UCC Row In NDA: 2029 तक 21 राज्यों में यूसीसी के अमित शाह के दावे पर जेडीयू का ऐतराज, टीडीपी और चिराग पासवान ने भी रखी अपनी शर्तें
2029 तक 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने के केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बयान पर एनडीए के प्रमुख सहयोगी दलों जेडीयू, टीडीपी और लोजपा ने सख्त रुख अपनाया है।
- UCC Row In NDA: 2029 तक 21 राज्यों में यूसीसी के अमित शाह के दावे पर जेडीयू का ऐतराज, टीडीपी और चिराग पासवान ने भी रखी अपनी शर्तें
- समान नागरिक संहिता पर एनडीए में अंदरूनी खींचतान: अमित शाह के बयान के बाद जेडीयू, टीडीपी और लोजपा (रामविलास) का रुख सख्त
- UCC Implementation Debate: यूसीसी पर बीजेपी के आक्रामक रुख के बीच सहयोगियों की दो टूक, सर्वसम्मति और जनजातीय अधिकारों पर अड़े नीतीश-नायडू
- क्या 2029 तक लागू हो पाएगा यूसीसी? अमित शाह के 21 राज्यों वाले प्लान पर एनडीए गठबंधन के भीतर से ही उठे सवाल
देश भर में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने की दिशा में केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की सक्रियता के बीच राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के भीतर वैचारिक मतभेद एक बार फिर खुलकर सामने आ गए हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा वर्ष 2029 तक देश के कम से कम 21 राज्यों में यूसीसी लागू करने के संकल्प को दोहराए जाने के बाद गठबंधन के प्रमुख सहयोगी दलों जनता दल (यूनाइटेड), तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) ने इस पर बेहद नपा-तुला लेकिन कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। सहयोगी दलों का स्पष्ट कहना है कि किसी भी ऐसे बड़े सामाजिक और कानूनी सुधार को बिना व्यापक सर्वसम्मति, सभी धार्मिक समुदायों और जनजातीय वर्गों के अधिकारों की पूर्ण सुरक्षा के एकतरफा तरीके से लागू नहीं किया जा सकता।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हालिया राजनीतिक कार्यक्रमों में यह रेखांकित किया था कि उत्तराखंड में यूसीसी लागू होने के बाद अब देश भर के विभिन्न राज्यों में इसे कानूनी स्वरूप देने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। उनका आकलन था कि अगले पांच वर्षों में अधिकांश राज्य अपने स्तर पर इस कानून को अपना लेंगे। हालांकि, मौजूदा संसद में बीजेपी के पास अपने दम पर पूर्ण बहुमत न होने और एनडीए के घटक दलों के समर्थन पर निर्भर होने के चलते यह मुद्दा राजनीतिक रूप से अत्यधिक संवेदनशील हो गया है।
- जेडीयू का रुख: सर्वसम्मति और संवाद के बिना संभव नहीं
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जेडीयू ने यूसीसी पर अपनी पुरानी नीति को दोहराते हुए साफ संकेत दिया है कि वह इस मुद्दे पर किसी भी जल्दबाजी के पक्ष में नहीं है। पार्टी प्रवक्ताओं और वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि समान नागरिक संहिता केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह देश के बहुधर्मीय और बहुसांस्कृतिक ताने-बाने से जुड़ा बेहद नाजुक विषय है।
जेडीयू ने विधि आयोग को पूर्व में दिए गए अपने ज्ञापनों का हवाला देते हुए रेखांकित किया है कि यूसीसी को लेकर सभी हितधारकों, विशेषकर धार्मिक अल्पसंख्यकों, आदिवासी समाजों और विभिन्न क्षेत्रीय परंपराओं से सीधे संवाद स्थापित किया जाना आवश्यक है। पार्टी का मानना है कि जब तक सभी संबंधित वर्गों के भीतर इस कानून को लेकर विश्वास का वातावरण नहीं बनता, तब तक इसे थोपने की कोई भी कोशिश सामाजिक सौहार्द को प्रभावित कर सकती है।
