CJP के सौरभ दास विवाद: पुलित्जर सेंटर, ओपन सोसाइटी फाउंडेशन से लाखों डॉलर फंडिंग के दावों का क्या है सच?

सौरभ दास पर पुलित्जर सेंटर, जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसाइटी फाउंडेशन (OSF) और नॉर्वे की एजेंसियों से डॉलर में फंड जुटाने के आरोप। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

By INA News Desk
Jul 27, 2026 - 23:09
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CJP के सौरभ दास विवाद: पुलित्जर सेंटर, ओपन सोसाइटी फाउंडेशन से लाखों डॉलर फंडिंग के दावों का क्या है सच?
सौरभ दास
  • सौरभ दास पर अंतरराष्ट्रीय फंडिंग के आरोप: जॉर्ज सोरोस की OSF, नॉर्वे की एजेंसी और पुलित्जर सेंटर से जुड़े दावों का विश्लेषण
  • पत्रकार सौरभ दास को लेकर क्यों मचा बवाल? पुलित्जर सेंटर और OSF फंडिंग से जुड़े प्रमुख आरोपों का पूरा ब्यौरा
  • सौरभ दास पर विदेशी संस्थाओं से डॉलर में फंड जुटाने के आरोप, ओपन सोसाइटी फाउंडेशन और Norad के नाम पर छिड़ी बहस

स्वतंत्र पत्रकारिता और आरटीआई एक्टिविज्म से पहचान बनाने वाले पूर्व पत्रकार सौरभ दास एक बार फिर बड़े विवादों के घेरे में हैं। सोशल मीडिया और विभिन्न डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (जैसे NMF News) पर वायरल हो रहे दस्तावेजों और रिपोर्टों के बाद उन पर विदेशी संस्थाओं से लाखों डॉलर (करोड़ों रुपये) में फंडिंग प्राप्त करने के गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। इन दावों में पुलित्जर सेंटर (Pulitzer Center), जॉर्ज सोरोस से जुड़ी 'ओपन सोसाइटी फाउंडेशंस' (Open Society Foundations - OSF), नॉर्वेजियन एजेंसी फॉर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (Norad) और लाउडेस फाउंडेशन जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के नाम शामिल हैं। आलोचकों का आरोप है कि इन भारी-भरकम विदेशी फंड्स का इस्तेमाल भारत में आंदोलनों को प्रभावित करने और विशिष्ट नैरेटिव गढ़ने के लिए किया गया।

हाल ही में सोशल मीडिया पर कुछ स्क्रीनशॉट्स और खोजी रिपोर्ट वायरल हुई हैं, जिनमें दावा किया गया है कि पूर्व पत्रकार सौरभ दास और उनसे जुड़े मीडिया मॉडल्स को अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और विदेशी फाउंडेशंस से बड़े पैमाने पर वित्तीय सहायता मिली है।

सोशल मीडिया पर "कॉकरोच" शब्द का प्रयोग करते हुए आक्रामक अभियान चलाए जा रहे हैं, जिसमें आरोप लगाया गया है कि नार्वे और अमेरिका स्थित फाउंडेशंस से मिलने वाले पैसों का इस्तेमाल भारतीय राजनीति और सामाजिक आंदोलनों (जैसे दिल्ली किसान आंदोलन और छात्र प्रदर्शनों) में हस्तक्षेप करने के लिए किया गया। इन आरोपों के केंद्र में पुलित्जर सेंटर द्वारा पत्रकारिता मॉडल्स के लिए घोषित $30 मिलियन (लगभग 300 लाख डॉलर) का सपोर्ट और ओपन सोसाइटी फाउंडेशंस से मिली वित्तीय प्रतिबद्धताएं शामिल हैं।

1. विदेशी संस्थाओं और लाखों डॉलर की फंडिंग के आरोप

वायरल रिपोर्टों और सार्वजनिक दस्तावेजों के हवाले से सौरभ दास और उनसे जुड़े नेटवर्क पर निम्न लिखित अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से फंड प्राप्त करने या उनके अनुदानित प्रोजेक्ट्स से जुड़े होने के आरोप लग रहे हैं:

  • पुलित्जर सेंटर (Pulitzer Center): दस्तावेजों के अनुसार, पुलित्जर सेंटर ने वैश्विक स्तर पर अपने इन्नोवेटिव जर्नलिज्म मॉडल और ऑडियंस एंगेजमेंट के लिए लगभग $30 मिलियन (30 मिलियन डॉलर) का समर्थन घोषित किया था। इसमें वर्षावनों, महासागरों, वित्तीय पारदर्शिता और कॉर्पोरेट/सरकारी जवाबदेही पर काम करने के लिए अगले पांच वर्षों के लिए $16 मिलियन (16 मिलियन डॉलर) की प्रतिबद्धता शामिल है।

  • नॉर्वेजियन एजेंसियां (Norad & NICFI): इस वैश्विक जर्नलिज्म मॉडल के प्रमुख समर्थकों में नॉर्वेजियन एजेंसी फॉर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (Norad) और नॉर्वे की इंटरनेशनल क्लाइमेट एंड फॉरेस्ट इनिशिएटिव (NICFI) का नाम प्रमुखता से दर्ज है।

