्कारों से समझौता मत कीजिए
आज की पीढ़ी तेज है। वह दुनिया को अपनी हथेली पर रखती है। मोबाइल उसका पुस्तकालय है, इंटरनेट उसका शिक्षक और
लेखक – धीरज कश्यप (स्वतंत्र पत्रकार)
आज की पीढ़ी तेज है। वह दुनिया को अपनी हथेली पर रखती है। मोबाइल उसका पुस्तकालय है, इंटरनेट उसका शिक्षक और सोशल मीडिया उसकी अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा मंच। वह सवाल पूछती है, अपनी राय रखती है और पुरानी धारणाओं को चुनौती देने से भी नहीं डरती। यही पीढ़ी Gen Z कहलाती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या आधुनिक होना, स्वतंत्र विचार रखना और अपनी बात कहने का अधिकार हमें अभद्रता, अपमान और संस्कारहीनता की छूट भी देता है? बिल्कुल नहीं। Gen Z होना किसी बच्चे को माता-पिता को उल्टा जवाब देने, बड़ों का अपमान करने या सार्वजनिक जीवन में किसी के लिए अपशब्द बोलने का लाइसेंस नहीं देता। समय बदल सकता है, तकनीक बदल सकती है और बातचीत के तरीके बदल सकते हैं, लेकिन सम्मान, संयम, अनुशा
हाल के दिनों में Gen Z से जुड़े एक आंदोलन ने इस सवाल को और गंभीर बना दिया। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) नाम से सामने आए इस युवा आंदोलन ने शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर सहित कई स्थानों पर प्रदर्शन किए। आंदोलन के दौरान युवाओं की बड़ी संख्या सोशल मीडिया के माध्यम से जुड़ी और उनकी डिजिटल शैली ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया। लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना युवाओं का अधिकार है। व्यवस्था में सुधार की मांग करना भी गलत नहीं है। बल्कि जागरूक युवा लोकतंत्र की ताकत होते हैं। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में एक दूसरा पक्ष भी सामने आया- कुछ युवाओं द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी दिवंगत माता के प्रति कथित रूप से अपशब्दों का प्रयोग।
प्रधानमंत्री मोदी ने बाद में सोशल मीडिया पर युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि वे उन बच्चों को माफ करते हैं और उन्हें भटकने के बजाय देश के लिए आगे बढ़ने, कुछ नया सीखने और अपनी गलतियों से सीखने का आह्वान किया। यह प्रसंग केवल राजनीति का विषय नहीं है। इसे हमें परिवार और पालन-पोषण के आईने में भी देखना चाहिए। हम अक्सर बच्चों की हर गलती को यह कहकर टाल देते हैं - आजकल के बच्चे हैं, Gen Z है , इनका यही तरीका है , बच्चों को ज्यादा रोकना-टोकना ठीक नहीं। धीरे-धीरे यही छूट आदत बन सकती है। बच्चा बहस करता है तो हम हंसकर छोड़ देते हैं। वह माता-पिता को ऊंची आवाज में जवाब देता है तो हम कहते हैं-आजकल बच्चे अपनी बात खुलकर रखते हैं। वह सोशल मीडिया पर किसी का अपमान करता है तो हम उसे उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मान लेते हैं। यहीं से समस्या शुरू होती है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अभद्रता में अंतर है। असहमति और अपमान में अंतर है। आत्मविश्वास और अहंकार में अंतर है।हमारे माता-पिता और दादा-दादी के समय में संसाधन कम थे, लेकिन रिश्तों की गर्माहट अधिक थी। घर में बड़े-बुजुर्गों के सामने बैठने का तरीका सिखाया जाता था। भोजन की थाली में पहला निवाला किसका होगा, घर में अतिथि आए तो कैसे व्यवहार करना है, किसी से असहमति हो तो किस भाषा में बात करनी है—ये बातें किसी किताब में नहीं, बल्कि परिवार के व्यवहार से सीखी जाती थीं।
