हिंदी भाषा पर अनूठी रचना: आचार्य संजीव सलिल ने काव्यात्मक आरती में पिरोए व्याकरण और संस्कृति के सूत्र
साहित्यकार आचार्य संजीव सलिल ने हिंदी भाषा पर वंदना रूपी काव्य रचना की है। इसमें देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता और व्याकरण के नियमों को छंदबद्ध किया गया है।
रचनाकार : आचार्य संजीव वर्मा "सलिल"
प्रसिद्ध साहित्यकार और विद्वान आचार्य संजीव वर्मा सलिल ने जनभाषा हिंदी की महत्ता, उसकी समृद्ध व्याकरणिक संरचना और सांस्कृतिक विस्तार को लेकर एक विशेष काव्यात्मक आरती की रचना की है। यह रचना सामान्य स्तुति गीतों से बिल्कुल भिन्न है क्योंकि इसमें भक्ति और आस्था के पारंपरिक स्वरूप के साथ-साथ हिंदी की वर्णमाला, उच्चारण विज्ञान, लिपि की विशिष्टता और व्याकरण के मूलभूत सिद्धांतों को अत्यंत सरल व लयबद्ध शब्दों में प्रस्तुत किया गया है।
रचनाकार ने अपनी लेखनी के माध्यम से स्पष्ट किया है कि हिंदी केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं बल्कि करोड़ों लोगों के दैनिक संवाद की धुरी और लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल चेतना है। रचना में देवनागरी लिपि के वैज्ञानिक आधार पर विशेष बल दिया गया है, जहां जो ध्वनि उच्चारित होती है, ठीक वही रूप अक्षरों में अंकित किया जाता है। स्वर और व्यंजन के संतुलन के साथ-साथ स्पर्श व्यंजनों के पांचों वर्गों के सटीक उच्चारण को काव्य पंक्तियों में कुशलतापूर्वक पिरोया गया है, जिससे भाषा सीखने वालों के लिए भी यह रचना एक ज्ञानवर्धक माध्यम बनती है।
आचार्य संजीव वर्मा "सलिल" की मूल रचना-
भारती भाषा प्यारी की।
आरती हिन्दी न्यारी की...
०
'लोक' की भाषा है हिंदी,
'तंत्र' की आशा है हिंदी।
करोड़ों जिव्हाओं-आसीन
न कोई सकता इसको छीन।
ब्रम्ह की, विष्णु-पुरारी की
आरती हिन्दी न्यारी की।।
०
वाक्-ध्वनि हिंदी का आधार,
पाँच वर्गों बाँटे उच्चार।
बोलते जो वह लिखते आप-
वर्तनी स्वर-व्यंजन अनुसार।
नागरी लिपि सुविचारी की
आरती हिंदी न्यारी की।।
०
एकता पर हिंदी बलिहार,
वचन दो लिंग क्रिया व्यापार।
संधियाँ काल शक्ति हैं तीन-
विशेषण हैं हिंदी में चार।
पाँच अव्यय व्यवहारी की
आरती हिंदी न्यारी की।।
०
वर्ण हिंदी के अति सोहें,
शब्द मानव मन को मोहें।
काव्य रचना सुडौल सुन्दर
वाक्य लेते सबका मन हर।
छंद-सुमनों की क्यारी की
आरती हिंदी न्यारी की।।
०
समेटे ज्ञान-नीति-विज्ञान,
सीख-पढ़-लिख हों हम विद्वान।
विषय जो कठिन जटिल नीरस-
बना देती हिंदी रसवान।
विश्ववाणी गुणकारी की
आरती हिंदी न्यारी की।।
कविता में हिंदी व्याकरण के विविध आयामों जैसे दो वचन, दो लिंग, तीन काल, तीन संधियां, चार विशेषण और पांच प्रकार के अव्ययों के व्यावहारिक पक्ष को बेहद सुरुचिपूर्ण ढंग से समाहित किया गया है। लेखक का मानना है कि साहित्य, कला और विज्ञान जैसे गूढ़ तथा दुरूह विषयों को भी जनसुलभ और रसपूर्ण बनाने में हिंदी पूरी तरह सक्षम है। वैश्विक पटल पर संपर्क भाषा के रूप में तेजी से उभरती हिंदी की इस स्तुति को साहित्य जगत में भाषा की वैज्ञानिकता और गरिमा को सहजता से समझाने वाले एक उत्कृष्ट प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
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