  • ओपन सोसाइटी फाउंडेशंस (OSF): रिपोर्टों में सबसे गंभीर आरोप जॉर्ज सोरोस की संस्था Open Society Foundations (OSF) द्वारा दिए गए $900,000 (9 लाख डॉलर) के मल्टी-इयर सपोर्ट को लेकर हैं।

  • लाउडेस फाउंडेशन (Laudes Foundation): इसके अलावा, क्लाइमेट, लेबर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) एकाउंटेबिलिटी पर काम करने के लिए $2.4 मिलियन (24 लाख डॉलर) की अतिरिक्त फंडिंग का उल्लेख भी दस्तावेजों में किया गया है।

2. आंदोलनों में हस्तक्षेप और नैरेटिव गढ़ने का आरोप

आलोचकों और कुछ डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का आरोप है कि सौरभ दास ने इन अंतरराष्ट्रीय फंड्स का उपयोग कर स्वतंत्र पत्रकारिता के मुखौटे के पीछे काम किया।

  • दिल्ली आंदोलनों में भूमिका: यह आरोप लगाया जाता है कि दिल्ली के सीमाओं पर हुए प्रदर्शनों और छात्र आंदोलनों के दौरान ग्राउंड रिपोर्टिंग के नाम पर ऐसा माहौल तैयार किया गया जिससे आम जनता में भ्रम फैले।

  • विदेशी एजेंडे के तहत कार्य: विरोधियों का दावा है कि जॉर्ज सोरोस की OSF जैसी संस्थाएं वैश्विक स्तर पर सरकारों के खिलाफ माहौल बनाने के लिए जानी जाती हैं, और उनसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सहायता प्राप्त कर भारत की आंतरिक राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश की गई।

3. कानूनी व प्रक्रियात्मक पहलू

भारतीय कानून के तहत किसी भी भारतीय नागरिक, पत्रकार या संगठन द्वारा विदेशों से वित्तीय मदद प्राप्त करने के लिए कठोर नियम लागू होते हैं:

  • FCRA और आयकर नियम: विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) के तहत बिना सरकारी मंजूरी के विदेशी फंड प्राप्त करना गैर-कानूनी है।

  • वित्तीय ऑडिट की मांग: आलोचकों द्वारा मांग की जा रही है कि सौरभ दास और उनसे जुड़ी संस्थाओं की बैंक डिटेल्स और एफसीआरए अनुपालन की जांच की जाए ताकि यह साफ हो सके कि क्राउडफंडिंग या फेलोशिप के नाम पर कितना पैसा भारत आया।

आलोचकों और स्वतंत्र मीडिया विश्लेषकों का पक्ष

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कोई पत्रकार या एक्टिविस्ट जॉर्ज सोरोस की OSF या विदेशी सरकारों की एजेंसियों (जैसे Norad) से जुड़े वित्तीय नेटवर्क से लाभ उठाता है, तो उसकी निष्पक्षता समाप्त हो जाती है। उनका कहना है कि विदेशी पैसों के दम पर देश के अंदर आंदोलनों को भड़काना या बरगलाना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक है।

सौरभ दास और उनसे जुड़े विचारकों का हमेशा से यह तर्क रहा है:

  1. ग्रांट्स और फेलोशिप्स: वे इन फंड्स को अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता फेलोशिप, क्लाइमेट रिपोर्टिंग ग्रांट या खोजी पत्रकारिता प्रोजेक्ट्स का हिस्सा बताते हैं, जो वैश्विक स्तर पर पत्रकारों को दिए जाते हैं।

  2. पारदर्शिता का दावा: उनका कहना है कि पुलित्जर सेंटर जैसे मंचों से मिलने वाला समर्थन सार्वजनिक और पारदर्शी होता है और इसका उद्देश्य पर्यावरण, श्रम और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे विषयों पर निष्पक्ष रिपोर्टिंग करना है।

  3. एजेंडे के तहत घेराबंदी: समर्थकों का आरोप है कि सरकारी नीतियों पर सवाल उठाने और आरटीआई के ज़रिए खुलासे करने के कारण उन्हें चुनिंदा रूप से निशाना बनाया जा रहा है।

सौरभ दास से जुड़े इस फंडिंग विवाद ने भारतीय मीडिया जगत में एक नई बहस को जन्म दिया है:

  • विदेशी फंडिंग बनाम स्वतंत्र पत्रकारिता: यह सवाल उठ रहा है कि क्या विदेशी FOUNDATIONS के पैसों से की जाने वाली रिपोर्टिंग वाकई "स्वतंत्र" हो सकती है?

  • राष्ट्रीय सुरक्षा और डिजिटल मीडिया: जॉर्ज सोरोस और पश्चिमी एजेंसियों के भारतीय मीडिया परिदृश्य में वित्तीय प्रवेश को लेकर सुरक्षा एजेंसियां और आम नागरिक अधिक सतर्क हो गए हैं।

  • मीडिया की साख पर असर: जब किसी पत्रकार का नाम करोड़ों रुपये ($ Millions) की विदेशी फंडिंग से जुड़ता है, तो आम जनता का निष्पक्ष रिपोर्टिंग पर से विश्वास डगमगाता है।

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