UP Ground Water Testing: भूजल स्रोतों की जांच में यूपी देश में अव्वल, पंजाब और आंध्र प्रदेश को पीछे छोड़कर हासिल किया पहला स्थान

जलशक्ति मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, भूजल स्रोतों की गुणवत्ता जांच में उत्तर प्रदेश 94.39% उपलब्धि के साथ देश में पहले स्थान पर रहा है। पंजाब दूसरे स्थान पर है।

By INA News Desk
Sep 18, 2026 - 23:00
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UP Ground Water Testing: भूजल स्रोतों की जांच में यूपी देश में अव्वल, पंजाब और आंध्र प्रदेश को पीछे छोड़कर हासिल किया पहला स्थान
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लखनऊ। प्रदेश के प्रत्येक नागरिक तक सुरक्षित और शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने की दिशा में उत्तर प्रदेश ने राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी प्रशासनिक और तकनीकी उपलब्धि दर्ज की है। केंद्र सरकार के जलशक्ति मंत्रालय के अंतर्गत पेयजल एवं स्वच्छता विभाग द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, भूजल स्रोतों की वैज्ञानिक जांच और गुणवत्ता परीक्षण में उत्तर प्रदेश पूरे देश में पहले स्थान पर पहुंच गया है। राज्य ने निर्धारित समय-सीमा के भीतर अपने लक्ष्यों को तेजी से पूरा करते हुए पंजाब, आंध्र प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों को काफी पीछे छोड़ दिया है।

15 सितंबर 2026 तक संकलित किए गए आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2026-27 की पहली छमाही के लिए निर्धारित परीक्षण लक्ष्यों में उत्तर प्रदेश का प्रदर्शन राष्ट्रीय औसत से करीब 44 प्रतिशत अधिक दर्ज किया गया है। राज्य और जिला स्तर पर स्थापित प्रयोगशालाओं के नेटवर्क के माध्यम से प्रदेश भर में बोरवेल, हैंडपंप, भूमिगत जलाशयों और ओवरहेड टंकियों से सीधे पानी के नमूने एकत्र कर उनका रासायनिक व जैविक विश्लेषण किया गया है।

पहली छमाही में ही 94.39 प्रतिशत लक्ष्य हासिल

भारत सरकार के पेयजल एवं स्वच्छता विभाग द्वारा उत्तर प्रदेश के लिए वित्तीय वर्ष 2026-27 के दौरान कुल 48,055 भूजल स्रोतों के परीक्षण का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। इस लक्ष्य के सापेक्ष यूपी जल निगम ग्रामीण की प्रयोगशालाओं ने अब तक 45,361 स्रोतों की गहन जांच पूरी कर ली है। यह कुल निर्धारित लक्ष्य का 94.39 प्रतिशत बैठता है।

अब निर्धारित वार्षिक लक्ष्य को शत-प्रतिशत हासिल करने के लिए केवल 2,694 स्रोतों की जांच बाकी रह गई है। पहली छमाही के भीतर ही कुल कार्य का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा पूरा करना जल आपूर्ति प्रणाली की निगरानी तंत्र की सक्रियता को दर्शाता है।

इस उपलब्धि पर यूपी जल निगम ग्रामीण के प्रबंध निदेशक योगेश कुमार ने बताया कि नियमित परीक्षण से न केवल पानी की वर्तमान शुद्धता का पता चलता है, बल्कि जल स्रोतों की दीर्घकालिक स्थिति (सोर्स सस्टेनेबिलिटी) की निगरानी में भी मदद मिलती है। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार दोनों का मुख्य जोर इस बात पर है कि ग्रामीण अंचलों में हर घर तक पहुंचने वाला पानी प्रदूषण मुक्त हो। उत्तर प्रदेश ने इस दिशा में मानक स्थापित किए हैं और आने वाले समय में भी इस गति को बनाए रखा जाएगा।

पंजाब और आंध्र प्रदेश छूटे पीछे, केरल पांचवें स्थान पर

देश भर के राज्यों की तुलनात्मक रैंकिंग पर नजर डालें तो उत्तर प्रदेश के बाद पंजाब दूसरे और आंध्र प्रदेश तीसरे स्थान पर है। दोनों ही राज्यों ने अपने निर्धारित लक्ष्यों के सापेक्ष 83.46 प्रतिशत परीक्षण का आंकड़ा हासिल किया है।

पहाड़ी राज्य उत्तराखंड 82.30 प्रतिशत उपलब्धि के साथ राष्ट्रीय तालिका में चौथे स्थान पर रहा, जबकि दक्षिण भारत का राज्य केरल 81.13 प्रतिशत कार्य पूरा कर पांचवें पायदान पर टिका हुआ है। इन सभी अग्रणी राज्यों की तुलना में उत्तर प्रदेश की बढ़त 11 से 13 प्रतिशत तक अधिक है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि जमीनी स्तर पर प्रयोगशालाओं का परिचालन और नमूनों का संकलन यूपी में अधिक प्रभावी रहा।

राष्ट्रीय औसत 50.46 प्रतिशत, यूपी का आंकड़ा 94 पार

भूजल परीक्षण के मामले में राष्ट्रीय स्तर की समग्र स्थिति का विश्लेषण करें तो उत्तर प्रदेश का प्रदर्शन असाधारण दिखाई देता है। यूपी जल निगम ग्रामीण के अधीक्षण अभियंता एवं राज्य प्रयोगशाला प्रमुख ज्ञानेंद्र कुमार चौधरी ने बताया कि देश का राष्ट्रीय औसत वर्तमान में मात्र 50.46 प्रतिशत है। इसकी तुलना में उत्तर प्रदेश की 94.39 प्रतिशत उपलब्धि राष्ट्रीय औसत से लगभग 44 प्रतिशत अधिक है।

यह अंतर इसलिए भी बड़ा है क्योंकि उत्तर प्रदेश क्षेत्रफल और जनसंख्या दोनों ही दृष्टि से एक विशाल राज्य है। यहां भूजल स्रोतों की संख्या अन्य राज्यों की तुलना में कहीं अधिक है। इसके बावजूद राज्य भर में फैली जिला और ब्लॉक स्तरीय जल परीक्षण प्रयोगशालाओं ने सक्रियता दिखाते हुए समयबद्ध तरीके से नमूनों की जांच की रिपोर्ट ऑनलाइन पोर्टल पर दर्ज की है।

शुद्ध पेयजल का स्वास्थ्य पर सीधा असर

ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में पेयजल जनित बीमारियों की रोकथाम के लिए भूजल स्रोतों की गुणवत्ता का नियमित परीक्षण बुनियादी आवश्यकता है। पानी में फ्लोराइड, आर्सेनिक, नाइट्रेट, भारी धातुओं और जीवाणुओं (बैक्टीरियोलॉजिकल संदूषण) की मौजूदगी की समय पर पहचान होने से जल आपूर्ति को समय रहते उपचारित किया जा सकता है।

निगरानी तंत्र के तहत यदि किसी स्रोत का पानी परीक्षण में निर्धारित मानकों से नीचे पाया जाता है, तो उस स्रोत को चिह्नित कर वहां से पेयजल आपूर्ति रोकी जाती है या फिर शुद्धिकरण संयंत्र लगाकर आपूर्ति बहाल की जाती है। उत्तर प्रदेश द्वारा बड़े पैमाने पर स्रोतों की जांच पूरा करने से लाखों ग्रामीण परिवारों को सुरक्षित जल मिलने का भरोसा पुख्ता हुआ है।

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