Ballia News: रामगोविन्द चौधरी: संघर्ष से समाजवाद तक की अविराम यात्रा
जिसने छात्र जीवन में अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना सीखा, उसने पूरी जिंदगी समाज के कमजोर और वंचित की आवाज बनने का संकल्प निभाया
Report - Syed Asif Hussain Zaidi
“जिसने छात्र जीवन में अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना सीखा, उसने पूरी जिंदगी समाज के कमजोर और वंचित की आवाज बनने का संकल्प निभाया।” ये पंक्तियां बांसडीह के दिग्गज समाजवादी नेता रामगोविन्द चौधरी के जीवन को सटीक बयां करती हैं।
9 जुलाई 1953 को जन्मे रामगोविन्द चौधरी की राजनीति किसी पद की लालसा से नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ खड़े होने के साहस से शुरू हुई। तीन भाइयों में सबसे बड़े चौधरी जी ने गांव की मिट्टी से संस्कार लिए। प्राथमिक शिक्षा गांव से और स्कूली शिक्षा सिकंदरपुर से पूरी करने के बाद उन्होंने सतीश चंद्र कॉलेज में बीएससी में दाखिला लिया। छात्र हितों के लिए आंदोलन के कारण उन्हें कॉलेज से निष्कासित कर दिया गया, लेकिन उनका संघर्ष नहीं रुका। उन्होंने श्री मुरली मनोहर टाउन पीजी कॉलेज, बलिया में प्रवेश लिया और यहीं से छात्र राजनीति ने जनआंदोलन का रूप लिया।

- छात्र राजनीति से जनसंघर्ष तक
1972 में वे टाउन कॉलेज छात्रसंघ के महामंत्री और 1974 में अध्यक्ष निर्वाचित हुए। आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की रक्षा के लिए उन्होंने संघर्ष का रास्ता चुना। जेपी आंदोलन में वे जनपद छात्र युवा वाहिनी के सह-संयोजक रहे। उन पर इनाम घोषित हुआ और टीडी कॉलेज परिसर से गिरफ्तारी के बाद लगभग 24 महीने तक वे जेल में रहे। जेल से रिहाई का दिन भी ऐतिहासिक रहा। उसी दिन बलिया कलेक्ट्रेट में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर लोकसभा चुनाव का नामांकन करने आए थे। छात्रों का हुजूम देखकर उन्होंने रामगोविन्द को बुलाया, यहीं से एक बड़े समाजवादी चिंतक के साथ उनका आत्मीय और वैचारिक रिश्ता बना, जिसने उनके राजनीतिक जीवन की दिशा तय की।
- विधानसभा से सरकार तक
1977 में उन्होंने चिलकहर विधानसभा से जनता पार्टी के टिकट पर पहली बार चुनाव जीता और फिर लगातार पांच बार वहां से विधायक रहे। विधायक रहते हुए ही उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री हासिल की।
1991 में मुलायम सिंह यादव की सरकार में वे खाद्य प्रसंस्करण एवं उद्यान विभाग के कैबिनेट मंत्री बने। 2000 में समाजवादी जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बने। 2002 में बांसडीह से सपा समर्थित प्रत्याशी के रूप में उन्होंने तत्कालीन कैबिनेट मंत्री बच्चा पाठक को करीब 6 हजार वोटों से हराया। 2004 में मुलायम सरकार में उन्हें बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग मिला।
2007 में वे बांसडीह से महज 264 वोटों से हारे, लेकिन संघर्ष जारी रहा। 2012 में फिर जीतकर अखिलेश यादव सरकार में बेसिक शिक्षा, बाल विकास एवं पुष्टाहार और बाद में समाज कल्याण व पंचायती राज जैसे अहम विभागों के मंत्री बने। 2017 में उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी केतकी सिंह को 1,655 वोटों से हराया और उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी संभाली।
- याद किए जाने वाले फैसले
बेसिक शिक्षा मंत्री के रूप में शिक्षकों के खाते में सीधे ऑनलाइन वेतन, शिक्षामित्रों का समायोजन और सहायता प्राप्त जूनियर हाईस्कूलों में अधिसंख्य शिक्षकों का समायोजन उनके ऐतिहासिक फैसले रहे। पंचायती राज मंत्री रहते हुए ग्राम प्रधानों और ब्लॉक प्रमुखों को मानदेय देने की व्यवस्था शुरू की। रामगोविन्द चौधरी का जाना केवल पार्टी के लिए अपूरणीय क्षति नहीं, बल्कि मेरे जीवन की व्यक्तिगत क्षति है, जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती।
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