NEET PG 2025-26 Qualifying Criteria: केंद्र के फैसले की जांच करेगा सुप्रीम कोर्ट, जस्टिस नरसिम्हा की बेंच ने दिए सख्त निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने NEET PG के क्वालिफाइंग कट-ऑफ को घटाने के केंद्र सरकार के फैसले पर रिपोर्ट तलब की है। जस्टिस पी नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने केंद्र को दो हफ्ते का समय दिया है।
यह मामला न्यायमूर्ति पी. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की दो सदस्यीय खंडपीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध था। यह कानूनी विवाद 'हरिशरण देवगन एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य' शीर्षक वाली याचिका के माध्यम से शीर्ष अदालत पहुंचा है। याचिकाकर्ताओं ने केंद्र सरकार और संबंधित प्राधिकारियों द्वारा काउंसलिंग के अंतिम चरणों में कट-ऑफ परसेंटाइल को घटाए जाने के फैसले की वैधानिकता और चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ने वाले असर को लेकर गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई हैं।
क्या है पूरा विवाद और याचिकाकर्ताओं की दलील?
हर वर्ष नीट पीजी काउंसलिंग के दौरान बड़ी संख्या में सुपर स्पेशियलिटी और पीजी सीटें खाली रह जाने का हवाला देकर राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) और स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा न्यूनतम अर्हक अंक (कट-ऑफ परसेंटाइल) में भारी कटौती की जाती रही है। कई बार यह कटौती शून्य या अत्यंत निचले स्तर तक पहुंच जाती है, ताकि निजी और सरकारी मेडिकल कॉलेजों की रिक्त सीटों को भरा जा सके।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने दलील दी कि परीक्षा संपन्न होने और परिणाम जारी होने के बाद बीच प्रक्रिया में क्वालिफाइंग मानकों को मनमाने ढंग से नीचे गिराना 'गेम के नियम बीच में बदलने' जैसा है। इससे न केवल मेरिट का अवमूल्यन होता है, बल्कि विशेषज्ञ डॉक्टरों के पेशेवर मानकों और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। याचिका में मांग की गई थी कि सरकार के इस कदम पर अंतरिम रोक लगाई जाए ताकि काउंसलिंग प्रक्रिया में असमानता न फैले।
सुप्रीम कोर्ट का रुख: अंतरिम राहत से इनकार
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस पी नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने स्पष्ट किया कि चिकित्सा शिक्षा और काउंसलिंग से जुड़ी प्रक्रियाएं बेहद समयबद्ध और संवेदनशील होती हैं। अदालत ने कहा कि पूरी प्रक्रिया को बाधित करने वाला कोई भी अंतरिम आदेश जारी करने से पहले सरकार के पक्ष और नीतिगत आधार को समझना आवश्यक है।
पीठ ने केंद्र सरकार के वकीलों से सवाल किया कि आखिर किन वैज्ञानिक, सांख्यिकीय और अकादमिक पैमानों के तहत कट-ऑफ को कम करने का निर्णय लिया गया। अदालत ने कहा कि सरकार दो हफ्तों के भीतर एक औपचारिक हलफनामा और रिपोर्ट पेश करे, जिसमें यह स्पष्ट किया जाए कि बदले हुए क्राइटेरिया को लागू करने की क्या अनिवार्यता थी और क्या इससे चिकित्सा शिक्षा के न्यूनतम राष्ट्रीय मानकों पर कोई समझौता हुआ है।
मेडिकल सीटों का खाली रहना बनाम मेरिट का संतुलन
इस पूरे विवाद के केंद्र में मेडिकल कॉलेजों की वित्तीय और शैक्षणिक वास्तविकताएं हैं। देश भर में हर साल क्लीनिकल और नॉन-क्लीनिकल (जैसे एनाटॉमी, बायोकेमिस्ट्री, फिजियोलॉजी, फार्माकोलॉजी) विषयों में सैकड़ों सीटें खाली रह जाती हैं। निजी मेडिकल कॉलेजों में भारी फीस होने के कारण कई सीटें नहीं भर पातीं।
केंद्र सरकार और मेडिकल काउंसलिंग कमेटी (MCC) का तर्क रहा है कि सीटों को खाली छोड़ने से राष्ट्रीय संसाधनों की बर्बादी होती है और भविष्य में मेडिकल शिक्षकों तथा विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी हो सकती है। इसलिए अंतिम 'स्ट्रे वैकेंसी राउंड' (Stray Vacancy Round) से पहले कट-ऑफ में ढील दी जाती है ताकि अधिक से अधिक एमबीबीएस डिग्रीधारक डॉक्टर पीजी सीटों के लिए पात्र हो सकें। वहीं दूसरी ओर, मेरिट समर्थक डॉक्टरों और छात्रों का संगठन इसका विरोध करते हुए कहता है कि केवल सीटें भरने के लिए गुणवत्ता के साथ समझौता नहीं किया जाना चाहिए।
लाखों डॉक्टरों और अभ्यर्थियों पर क्या होगा असर?
सुप्रीम कोर्ट द्वारा दो हफ्ते का समय दिए जाने और अंतरिम रोक न लगाए जाने से फिलहाल चल रही काउंसलिंग प्रक्रियाओं में तत्काल कोई कानूनी रुकावट नहीं आई है। हालांकि, सरकार की रिपोर्ट जमा होने के बाद होने वाली अगली सुनवाई बेहद निर्णायक होगी।
यदि अदालत सरकार के जवाब से संतुष्ट नहीं होती है और भविष्य के लिए कट-ऑफ घटाने पर सख्त दिशा-निर्देश तय करती है, तो इससे आने वाले शैक्षणिक सत्रों में न्यूनतम पर्सेंटाइल की अनिवार्यता कठोर हो सकती है। वहीं, यदि न्यायालय सरकार के नीतिगत अधिकार को मान्यता देता है, तो रिक्त सीटों को भरने के लिए पर्सेंटाइल घटाने की व्यवस्था को कानूनी वैधता मिल जाएगी। अब पूरे देश के चिकित्सा जगत और पीजी अभ्यर्थियों की नजरें केंद्र सरकार द्वारा दाखिल की जाने वाली आगामी रिपोर्ट पर टिकी हैं।
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