तृणमूल कांग्रेस में अब तक का सबसे बड़ा ऐतिहासिक विद्रोह, 20 लोकसभा सांसदों ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को समर्थन देने का किया औपचारिक ऐलान

पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के भीतर एक बहुत बड़ा राजनैतिक भूचाल आ गया है, जिसने राज्य से लेकर देश

Jun 11, 2026 - 12:28
 0  4
तृणमूल कांग्रेस में अब तक का सबसे बड़ा ऐतिहासिक विद्रोह, 20 लोकसभा सांसदों ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को समर्थन देने का किया औपचारिक ऐलान
तृणमूल कांग्रेस में अब तक का सबसे बड़ा ऐतिहासिक विद्रोह, 20 लोकसभा सांसदों ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को समर्थन देने का किया औपचारिक ऐलान
  • लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र सौंपकर बागी सांसदों ने संसद में अलग गुट बनाने की मांगी अनुमति, तृणमूल कांग्रेस के संसदीय दल में भारी बिखराव
  • ममता बनर्जी के बेहद करीब रहीं टॉलीवुड अभिनेत्री और सांसद शताब्दी रॉय ने भी थामा बागियों का हाथ, राजनैतिक रूप से फैसले को सही और नैतिक रूप से बताया गलत

पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के भीतर एक बहुत बड़ा राजनैतिक भूचाल आ गया है, जिसने राज्य से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक की हलचल को तेज कर दिया है। पार्टी के कुल 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों ने अपनी ही सर्वोच्च नेता ममता बनर्जी के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया है। इन सभी बागी सांसदों ने सामूहिक रूप से एक पत्र तैयार करके लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को भेज दिया है, जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि वे केंद्र की सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार को अपना समर्थन देंगे। इस अप्रत्याशित और नाटकीय घटनाक्रम ने तृणमूल कांग्रेस के संसदीय ढांचे को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया है। संसद के इतिहास में इस पार्टी के भीतर यह अब तक का सबसे बड़ा विभाजन माना जा रहा है, जिसने विपक्ष की एकजुटता और क्षेत्रीय राजनीति के समीकरणों को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। बागी सांसदों का यह कदम ऐसे समय में आया है जब पार्टी का शीर्ष नेतृत्व राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन की बैठकों में शामिल होने के लिए दिल्ली में मौजूद था।

इस पूरे राजनैतिक विद्रोह में सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाला नाम टॉलीवुड की मशहूर अभिनेत्री और बीरभूम लोकसभा क्षेत्र से वरिष्ठ सांसद शताब्दी रॉय का है। शताब्दी रॉय उन चुनिंदा नेताओं में से एक रही हैं जिन्हें खुद ममता बनर्जी राजनीति में लेकर आई थीं और उन्हें बंगाल की कला जगत से निकालकर संसद के गलियारों तक पहुंचाया था। शताब्दी रॉय ने भी इस बागी समूह के फैसले का पूरी तरह से समर्थन किया है और वे इस गुट के साथ मजबूती से खड़ी दिखाई दे रही हैं। उनके इस कदम ने पश्चिम बंगाल के राजनैतिक गलियारों में सभी को अचंभित कर दिया है, क्योंकि उन्हें हमेशा से मुख्यमंत्री का एक बेहद विश्वस्त और वफादार सिपाही माना जाता रहा था। शताब्दी रॉय जैसी कद्दावर और लोकप्रिय नेता का इस प्रकार से बागी खेमे में चले जाना तृणमूल कांग्रेस के लिए एक बहुत बड़ा झटका साबित हो रहा है, जिसकी भरपाई करना आने वाले समय में पार्टी के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य होगा।

तृणमूल कांग्रेस के भीतर गहराते संकट की क्रोनोलॉजी:

पश्चिम बंगाल विधानसभा के भीतर विधायकों के एक बड़े गुट ने पार्टी नेतृत्व के फैसलों के खिलाफ असंतोष जाहिर किया था।

लोकसभा के वरिष्ठ सांसदों ने दिल्ली में केंद्रीय मंत्रियों और विरोधी दल के नेताओं के साथ बंद कमरे में गुप्त बैठकें आयोजित कीं।

संसदीय दल की मुख्य सचेतक के नेतृत्व में सांसदों ने पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र और कामकाज के तरीकों पर सवाल उठाए।

बीस सांसदों के हस्ताक्षर वाला आधिकारिक पत्र लोकसभा अध्यक्ष सचिवालय को सौंपकर नए संसदीय गुट के गठन की मांग की गई।

