UPSIDA Recruitment Scam: 90 पदों का विज्ञापन निकाल 108 को बांटी नौकरी, 15 साल बाद विजिलेंस ने दर्ज की एफआईआर
यूपीसीडा में 90 पदों के विज्ञापन पर 108 लोगों को फर्जी दस्तावेजों के सहारे नौकरी देने के 15 साल पुराने मामले में यूपी विजिलेंस ने तत्कालीन अधिकारियों पर एफआईआर दर्ज की है।
- कानपुर यूपीसीडा भर्ती घोटाला: फर्जी प्रमाण पत्रों पर दी गई नियुक्तियां, पूर्व अधिकारियों और कर्मचारियों पर कानूनी शिकंजा
- UP Vigilance Action: यूपीसीडा में बहुचर्चित भर्ती धांधली की जांच पूरी, विज्ञापित संख्या से ज्यादा पदों पर अवैध चयन का खुलासा
- यूपीसीडा में नौकरी का बड़ा फर्जीवाड़ा: 90 की जगह 108 पदों पर भर्ती, विजिलेंस ने पूर्व प्रबंध निदेशक समेत कई पर कसा शिकंजा
कानपुर: उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यूपीसीडा, पूर्व में यूपीएसआईडीसी) में लगभग डेढ़ दशक पुराने बहुचर्चित भर्ती घोटाले में भ्रष्टाचार निवारण संगठन (विजिलेंस) ने बड़ी विधिक कार्रवाई की है। सतर्कता अधिष्ठान की कानपुर इकाई ने खुली जांच (ओपन इंक्वायरी) पूरी होने के बाद तत्कालीन जिम्मेदार अधिकारियों, चयन समिति के सदस्यों और अवैध रूप से लाभ पाने वाले अभ्यर्थियों के विरुद्ध धोखाधड़ी, कूटरचित दस्तावेज तैयार करने तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं में प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर ली है। जांच में प्रमाणित हुआ है कि विभाग ने केवल 90 रिक्त पदों के लिए सार्वजनिक विज्ञापन जारी किया था, लेकिन नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए 108 अभ्यर्थियों को फर्जी व असत्यापित प्रमाण पत्रों के आधार पर नियुक्तियां बांट दी गईं।
यह पूरा मामला वर्ष 2008-2009 के दौरान विभिन्न तकनीकी, लिपिकीय और प्रशासनिक संवर्गों की भर्ती से संबंधित है। लंबे समय तक जांच एजेंसियों और विभागीय फाइलों में दबे रहने के बाद शासन से अनुमति मिलते ही विजिलेंस ने आरोपियों के खिलाफ औपचारिक कानूनी शिकंजा कस दिया है। इस कार्रवाई से औद्योगिक विकास महकमे में हड़कंप मच गया है।
- क्या है पूरा घोटाला और कैसे रची गई साजिश?
विजिलेंस की प्राथमिक जांच रिपोर्ट के अनुसार, उस समय मुख्यालय स्तर से सहायक अभियंता, कनिष्ठ अभियंता, लिपिक और अन्य तकनीकी संवर्ग के कुल 90 रिक्त पदों पर भर्ती के लिए विज्ञप्ति निकाली गई थी। लिखित परीक्षा और साक्षात्कार की औपचारिक प्रक्रिया पूरी होने के दौरान पूरी चयन व्यवस्था में बड़े पैमाने पर हेरफेर किया गया:
पदों की संख्या में अवैध बढ़ोतरी: विज्ञापन 90 पदों का था, लेकिन बिना किसी सक्षम सरकारी अनुमोदन, अतिरिक्त रोस्टर निर्धारण या पुनर्विज्ञप्ति के कुल 108 लोगों को नियुक्ति पत्र जारी कर दिए गए। यानी 18 अतिरिक्त पदों पर मनमाने ढंग से चयन किया गया।
फर्जी शैक्षिक और अनुभव प्रमाण पत्र: जांच में पाया गया कि चयनित किए गए कई अभ्यर्थियों के तकनीकी डिप्लोमा, डिग्री और अनुभव प्रमाण पत्र या तो अमान्य संस्थानों से जारी थे या पूरी तरह फर्जी (जाली) थे। चयन समिति ने मूल दस्तावेजों का सत्यापन कराए बिना ही अंतिम मेरिट सूची में उनके नाम शामिल कर लिए।
मेरिट सूची में हेराफेरी: योग्य और उच्च अंक प्राप्त करने वाले वास्तविक अभ्यर्थियों को दरकिनार कर अपात्र लोगों को साक्षात्कार में अनुचित लाभ देकर सफल घोषित किया गया।
- 15 साल तक फाइलों में क्यों उलझा रहा मामला?