आज बच्चे डिजिटल दुनिया में पल रहे हैं। उनके सामने हर दिन हजारों तरह की सामग्री आती है। ऐसे में माता-पिता की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।Parenting का अर्थ केवल बच्चे को अच्छी शिक्षा, महंगे कपड़े और स्मार्टफोन देना नहीं है। Parenting का अर्थ चरित्र निर्माण भी है। बच्चे को यह सिखाना होगा कि सवाल पूछो, लेकिन सम्मान के साथ। अपनी बात रखो, लेकिन भाषा की मर्यादा के भीतर। अन्याय का विरोध करो, लेकिन हिंसा और गाली का सहारा मत लो। किसी नेता से असहमति हो सकती है, किसी विचारधारा से मतभेद हो सकता है, लेकिन किसी व्यक्ति की मां, परिवार या निजी जीवन को निशाना बनाना लोकतांत्रिक असहमति नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि Gen Z को केवल नकारात्मक नजरिए से देखना भी गलत होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी जनवरी 2026 में Gen Z के बारे में साझा किए गए एक लेख के संदर्भ में कहा था कि युवा अपनी ऊर्जा को बेहतर उद्देश्यों में लगा रहे हैं। स्वच्छ भारत, हर घर तिरंगा, मेरी माटी मेरा देश और नशा मुक्त भारत जैसे अभियानों में युवाओं की भागीदारी को भी रेखांकित किया गया।यानी समस्या Gen Z होने में नहीं है; समस्या इस बात में है कि उस ऊर्जा का इस्तेमाल किस दिशा में हो रहा है।
यही ऊर्जा कोई युवा गांव के बच्चों को पढ़ाने में लगाए तो वह समाज बदल सकता है। कोई युवा तकनीक सीखकर रोजगार पैदा करे तो परिवार बदल सकता है। कोई बेटी खेल के मैदान में देश के लिए पदक जीते तो करोड़ों बच्चों को प्रेरणा मिल सकती है। कोई युवा पर्यावरण के लिए अभियान चलाए तो आने वाली पीढ़ियां लाभान्वित हो सकती हैं।इसलिए बच्चों से यह मत कहिए कि तुम्हें कुछ कहने का अधिकार नहीं। बल्कि कहिए तुम्हें अपनी बात कहने का पूरा अधिकार है, लेकिन अपनी बात कहने की मर्यादा भी सीखो।
माता-पिता को भी अपने व्यवहार पर विचार करना होगा। बच्चे वही सीखते हैं जो वे घर में देखते हैं। यदि माता-पिता स्वयं असहमति में गाली देते हैं, दूसरों का अपमान करते हैं और हर विवाद को क्रोध से हल करते हैं, तो बच्चे से केवल संस्कारों की उम्मीद करना कठिन होगा। इसलिए आज जरूरत बच्चों को रोकने की नहीं, उन्हें सही दिशा देने की है।
Gen Z है तो अपनी प्रतिभा से पहचान बनाए।
Gen Z है तो माता-पिता को अपने ऊपर गर्व करने का अवसर दे।
Gen Z है तो समाज में सकारात्मक बदलाव की मिसाल बने।
Gen Z है तो देश की समस्याओं के समाधान का हिस्सा बने।
Gen Z है तो सवाल पूछे - लेकिन शालीनता के साथ।
Gen Z है तो विरोध करे - लेकिन लोकतांत्रिक मर्यादा के साथ।
आखिरकार, किसी पीढ़ी की पहचान केवल उसके कपड़ों, मोबाइल, भाषा या सोशल मीडिया ट्रेंड से नहीं होती। उसकी असली पहचान उसके चरित्र, व्यवहार और जिम्मेदारी से होती है। इसलिए Gen Z होने पर गर्व जरूर कीजिए, लेकिन बच्चों की हर गलती को Gen Z कहकर सही ठहराना बंद कीजिए।
उन्हें आधुनिक बनाइए, लेकिन संस्कारहीन नहीं।
उन्हें आत्मनिर्भर बनाइए, लेकिन अहंकारी नहीं।
उन्हें सवाल पूछना सिखाइए, लेकिन अपमान करना नहीं।
उन्हें आजाद बनाइए, लेकिन जिम्मेदारी से दूर नहीं।
क्योंकि आने वाला भारत इन्हीं युवाओं के हाथों में है। Gen Z होने पर गर्व कीजिए… लेकिन संस्कारों से समझौता मत कीजिए।
Also Read- Special Article: पेपर लीक बहस के दौरान विपक्षी दलों ने खोया सुनहरा अवसर
What's Your Reaction?