अपनी इस बड़ी बगावत के बाद शताब्दी रॉय ने मीडिया के सामने आकर अपनी स्थिति को स्पष्ट किया है, जिससे उनके भीतर चल रहे अंतर्द्वंद्व का पता चलता है। जब उनसे यह सवाल पूछा गया कि क्या इस ऐतिहासिक और कठिन फैसले को लेते समय उन्हें किसी प्रकार की उलझन, संशय या मानसिक परेशानी महसूस हो रही है, तो उन्होंने बेहद खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा कि अगर वे राजनैतिक दृष्टिकोण से देखती हैं, तो उन्हें लगता है कि उन्होंने बिल्कुल सही और व्यावहारिक फैसला लिया है, जो उनके क्षेत्र के विकास के लिए जरूरी था। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने अपनी व्यक्तिगत भावनाओं को भी छुपाने का प्रयास नहीं किया। उन्होंने बेहद साफगोई से स्वीकार किया कि भावनात्मक और नैतिक रूप से वे खुद को गलत महसूस कर रही हैं, क्योंकि जिस नेतृत्व ने उन्हें राजनीति की मुख्यधारा में पहचान दिलाई, आज वे उसी के खिलाफ खड़ी हैं। यह बयान देश की राजनीति में बहुत दुर्लभ माना जा रहा है जहां कोई राजनेता अपने राजनैतिक लाभ के लिए लिए गए फैसले की नैतिक कमजोरी को इस तरह स्वीकार करे।

इस राजनैतिक संकट के कानूनी और तकनीकी पहलुओं को देखा जाए तो बागी सांसदों ने इस कदम को बहुत ही सुनियोजित और कानून के दायरे में रहकर अंजाम दिया है। देश के दल-बदल विरोधी कानून के अनुसार, यदि किसी पार्टी के कुल निर्वाचित सदस्यों में से दो-तिहाई सदस्य एक साथ अलग होते हैं, तो उनकी संसद सदस्यता पर कोई खतरा नहीं मंडराता है। तृणमूल कांग्रेस के पास वर्तमान में लोकसभा में कुल 28 सदस्य हैं और 20 सांसदों का यह आंकड़ा आसानी से दो-तिहाई के बहुमत के स्तर को पार कर जाता है। यही कारण है कि इन सांसदों ने संसद सदस्यता से इस्तीफा देने के बजाय लोकसभा के भीतर ही एक अलग स्वतंत्र गुट के रूप में मान्यता मांगी है, जो बाहर से सरकार को समर्थन प्रदान करेगा। इस रणनीति के माध्यम से बागी सांसद न केवल अपनी सीट सुरक्षित रखने में कामयाब हो जाएंगे, बल्कि वे संसद के भीतर अपनी पार्टी के आधिकारिक व्हिप के नियंत्रण से भी पूरी तरह मुक्त हो जाएंगे।

इस पूरे विद्रोह की पृष्ठभूमि काफी समय से तैयार हो रही थी और सांसदों का आरोप है कि पार्टी के भीतर अब आंतरिक संवाद और लोकतंत्र पूरी तरह से समाप्त हो चुका है। बागी खेमे के नेताओं का कहना है कि वे अपने-अपने संसदीय क्षेत्रों के विकास और जनता की समस्याओं को लेकर लंबे समय से घुटन महसूस कर रहे थे और नेतृत्व के पास उनकी बात सुनने का समय नहीं था। राज्य के विकास के लिए केंद्र सरकार के साथ मिलकर काम करना समय की मांग बन चुका था, लेकिन पार्टी की टकराववादी नीतियों के कारण उनके क्षेत्रों की बड़ी परियोजनाएं लंबे समय से अधर में लटकी हुई थीं। सांसदों का मानना है कि पश्चिम बंगाल की जनता ने जिस उम्मीद के साथ उन्हें चुनकर देश की सबसे बड़ी पंचायत में भेजा था, उस कसौटी पर खरा उतरने के लिए उनके पास राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साथ जाने के अलावा और कोई दूसरा विकल्प शेष नहीं रह गया था।

इस घटनाक्रम के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर भी तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं और पार्टी के प्रति वफादार रहने वाले सांसदों ने इन विद्रोहियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। नेतृत्व के करीबी नेताओं ने इन 20 सांसदों को गद्दार और अवसरवादी करार देते हुए कहा है कि इन लोगों ने उस जनता के भरोसे का कत्ल किया है जिसने ममता बनर्जी के चेहरे और तृणमूल कांग्रेस के सिंबल को देखकर इन्हें वोट दिया था। पार्टी के आधिकारिक प्रवक्ताओं का कहना है कि इन सांसदों को अगर इतनी ही नैतिक ग्लानि महसूस हो रही है, तो इन्हें तुरंत लोकसभा की सदस्यता से त्यागपत्र दे देना चाहिए और दोबारा जनता के बीच जाकर चुनाव लड़ना चाहिए। पार्टी के वफादार खेमे ने यह भी दावा किया है कि इस तरह के दबाव और साजिशों से बंगाल की मुख्य नेता को डराया नहीं जा सकता है और वे राज्य की जनता के सहयोग से इस संकट से भी सफलतापूर्वक बाहर निकल आएंगी।

Also Read- Mussoorie: मसूरी में बड़ा हादसा: झड़ीपानी शॉर्टकट मार्ग पर गहरी खाई में गिरी कार, चार लोग सवार

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow

INA News_Admin आई.एन. ए. न्यूज़ (INA NEWS) initiate news agency भारत में सबसे तेजी से बढ़ती हुई हिंदी समाचार एजेंसी है, 2017 से एक बड़ा सफर तय करके आज आप सभी के बीच एक पहचान बना सकी है| हमारा प्रयास यही है कि अपने पाठक तक सच और सही जानकारी पहुंचाएं जिसमें सही और समय का ख़ास महत्व है।