'न्याय अब 'लाइक्स' का बाजार बन गया है...'सोशल मीडिया मीडिया ट्रायल पर जस्टिस जॉयमाल्या बागची की दोटूक टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सोशल मीडिया ट्रायल पर चिंता जताते हुए कहा कि इसने न्याय को 'लाइक्स' के बाजार में तब्दील कर दिया है।
- सोशल मीडिया ने न्याय को 'लाइक्स' के बाजार में बदला: जस्टिस जॉयमाल्या बागची की गंभीर टिप्पणी
- Justice Joymalya Bagchi: सोशल मीडिया ट्रायल पर बोले जस्टिस बागची, 'लाइक्स' के चक्कर में प्रभावित हो रहा न्याय
- Justice Joymalya Bagchi Statement: सोशल मीडिया ट्रायल पर जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बड़ी टिप्पणी, न्याय प्रणाली पर जताई चिंता
सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने हाल ही में आयोजित एक विधिक कार्यक्रम के दौरान डिजिटल दौर में सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव और न्याय प्रक्रिया पर पड़ रहे इसके असर को लेकर गहरी चिंता जताई है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वर्तमान समय में सोशल मीडिया ने न्याय को महज 'लाइक्स' और व्यूज का बाजार बना दिया है। उनके अनुसार, ऑनलाइन मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर चलने वाले समानांतर ट्रायल और जनभावनाओं का उभार अदालतों के निष्पक्ष न्याय की राह में बड़ी चुनौती बन रहा है। इस बयान के बाद कानूनी और सामाजिक हलकों में डिजिटल मीडिया ट्रायल, व्यक्ति के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर एक नई राष्ट्रीय बहस छिड़ गई है।
डिजिटल क्रांति के इस युग में किसी भी आपराधिक या संवेदनशील मामले के सार्वजनिक होते ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर चर्चाओं का बाजार गर्म हो जाता है। इसी परिदृश्य पर ध्यान केंद्रित करते हुए शीर्ष अदालत के जज जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने एक गंभीर अवलोकन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि न्याय प्रक्रिया का मूल सिद्धांत साक्ष्यों, तथ्यों और कानून के निष्पक्ष विश्लेषण पर आधारित होता है। हालांकि, मौजूदा दौर में सोशल मीडिया का आक्रामक रुख मामलों को डिजिटल अदालत में तब्दील कर देता है, जहाँ जनभावनाओं को भुनाकर लाइक्स, शेयर्स और एंगेजमेंट जुटाने का खेल खेला जाता है। इससे न केवल मामले से जुड़े व्यक्तियों की प्रतिष्ठा प्रभावित होती है बल्कि निष्पक्ष न्याय मिलने की संभावना पर भी खतरा मंडराने लगता है।
सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस जॉयमाल्या बागची कानून और समाज से जुड़े एक विषय पर अपना संबोधन दे रहे थे। इस दौरान उन्होंने तकनीक, जनसंचार और न्याय व्यवस्था के बीच बनते-बिगड़ते संतुलन को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि किसी भी मामले में एफआईआर दर्ज होने या आरोप लगने के तुरंत बाद ही सोशल मीडिया पर हैशटैग्स और अभियानों का दौर शुरू हो जाता है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर यूजर्स बिना कानूनी बारीकियों और तथ्यों को जाने किसी को भी आरोपी या दोषी करार देने लगते हैं।
जस्टिस बागची ने रेखांकित किया कि कैसे डिजिटल दुनिया में 'लाइक' और 'फॉलोअर्स' बढ़ाने की होड़ ने गंभीर आपराधिक और कानूनी मुद्दों को सनसनीखेज विषय बना दिया है। जब कोई विषय वायरल होता है, तो उस पर सार्वजनिक राय इतनी तेजी से बनती है कि वह पारंपरिक कानूनी सिद्धांतों को दरकिनार कर देती है। कानून का मूलभूत सिद्धांत कहता है कि जब तक अपराध साबित न हो जाए, तब तक हर व्यक्ति निर्दोष है। परंतु सोशल मीडिया का माहौल इस सिद्धांत के बिल्कुल विपरीत काम करता है और व्यक्ति को अदालत का फैसला आने से पहले ही जनता की नज़र में अपराधी घोषित कर देता है।
जस्टिस जॉयमाल्या बागची के इस बयान के बाद न्यायपालिका, विधिक विशेषज्ञों और नागरिक समाज से व्यापक प्रतिक्रियाएं आई हैं। वरिष्ठ अधिवक्ताओं और कानूनी विश्लेषकों ने उनके विचारों का समर्थन करते हुए कहा है कि मीडिया और सोशल मीडिया का अत्यधिक दखल निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायाधीश हालांकि कानून के अनुसार निर्णय लेने के लिए प्रशिक्षित होते हैं, फिर भी लगातार बनने वाला जन दबाव सार्वजनिक धारणा को प्रभावित करता है।
वहीं, डिजिटल अधिकार कार्यकर्ताओं और मीडिया विश्लेषकों का मानना है कि सोशल मीडिया ने आम जनता को अपनी आवाज उठाने और मामलों में पारदर्शिता की मांग करने का एक बड़ा मंच भी दिया है। हालांकि, अधिकांश पक्षों ने इस बात पर सहमति जताई कि जवाबदेही और संयम के बिना अभिव्यक्ति की आजादी का दुरुपयोग किसी भी न्यायिक प्रक्रिया की साख को नुकसान पहुंचा सकता है।
जस्टिस बागची की यह टिप्पणी न्यायपालिका के भीतर और बाहर नीतिगत बहस को गति देने वाली साबित हो सकती है। इस तरह के अवलोकनों से पूर्व में भी यह सवाल उठता रहा है कि क्या मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर सब-जुडिस (अदालत के समक्ष विचाराधीन) मामलों में रिपोर्टिंग या चर्चा की कोई सीमा तय की जानी चाहिए। इस बयान से डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर चलने वाले समानांतर कानूनी बहस-मुबाहसों पर नैतिक अंकुश लगाने की आवश्यकता को बल मिला है। यह संदेश आम जनता और कंटेंट क्रिएटर्स के लिए भी एक चेतावनी की तरह है कि डिजिटल स्पेस में किया गया एक गैर-जिम्मेदाराना पोस्ट किसी व्यक्ति की गरिमा और कानूनी अधिकारों पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों द्वारा समय-समय पर डिजिटल मीडिया दिशा-निर्देशों या सब-जुडिस मामलों में संयम बरतने से जुड़े दिशानिर्देशों पर विचार किया जा सकता है। इसके अलावा, आईटी नियमों में सुधार या ऑनलाइन स्पैम व मानहानिकारक सामग्री को नियंत्रित करने के लिए कड़े कदम उठाए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि समाज और डिजिटल यूजर्स में यह समझ विकसित होनी आवश्यक है कि वास्तविक न्याय केवल संवैधानिक अदालतों में साक्ष्यों के आधार पर ही संभव है, किसी ऑनलाइन पोल या लाइक्स की संख्या से नहीं।
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