Karnataka News: आरएसएस पथ संचलन में हिस्सा लेने पर दो शिक्षकों पर गिरी गाज, शिक्षा विभाग ने सर्विस रूल्स उल्लंघन पर किया सस्पेंड

Karnataka News: कर्नाटक के शिक्षा विभाग ने आरएसएस के पथ संचलन में शामिल होने पर दो सरकारी शिक्षकों को निलंबित कर दिया है। विभाग ने इसे सेवा नियमावली का उल्लंघन माना।

Aug 28, 2026 - 12:23
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Karnataka News: आरएसएस पथ संचलन में हिस्सा लेने पर दो शिक्षकों पर गिरी गाज, शिक्षा विभाग ने सर्विस रूल्स उल्लंघन पर किया सस्पेंड
  • Karnataka Government Suspends Two Teachers For Attending RSS Path Sanchalan: कर्नाटक में आरएसएस के कार्यक्रम में शामिल होने पर दो सरकारी शिक्षक निलंबित
  • आरएसएस के कार्यक्रम में जाना पड़ा भारी, कर्नाटक सरकार ने दो सरकारी शिक्षकों को किया निलंबित; जानिए पूरा मामला
  • Karnataka Breaking: आरएसएस के पथ संचलन में शामिल होने के आरोप में दो सरकारी शिक्षक निलंबित, शिक्षा विभाग ने सेवा नियमों के उल्लंघन का दिया हवाला

कर्नाटक के शिक्षा विभाग ने सरकारी सेवा नियमों के कथित उल्लंघन के मामले में सख्त कदम उठाते हुए दो सरकारी शिक्षकों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। दोनों शिक्षकों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) द्वारा आयोजित एक 'पथ संचलन' में भाग लेने का आरोप है। विभागीय अधिकारियों के अनुसार, सरकारी कर्मचारियों के लिए तय आचार संहिता के तहत राजनीतिक या सामाजिक संगठनों के ऐसे सार्वजनिक आयोजनों में प्रत्यक्ष भागीदारी की अनुमति नहीं है। हालांकि शिक्षकों ने अपनी सफाई में कार्यक्रम को केवल सांस्कृतिक गतिविधि बताया था, लेकिन प्रशासन ने उनकी दलीलों को खारिज करते हुए निलंबन का आदेश जारी कर दिया। इस प्रशासनिक निर्णय के बाद राज्य के राजनीतिक और सामाजिक हलकों में नई बहस छिड़ गई है।

कर्नाटक राज्य के प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा विभाग ने प्रशासनिक अनुशासन को बनाए रखने के उद्देश्य से दो सेवारत सरकारी शिक्षकों को सेवा से निलंबित कर दिया है। यह कार्रवाई उन दोनों शिक्षकों के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के एक पथ संचलन कार्यक्रम में भाग लेने की पुष्टि होने के बाद की गई है। शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने जांच रिपोर्ट के आधार पर पाया कि शिक्षकों की यह गतिविधि राज्य सिविल सेवा आचरण नियमावली (Karnataka Civil Services Conduct Rules) के तय प्रावधानों के विपरीत है।

राज्य सेवा नियमावली के अनुसार, किसी भी सरकारी कर्मचारी को ऐसे संगठनों के आयोजनों या गतिविधियों में सीधे तौर पर शामिल होने की मनाही होती है, जिनका स्वरूप राजनीतिक या वैचारिक माना जाता है। विभाग का स्पष्ट मत है कि सरकारी शिक्षकों और कर्मचारियों को पूरी तरह से निष्पक्ष और नियमों के दायरे में रहकर अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करना चाहिए। इसी के तहत विभाग ने मामले की प्राथमिक जांच के बाद दोनों शिक्षकों के खिलाफ दंडात्मक आदेश पारित किया।

यह पूरा मामला तब सामने आया जब स्थानीय स्तर पर आयोजित आरएसएस के पथ संचलन के दौरान सरकारी स्कूल में पदस्थापित दोनों शिक्षकों की मौजूदगी की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया व स्थानीय प्रशासनिक तंत्र के संज्ञान में आए। इसके बाद स्थानीय नागरिकों और विभागीय अधिकारियों के स्तर से इस पर आपत्ति जताई गई। शिकायत दर्ज होने के बाद जिला शिक्षा अधिकारी और संबंधित ब्लॉक शिक्षा अधिकारी ने मामले का संज्ञान लिया और दोनों शिक्षकों से औपचारिक स्पष्टीकरण मांगा।

विभागीय नोटिस का जवाब देते हुए संबंधित शिक्षकों ने अपना पक्ष मजबूती से रखा। उन्होंने तर्क दिया कि आरएसएस का पथ संचलन एक पूर्णतः अनुशासित और सांस्कृतिक कार्यक्रम था और इसमें किसी भी प्रकार का राजनीतिक प्रचार-प्रसार या चुनावी एजेंडा शामिल नहीं था। शिक्षकों का कहना था कि उन्होंने केवल सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से इसमें अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी, इसलिए इसे सेवा नियमों के उल्लंघन के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

