Fact Check: क्या यूपीआई पेमेंट पर 25 से 50 रुपये अतिरिक्त चार्ज लगाएगी सरकार? कांग्रेस के दावों और आधिकारिक नियमों की पूरी पड़ताल
यूपीआई पेमेंट पर 25 से 50 रुपये अतिरिक्त शुल्क लगने के कांग्रेस के दावों के बीच जानिए एनपीसीआई और वित्त मंत्रालय के वास्तविक नियम। आम उपभोक्ताओं पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा।
- Fact Check: क्या यूपीआई पेमेंट पर 25 से 50 रुपये अतिरिक्त चार्ज लगाएगी सरकार? कांग्रेस के दावों और आधिकारिक नियमों की पूरी पड़ताल
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- क्या आम जनता के यूपीआई लेन-देन पर लगेगा शुल्क? कांग्रेस के आरोपों के बीच समझिए डिजिटल पेमेंट्स के मौजूदा नियम
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देश भर में करोड़ों नागरिकों की दैनिक जीवनशैली का अहम हिस्सा बन चुके यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) पर शुल्क लगाए जाने को लेकर एक बार फिर राजनीतिक गलियारों और सोशल मीडिया मंचों पर तीखी बहस छिड़ गई है। विपक्षी दल कांग्रेस की ओर से यह दावा किया गया है कि सरकार डिजिटल लेन-देन पर अतिरिक्त अधिभार लगाने की दिशा में कदम बढ़ा रही है, जिसके चलते प्रत्येक यूपीआई भुगतान पर उपभोक्ताओं से 25 से 50 रुपये तक का अतिरिक्त शुल्क वसूला जा सकता है। इस राजनीतिक आरोप के सार्वजनिक होते ही डिजिटल भुगतान करने वाले आम नागरिकों, छोटे व्यापारियों और वित्तीय विश्लेषकों के बीच असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गई है।
हालांकि, वित्तीय नियमों, नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) के मौजूदा परिपत्रों और केंद्रीय वित्त मंत्रालय के आधिकारिक बयानों की पड़ताल करने पर वास्तविक तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है। सरकारी स्तर पर यह बार-बार स्पष्ट किया जा चुका है कि आम उपभोक्ताओं द्वारा एक बैंक खाते से दूसरे बैंक खाते में किए जाने वाले सामान्य यूपीआई ट्रांसफर पर किसी भी प्रकार का अधिभार लगाने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है।
- कांग्रेस के आरोप और राजनीतिक दृष्टिकोण
कांग्रेस पार्टी की ओर से जारी बयानों और सोशल मीडिया पोस्ट्स में यह आरोप लगाया गया कि केंद्र सरकार डिजिटल इंडिया का दायरा बढ़ाने के बाद अब आम जनता पर अप्रत्यक्ष करों और अतिरिक्त शुल्कों का बोझ डालने की तैयारी कर रही है। पार्टी के प्रवक्ताओं का तर्क है कि शुरुआत में सेवाओं को निशुल्क देकर जनता को उनका आदी बनाया गया और अब राजस्व जुटाने के नाम पर प्रति लेन-देन 25 से 50 रुपये तक वसूलने की योजना बनाई जा रही है।
विपक्षी दलों ने इसे छोटे खुदरा विक्रेताओं, दिहाड़ी मजदूरों और मध्यम वर्ग की जेब पर सीधा प्रहार बताते हुए कहा कि यदि डिजिटल भुगतान पर इस प्रकार की लागत जोड़ी जाती है, तो लोग पुनः नकदी अर्थव्यवस्था की ओर लौटने को विवश होंगे। इन आरोपों को लेकर सोशल मीडिया पर व्यापक प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं, जिससे बैंकिंग उपभोक्ताओं के बीच यह आशंका गहराने लगी कि क्या अब सब्जी खरीदने या चाय पीने के लिए किए जाने वाले 10-20 रुपये के भुगतान पर भी बैंक अतिरिक्त पैसे काटेंगे।
- आधिकारिक व्यवस्था: क्या कहता है वित्त मंत्रालय और एनपीसीआई?
