यूपी और राजस्थान के स्कूलों में वीडियोग्राफी बैन का विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, मुख्यमंत्री योगी का बड़ा बयान

यूपी और राजस्थान के सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश और वीडियोग्राफी पर रोक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर। सीएम योगी ने जर्जर भवनों पर बयान दिया।

Aug 23, 2026 - 15:33
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यूपी और राजस्थान के स्कूलों में वीडियोग्राफी बैन का विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, मुख्यमंत्री योगी का बड़ा बयान
School Videography Ban Supreme Court

  • School Videography Ban: सरकारी स्कूलों में कैमरे पर पाबंदी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका, सीएम योगी ने गिनाईं कायाकल्प की उपलब्धियां
  • सरकारी स्कूलों में कैमरे और वीडियो बनाने पर रोक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल, योगी सरकार ने दिया करारा जवाब
  • स्कूलों में वीडियोग्राफी बैन मामला: सुप्रीम कोर्ट में दी गई चुनौती, सीएम योगी बोले- कायाकल्प से बदली स्कूलों की तस्वीर

उत्तर प्रदेश और राजस्थान के सरकारी स्कूलों में बिना पूर्वानुमति बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश, फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी और सोशल मीडिया लाइव स्ट्रीमिंग पर लगाई गई पाबंदी का मामला अब देश की शीर्ष अदालत में पहुंच गया है। दोनों राज्य सरकारों द्वारा जारी किए गए दिशा-निर्देशों को असंवैधानिक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विपरीत बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल कर इन्हें रद्द करने की मांग की गई है। इस कानूनी वाद के बीच उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्पष्ट प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि कुछ लोग मात्र सनसनी फैलाने के लिए पुराने और जर्जर भवनों के वीडियो बना रहे हैं, जबकि हकीकत यह है कि राज्य सरकार ने ऑपरेशन कायाकल्प के जरिए बेसिक शिक्षा के ढांचे में ऐतिहासिक सुधार किया है।

उत्तर प्रदेश और राजस्थान के बेसिक व माध्यमिक शिक्षा विभागों द्वारा हाल ही में विशेष परिपत्र जारी किए गए थे, जिनके अंतर्गत किसी भी अनाधिकृत व्यक्ति, पत्रकार, यूट्यूबर, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर अथवा सामाजिक संस्था के प्रतिनिधियों के बिना सक्षम अधिकारी की अनुमति के विद्यालय परिसर में प्रवेश करने पर रोक लगाई गई थी। इन आदेशों में कक्षाओं के भीतर रिकॉर्डिंग, बच्चों के साक्षात्कार, फोटो खींचने और लाइव प्रसारण को विद्यार्थियों की सुरक्षा और गोपनीयता के लिए अनुचित बताते हुए प्रतिबंधित किया गया था।

इन प्रशासनिक आदेशों के विरुद्ध अधिवक्ता नरेंद्र मिश्रा ने सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि दोनों राज्यों द्वारा जारी यह परिपत्र भारतीय संविधान के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का हनन करता है। याचिका में विशेष रूप से विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रेस की आजादी, विधि के समक्ष समानता तथा शिक्षा के अधिकार से जुड़े संवैधानिक अनुच्छेदों के उल्लंघन का हवाला देते हुए न्यायालय से तत्काल हस्तक्षेप करने और इस रोक को निरस्त करने की गुहार लगाई गई है।

पूरे विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब राजस्थान और उत्तर प्रदेश में विभिन्न संगठनों और स्वतंत्र डिजिटल मीडिया कर्मियों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी विद्यालयों में बुनियादी सुविधाओं के अभाव और जर्जर इमारतों को लेकर व्यापक रूप से वीडियो रिकॉर्डिंग अभियान चलाए गए। सोशल मीडिया पर इन वीडियोज के प्रसारित होने के बाद प्रशासनिक तंत्र पर सवाल खड़े होने लगे थे। इसके तुरंत बाद राजस्थान और उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभागों ने कड़ा रुख अपनाते हुए विद्यालय परिसरों की सुरक्षा, बच्चों की गरिमा और शैक्षणिक वातावरण में व्यवधान से बचाव के नाम पर बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश और रिकॉर्डिंग पर कठोर शर्तें लागू कर दीं।

सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत जनहित याचिका में कहा गया है कि सरकारी अथवा सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों की वास्तविक कार्यप्रणाली और उनकी भौतिक स्थिति की जानकारी प्राप्त करना देश के प्रत्येक नागरिक का विधिक अधिकार है। याचिका के अनुसार विद्यालयों के भीतर वीडियोग्राफी और निरीक्षण पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से व्यवस्थागत कमियों और प्रशासनिक लापरवाही को बढ़ावा मिल सकता है। याचिका में यह भी रेखांकित किया गया है कि विद्यालय परिसरों में स्वतंत्र निगरानी रोके जाने से बुनियादी ढांचे की कमियां छिप सकती हैं, जिसका सीधा असर शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ता है।

इस पूरे घटनाक्रम और जर्जर भवनों के वायरल वीडियो पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कड़ा पलटवार करते हुए सरकार का पक्ष रखा है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि कुछ तत्व केवल नकारात्मकता और भ्रम फैलाने के उद्देश्य से पुराने और अनुपयोगी जर्जर भवनों के वीडियो बनाकर प्रसारित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार ने 'ऑपरेशन कायाकल्प' के माध्यम से बेसिक शिक्षा परिषद के विद्यालयों का अभूतपूर्व कायापलट किया है। सवा लाख से अधिक प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में फर्श, बालक-बालिकाओं के लिए अलग शौचालय, स्वच्छ पेयजल, विद्युत आपूर्ति, स्मार्ट क्लासरूम और डिजिटल लाइब्रेरी जैसी आधुनिक सुविधाएं विकसित की गई हैं।

वहीं दूसरी ओर, याचिकाकर्ता और सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों का तर्क है कि लोकतंत्र में पारदर्शिता और जनता की भागीदारी सर्वोच्च है। उनका मानना है कि यदि किसी विद्यालय में आधारभूत सुविधाओं की कमी या असुरक्षित भवन है, तो उसकी वास्तविक स्थिति सामने आने से ही समयबद्ध सुधार संभव हो पाता है। उनका कहना है कि सुरक्षा के बहाने सार्वजनिक संस्थानों में प्रेस और जागरूक नागरिकों के प्रवेश को पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं किया जाना चाहिए।

इस मामले के सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचने से सरकारी तंत्र की जवाबदेही और सार्वजनिक परिसरों में प्रेस तथा स्वतंत्र मीडिया की सीमाओं पर एक बार फिर राष्ट्रीय बहस छिड़ गई है। यह मामला केवल दो राज्यों के परिपत्रों तक सीमित न रहकर देश भर के सरकारी संस्थानों में पारदर्शिता बनाम विद्यार्थियों की सुरक्षा और निजता के संतुलन का प्रमुख विषय बन गया है।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जहां एक तरफ विद्यालयों में पठन-पाठन की शांति, विद्यार्थियों की सुरक्षा और संवेदनशील माहौल का संरक्षण आवश्यक है, वहीं दूसरी तरफ जनहित से जुड़े सरकारी विद्यालयों की वास्तविक स्थिति पर निष्पक्ष निगरानी भी उतनी ही आवश्यक है ताकि बजट और योजनाओं का सही क्रियान्वयन धरातल पर दिखाई दे।

सुप्रीम कोर्ट की संबंधित पीठ द्वारा इस जनहित याचिका को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किए जाने के बाद मामले की दिशा तय होगी। शीर्ष अदालत इस बात की गहन समीक्षा करेगी कि क्या राज्य सरकारों द्वारा जारी प्रशासनिक परिपत्र नागरिकों और मीडिया के संवैधानिक अधिकारों का अतिक्रमण करते हैं अथवा ये विद्यार्थियों के हित में लगाए गए युक्तियुक्त प्रतिबंधों के दायरे में आते हैं।

न्यायालय के आगामी रुख पर उत्तर प्रदेश और राजस्थान सहित पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि इसका फैसला भविष्य में सभी सरकारी विद्यालयों में बाहरी निरीक्षण, रिपोर्टिंग और पारदर्शिता के मानकों को व्यापक रूप से प्रभावित करेगा। इसके साथ ही दोनों राज्य सरकारों की ओर से भी न्यायालय में अपना आधिकारिक प्रत्युत्तर दाखिल करने की तैयारी की जा रही है।

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