हालांकि, शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों ने विस्तृत समीक्षा के बाद शिक्षकों द्वारा दी गई इस सफाई को अपर्याप्त और नियमों के प्रतिकूल माना। विभाग ने स्पष्ट किया कि सिविल सेवा नियमों के तहत सरकारी सेवकों को इस प्रकार के आयोजनों में शरीक होने से बचने के स्पष्ट निर्देश हैं। परिणामस्वरूप, जांच कमेटी की सिफारिश पर दोनों शिक्षकों को औपचारिक आदेश जारी कर तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया।

इस प्रशासनिक कार्रवाई के बाद राज्य में राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर बयानों का दौर शुरू हो गया है। राज्य सरकार और शिक्षा विभाग के प्रतिनिधियों का कहना है कि यह कदम किसी पूर्वाग्रह से प्रेरित नहीं है, बल्कि सरकारी सेवा नियमावली का अक्षरशः पालन सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है। अधिकारियों का मानना है कि यदि सरकारी कर्मियों को ऐसे आयोजनों में छूट दी गई तो इससे प्रशासनिक निष्पक्षता और शिक्षण संस्थानों के धर्मनिरपेक्ष माहौल पर असर पड़ सकता है।

दूसरी तरफ, शिक्षक संघों के कुछ वर्गों और विपक्षी दलों के नेताओं ने इस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है। विपक्ष का तर्क है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक पंजीकृत सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी संगठन है और संविधान के तहत प्रत्येक नागरिक को अपने खाली समय में सांस्कृतिक गतिविधियों में शामिल होने का व्यक्तिगत अधिकार है। आलोचकों का कहना है कि सरकार इस मुद्दे पर दोहरा रवैया अपना रही है और शिक्षकों के खिलाफ की गई यह कार्रवाई अनुचित तथा दंडात्मक है।

वहीं निलंबित शिक्षकों ने संकेत दिए हैं कि वे इस निलंबन आदेश के खिलाफ प्रशासनिक न्यायाधिकरण (KAT) या उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के कानूनी विकल्पों पर विचार कर रहे हैं, ताकि वे अपना पक्ष आधिकारिक न्यायिक मंच पर रख सकें।

इस प्रशासनिक फैसले का प्रभाव कर्नाटक के प्रशासनिक तंत्र, शिक्षा जगत और राज्य की राजनीति पर व्यापक रूप से देखने को मिल रहा है। सरकारी विभागों में अब इस बात को लेकर कड़ा संदेश गया है कि सेवा आचरण नियमों के पालन में किसी भी प्रकार की ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। खासकर शिक्षण संस्थानों से जुड़े कर्मचारियों के लिए यह आदेश एक नजीर के तौर पर देखा जा रहा है।

राजनीतिक रूप से भी यह मुद्दा राज्य विधानसभा और सार्वजनिक चर्चाओं में गर्माने के आसार हैं। सत्ता पक्ष जहां इसे प्रशासनिक सुचिता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा बता रहा है, वहीं विपक्षी दल इसे वैचारिक असहिष्णुता करार देकर सरकार की घेराबंदी करने की योजना बना रहे हैं। इसके अलावा, राज्यभर के शिक्षक संगठनों में इस बात को लेकर मंथन शुरू हो गया है कि सरकारी सेवा में रहते हुए व्यक्तिगत और सांस्कृतिक स्वतंत्रता की सीमाएं क्या होनी चाहिए।

निलंबन की औपचारिक घोषणा के बाद अब शिक्षा विभाग के स्तर पर इस मामले की विस्तृत विभागीय जांच (Departmental Inquiry) शुरू की जाएगी। जांच अधिकारी दोनों शिक्षकों के सेवा रिकॉर्ड, उनकी उपस्थिति और घटना से जुड़े सभी दस्तावेजी साक्ष्यों की गहन समीक्षा करेंगे। इस आंतरिक जांच की अंतिम रिपोर्ट के आधार पर ही यह तय होगा कि शिक्षकों पर क्या स्थायी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए या उन्हें चेतावनी देकर बहाल किया जाए।

दूसरी ओर, कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि शिक्षक इस आदेश को अदालत में चुनौती देते हैं, तो अदालत में सरकारी कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों और सेवा नियमावली के बीच के कानूनी पहलुओं पर महत्वपूर्ण सुनवाई हो सकती है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि विभागीय जांच किस निष्कर्ष पर पहुंचती है और राजनीतिक स्तर पर यह विवाद क्या मोड़ लेता है।

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