इस पूरे मामले में तथ्यात्मक धरातल को समझने के लिए यूपीआई की तकनीकी और नियामकीय व्यवस्था को देखना आवश्यक है। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) और एनपीसीआई के मौजूदा दिशा-निर्देशों के अनुसार, यूपीआई भारत में एक 'पब्लिक गुड' यानी जनहितैषी डिजिटल अवसंरचना के रूप में संचालित होता है।
पीयर-टू-पीयर (P2P) लेन-देन: जब कोई आम व्यक्ति अपने बैंक खाते से किसी अन्य व्यक्ति के बैंक खाते में यूपीआई आईडी, फोन नंबर या क्यूआर कोड के माध्यम से पैसे भेजता है, तो यह सेवा पूरी तरह निःशुल्क है। इसमें बैंक अथवा ऐप प्रदाता द्वारा किसी भी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जा सकता।
पीयर-टू-मर्चेंट (P2M) सामान्य लेन-देन: जब कोई ग्राहक किसी दुकान, मॉल या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर अपने बैंक खाते से सीधे मर्चेंट के बैंक खाते में भुगतान करता है, तो वहां भी ग्राहक के स्तर पर शून्य शुल्क लागू है।
वॉलेट और प्रीपेड इंस्ट्रूमेंट (PPI) इंटरचेंज: पूर्व में लागू किए गए नियमों के अनुसार केवल प्रीपेड पेमेंट इंस्ट्रूमेंट्स (जैसे डिजिटल वॉलेट) के माध्यम से 2,000 रुपये से अधिक के वाणिज्यिक मर्चेंट भुगतानों पर मर्चेंट स्तर पर इंटरचेंज शुल्क का प्रावधान किया गया था। इसका भार कभी भी आम ग्राहक पर नहीं डाला गया।
केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने पूर्व में भी कई मौकों पर आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी कर रेखांकित किया है कि सरकार यूपीआई को एक किफायती, सुरक्षित और जन-सुलभ माध्यम बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। डिजिटल भुगतान तंत्र को संचालित करने वाले बैंकों और सेवा प्रदाताओं को होने वाले बुनियादी ढांचे के खर्च की भरपाई के लिए केंद्र सरकार स्वयं बजट में वित्तीय प्रोत्साहन योजना (इंसेंटिव स्कीम) का प्रावधान करती है।
- ज़ीरो-एमडीआर व्यवस्था और सेवा लागत का सवाल
यूपीआई की वित्तीय स्थिरता को लेकर बैंकिंग जगत में लंबे समय से मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) पर चर्चा होती रही है। मर्चेंट डिस्काउंट रेट वह लागत होती है जो किसी डिजिटल ट्रांजेक्शन को प्रोसेस करने के बदले बैंक या पेमेंट गेटवे द्वारा व्यापारी से ली जाती है। भारत सरकार ने रुपे डेबिट कार्ड और यूपीआई लेन-देन पर 'ज़ीरो-एमडीआर' की नीति लागू कर रखी है, जिसका अर्थ है कि न तो व्यापारी से और न ही ग्राहक से कोई शुल्क लिया जा सकता है।
पेमेंट इंडस्ट्री के कुछ निकाय समय-समय पर यह मांग उठाते रहे हैं कि सर्वर, साइबर सुरक्षा और नेटवर्क मेंटेनेंस के भारी खर्च को देखते हुए बड़े मर्चेंट्स पर मामूली शुल्क लगाने की अनुमति दी जानी चाहिए। इसी संदर्भ में नीति आयोग और विभिन्न शोध समितियों के बीच सैद्धांतिक चर्चाएं होती रही हैं। राजनीतिक दलों द्वारा इन्हीं अकादमिक अथवा नीतिगत चर्चाओं के संदर्भों को उद्धृत कर आम जनता के लेन-देन पर 25 से 50 रुपये का शुल्क लगने का दावा प्रस्तुत किया जाता है, जिसका कोई आधिकारिक नीतिगत आधार मौजूद नहीं है।
- उपभोक्ताओं के लिए क्या है वास्तविक स्थिति?
वर्तमान में देश भर में प्रतिदिन लगभग 40 से 50 करोड़ यूपीआई लेन-देन संपन्न होते हैं। इनमें से 70 प्रतिशत से अधिक लेन-देन 500 रुपये से कम मूल्य वर्ग के होते हैं। ऐसे में यदि किसी भी स्तर पर 25 या 50 रुपये जैसा अवास्तविक शुल्क लागू किया जाता है, तो पूरा डिजिटल भुगतान ढांचा ही चरमरा जाएगा, जिसे न तो सरकार और न ही केंद्रीय बैंक स्वीकार कर सकता है।
अतः सोशल मीडिया या राजनीतिक बयानों के आधार पर फैलने वाली इन खबरों से आम उपभोक्ताओं को घबराने की आवश्यकता नहीं है। किसी भी आधिकारिक नियम में बदलाव की सूचना केवल भारतीय रिज़र्व बैंक, वित्त मंत्रालय अथवा एनपीसीआई के आधिकारिक पोर्टल के माध्यम से ही सार्वजनिक की जाती है। मौजूदा स्थिति में आम नागरिक पूर्व की भांति बिना किसी अतिरिक्त लागत के अपने सभी बैंक-टू-बैंक यूपीआई भुगतानों का संचालन जारी रख सकते हैं।
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