- टीडीपी और चंद्रबाबू नायडू की क्षेत्रीय व अल्पसंख्यक प्राथमिकताएं
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व वाली टीडीपी भी यूसीसी के मुद्दे पर अत्यंत सतर्कता बरत रही है। आंध्र प्रदेश की राजनीति में अल्पसंख्यक मतदाताओं की महत्वपूर्ण भूमिका और सामाजिक संतुलन को देखते हुए टीडीपी किसी भी ऐसे कदम का खुला समर्थन करने से बच रही है जिसे किसी खास समुदाय के खिलाफ देखा जाए।
टीडीपी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि पार्टी सुधारों और लैंगिक समानता की विरोधी नहीं है, लेकिन किसी भी कानून का मसौदा तैयार करते समय क्षेत्रीय स्वायत्तता, मुस्लिम समाज और ईसाई समुदाय से जुड़े व्यक्तिगत कानूनों (पर्सनल लॉ) की संवेदनशीलताओं को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। पार्टी सूत्रों के अनुसार, यदि केंद्र या राज्यों में ऐसा कोई विधेयक लाया जाता है, तो टीडीपी पहले उसके विस्तृत प्रावधानों का परीक्षण करेगी और यह सुनिश्चित करेगी कि किसी भी समुदाय के बुनियादी धार्मिक या पारंपरिक अधिकारों में अनुचित हस्तक्षेप न हो।
- चिराग पासवान का आदिवासियों और रीति-रिवाजों पर जोर
केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान की अगुवाई वाली लोजपा (रामविलास) ने भी यूसीसी को लेकर अपना स्वतंत्र दृष्टिकोण सामने रखा है। चिराग पासवान ने पूर्व में भी स्पष्ट किया है कि भारत विविधताओं से भरा देश है, जहां पूर्वोत्तर से लेकर मध्य भारत तक के जनजातीय समुदायों की अपनी विशिष्ट विवाह, उत्तराधिकार और संपत्ति से जुड़ी परंपराएं हैं।
लोजपा (रामविलास) का मत है कि यदि कोई समान नागरिक संहिता बनाई जाती है, तो उसमें संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची के तहत संरक्षित जनजातीय अधिकारों और स्थानीय परंपराओं को पूरी तरह छूट मिलनी चाहिए। पार्टी का तर्क है कि यूसीसी की मूल भावना महिलाओं और वंचितों को समान अधिकार दिलाना होनी चाहिए, न कि किसी समूह की पारंपरिक जीवनशैली पर बंदिशें लगाना। इस कारण पार्टी संसद और सार्वजनिक मंचों पर इस बात की वकालत कर रही है कि पहले एक विस्तृत मसौदा देश के सामने रखा जाए, जिस पर खुली बहस हो।
- सहयोगियों की निर्भरता और केंद्र की रणनीति
वर्तमान लोकसभा के समीकरणों पर नजर डालें तो केंद्र में एनडीए की सरकार जेडीयू, टीडीपी और अन्य सहयोगी दलों के समर्थन के आधार पर ही टिकी हुई है। ऐसे में बीजेपी के मूल वैचारिक एजेंडे में शामिल यूसीसी को राष्ट्रीय स्तर पर संसद के जरिए पारित कराना एक बड़ी कूटनीतिक और विधायी चुनौती है।
यही वजह है कि केंद्र सरकार ने राज्यों के स्तर पर इस कानून को आगे बढ़ाने की रणनीति बनाई है, जैसा कि उत्तराखंड में किया गया और अन्य बीजेपी शासित राज्यों में इसकी तैयारी चल रही है। हालांकि, जब बात इसे 2029 तक देश के अधिकांश हिस्सों में लागू करने की आती है, तो गठबंधन के सहयोगियों द्वारा उठाए जा रहे सवाल यह स्पष्ट करते हैं कि एनडीए के आंतरिक मंच पर इस विषय को लेकर अभी गंभीर विचार-विमर्श और आम सहमति बनना बाकी है।
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