इस भर्ती प्रक्रिया के संपन्न होने के तुरंत बाद धांधली की शिकायतें शासन तक पहुंची थीं। प्रारंभिक स्तर पर शिकायतों को दबाने का प्रयास किया गया, लेकिन प्रभावित अभ्यर्थियों द्वारा लोकायुक्त और न्यायालय का दरवाजा खटखटाए जाने के बाद पूरे प्रकरण की जांच सतर्कता अधिष्ठान (विजिलेंस) को सौंपी गई थी।
दस्तावेजों को गायब करने की कोशिश: विजिलेंस सूत्रों के अनुसार, जांच के दौरान कई मूल दस्तावेज, उत्तर पुस्तिकाएं और चयन समिति की मिनट्स बुक मुख्यालय से 'गायब' कर दी गई थीं, जिससे साक्ष्य जुटाने में जांच टीम को वर्षों का समय लगा।
संस्थानों से सत्यापन में देरी: अभ्यर्थियों द्वारा लगाए गए प्रमाण पत्रों का संबंधित विश्वविद्यालयों और संस्थानों से पत्राचार कर सत्यापन कराने में तकनीकी अड़चनें आईं।
अभियोजन स्वीकृति का इंतजार: पूर्व अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए शासन स्तर से मिलने वाली अनिवार्य वैधानिक अनुमति (Prosecution Sanction) मिलने के बाद ही एफआईआर दर्ज की जा सकी।
- किन धाराओं में दर्ज हुआ मुकदमा और कौन हैं दायरे में?
विजिलेंस की कानपुर शाखा द्वारा दर्ज की गई एफआईआर में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 420 (धोखाधड़ी), 467 (मूल्यवान सुरक्षा या वसीयत की जालसाजी), 468 (धोखाधड़ी के उद्देश्य से कूटरचना), 471 (फर्जी दस्तावेज को असली के रूप में इस्तेमाल करना) और 120बी (आपराधिक षड्यंत्र) के साथ-साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) की सुसंगत धाराएं लगाई गई हैं।
प्राथमिकी के दायरे में तत्कालीन चयन समिति के अध्यक्ष, सदस्य सचिव, कार्मिक विभाग के तत्कालीन अनुभाग अधिकारी तथा फर्जी अभिलेखों के जरिए अनुचित लाभ पाने वाले कर्मचारी शामिल हैं। इनमें से कई अधिकारी अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं, जबकि कई अवैध रूप से चयनित कर्मचारी पदोन्नति पाकर वर्तमान में भी विभिन्न क्षेत्रीय कार्यालयों में कार्यरत हैं।
- सेवा समाप्ति और गिरफ्तारी की तलवार?
विजिलेंस अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि एफआईआर दर्ज होने के बाद अब संबंधित आरोपियों के बयान दर्ज किए जाएंगे और फोरेंसिक साक्ष्यों का परीक्षण कराया जाएगा।
वेतन वसूली और बर्खास्तगी: यदि जांच में फर्जी दस्तावेजों से नौकरी पाने वाले कर्मचारियों के अपराध पूरी तरह स्थापित होते हैं, तो विभाग द्वारा उनकी सेवा समाप्ति (बर्खास्तगी) की जाएगी और अब तक लिए गए अवैध वेतन-भत्तों की रिकवरी की कानूनी प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।
जवाबदेही तय करने का संदेश: इस कार्रवाई ने यह साफ कर दिया है कि भले ही समय बीत चुका हो, लेकिन सरकारी भर्तियों में की गई गंभीर अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के मामलों से जिम्मेदार बच नहीं सकते।
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