गोमती पुस्तक महोत्सव: पार्थ सारथी सेन शर्मा बोले- युवाओं को संबल देता है साहित्य, लखनऊ पर लिखेंगे ऐतिहासिक उपन्यास
गोमती पुस्तक महोत्सव में अपर मुख्य सचिव पार्थ सारथी सेन शर्मा ने साहित्यिक अनुभव साझा किए। उन्होंने लखनऊ के इतिहास पर उपन्यास लिखने की योजना बताई।
लखनऊ। गोमती पुस्तक महोत्सव के वैचारिक सत्र ‘अनुभव, विचार और संवाद’ के अंतर्गत वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी एवं साहित्यकार पार्थ सारथी सेन शर्मा ने अपनी रचनात्मक यात्रा, प्रशासनिक अनुभवों और समकालीन चुनौतियों पर विस्तृत विचार साझा किए। बेसिक एवं माध्यमिक शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव के दायित्व के साथ साहित्य सृजन में निरंतर सक्रिय पार्थ सारथी सेन शर्मा ने सत्र में अपनी विभिन्न चर्चित पुस्तकों के रचनाक्रम और जीवन दृष्टि से श्रोताओं को परिचित कराया। कार्यक्रम का संचालन चंद्रशेखर वर्मा ने किया, जिनके सारगर्भित संवाद ने परिचर्चा को अत्यंत विचारोत्तेजक बना दिया।
संवाद के दौरान लेखक की प्रमुख कृतियों जैसे ‘लव इन लखनऊ’, ‘अंडमान-अंडमानुष सफर का उपन्यासनामा’, ‘लव साइड बाय साइड’, ‘द विकसित भारत क्विज’, ‘हम हैं राही प्यार के’, ‘मुसाफिर हूँ यारो’, ‘लखनऊ डायरीज’ और ‘एक कदम हजार अफसाने’ के संदर्भों पर गहन चर्चा हुई। उन्होंने बताया कि ‘लव इन लखनऊ’ को आज की युवा पीढ़ी और किशोरों की भावनात्मक चुनौतियों को ध्यान में रखकर लिखा गया है। वर्तमान दौर में व्यक्तिगत रिश्तों में आने वाले उतार-चढ़ाव और निराशा के कारण युवा अक्सर जानलेवा और आत्मघाती कदम उठा लेते हैं। ऐसे संकट के क्षणों में साहित्य और अध्ययन मन को संबल प्रदान करने, जीवन मूल्यों को समझाने और सकारात्मक सोच विकसित करने में सबसे प्रभावी माध्यम सिद्ध होता है। इसके साथ ही उन्होंने अंडमान द्वीप समूह के अपने प्रशासनिक कार्यकाल के संस्मरणों को भी पाठकों के सम्मुख रखा।
राजधानी के सांस्कृतिक बदलावों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि लखनऊ अपने भीतर सदियों की तहजीब और ऐतिहासिक घटनाओं को समेटे हुए है। दो दशक पूर्व का परिवेश, जीवनशैली और आज का आधुनिक स्वरूप एक बड़े बदलाव को दर्शाते हैं। उन्होंने आने वाले समय में लखनऊ की पृष्ठभूमि पर वर्ष 1916 से लेकर अब तक के सामाजिक-ऐतिहासिक परिवर्तनों को समेटते हुए एक वृहद उपन्यास लिखने की अपनी योजना भी साझा की।
वर्तमान दौर में कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई के बढ़ते प्रभाव पर उन्होंने सचेत करते हुए कहा कि तकनीकी उपकरण कभी भी मानवीय संवेदनाओं, गहन अनुभूतियों और सूक्ष्म भावों को उनके मूल स्वरूप में प्रकट नहीं कर सकते। समाज और साहित्य के वास्तविक स्वरूप को जीवित रखने के लिए हमें अपनी क्षेत्रीय और मातृभाषाओं को स्वयं सशक्त बनाना होगा। मौलिक भाषा और मानवीय संवेदना का संरक्षण ही साहित्य का वास्तविक आधार है। सत्र के अंत में उपस्थित पुस्तक प्रेमियों और युवाओं ने लेखक के संवेदनशील प्रशासनिक दृष्टिकोण और साहित्यिक सृजन की सराहना की।
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