'मैं रख लूंगी अपना ख्याल': नाइट शिफ्ट और पारिवारिक तनाव से तंग आकर महिला ने छोड़ी कॉर्पोरेट जॉब, अब बेंगलुरु की सड़कों पर चला रहीं ऑटो
Bengaluru News: नाइट शिफ्ट के मानसिक दबाव और पारिवारिक तनाव से परेशान होकर बेंगलुरु की एक महिला ने कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ दी। अब वह शहर में ऑटो चलाकर स्वाभिमान से आजीविका कमा रही हैं।
- IT हब में आत्मनिर्भरता की नई मिसाल: मानसिक शांति के लिए छोड़ी नौकरी, बेंगलुरु में ऑटो चलाकर स्वाभिमान से जी रहीं पूर्व कॉर्पोरेट कर्मी
- Bengaluru News: नाइट शिफ्ट के दबाव और घरेलू कलह के बीच महिला ने चुना नया रास्ता, ऑटो चलाकर संभाल रहीं अपनी जिंदगी
- बेंगलुरु की सड़कों पर ऑटो चलाती पूर्व कॉर्पोरेट पेशेवर: जब परिवार और नौकरी दोनों ने दिया तनाव, तो ऐसे चुनी अपनी आजादी
देश की सिलिकॉन वैली कहे जाने वाले बेंगलुरु शहर में कॉर्पोरेट चमक-दमक के पीछे छिपे मानसिक दबाव, असामान्य कार्यशैली और पारिवारिक तनाव को लेकर एक बेहद भावुक और प्रेरक कहानी सामने आई है। लंबे समय तक नाइट शिफ्ट में काम करने के कारण बिगड़ते स्वास्थ्य और घर-परिवार से लगातार मिलने वाले मानसिक दबाव से त्रस्त होकर एक महिला ने अपनी सुरक्षित कॉर्पोरेट नौकरी को अलविदा कह दिया। विषम परिस्थितियों के आगे झुकने के बजाय उन्होंने स्वाभिमान का मार्ग चुना और अब वे बेंगलुरु की व्यस्त सड़कों पर पूरे आत्मविश्वास के साथ ऑटो-रिक्शा चलाकर अपनी आजीविका कमा रही हैं।
'मैं रख लूंगी अपना ख्याल' का यह संकल्प उस समय सार्वजनिक चर्चा में आया जब एक यात्री के साथ उनकी बातचीत का अनुभव सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों पर साझा हुआ। यह घटना केवल एक महिला के नौकरी छोड़ने का व्यक्तिगत फैसला नहीं है, बल्कि यह महानगरीय जीवन में कार्य-जीवन संतुलन (Work-Life Balance) और मानसिक शांति की तलाश कर रहे लाखों युवाओं के संघर्ष को भी उजागर करती है।
- नाइट शिफ्ट, स्वास्थ्य और पारिवारिक कलह का तिहरा दबाव
महिला के अनुसार, कॉर्पोरेट क्षेत्र में उनकी नौकरी आर्थिक रूप से स्थिर थी, लेकिन लगातार नाइट शिफ्ट में काम करने की वजह से उनकी जीवनशैली पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो चुकी थी। नींद की कमी, अनियमित खान-पान और शारीरिक थकान का सीधा असर उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा था।
समस्या तब और गंभीर हो गई जब कार्यस्थल के तनाव के बीच पारिवारिक मोर्चे पर भी उन्हें भावनात्मक संबल मिलने के बजाय आलोचनाओं और अतिरिक्त अपेक्षाओं का सामना करना पड़ा। घर के भीतर बढ़ते कलह और मानसिक शांति के अभाव ने उन्हें इस कगार पर पहुंचा दिया जहां उन्हें अपने जीवन और स्वास्थ्य के लिए कोई कड़ा फैसला लेना ही पड़ा। उन्होंने स्पष्ट रूप से महसूस किया कि जो नौकरी उनके स्वास्थ्य और मानसिक शांति को छीन रही हो, वह केवल वेतन के लिए जारी नहीं रखी जा सकती।
- स्वाभिमान का चुनाव: जब थामा ऑटो का स्टेयरिंग
नौकरी छोड़ने के बाद आर्थिक निर्भरता के संकट से बचने और किसी के सामने हाथ न फैलाने के दृढ़ निश्चय के साथ उन्होंने स्वरोजगार का रास्ता चुना। पारंपरिक रूढ़ियों और समाज की संकीर्ण धारणाओं की परवाह किए बिना उन्होंने ऑटो-रिक्शा चलाने का निर्णय लिया।
बेंगलुरु जैसे महानगर में, जहां भारी ट्रैफिक और कठिन ड्राइविंग परिस्थितियां आम हैं, एक महिला के रूप में ऑटो लेकर निकलना आसान नहीं था। शुरुआत में यात्रियों के अचरज भरे व्यवहार और सामाजिक संकोच का सामना करना पड़ा, लेकिन महिला ने अपने पेशेवर रवैये और विनम्रता से सभी का विश्वास जीता। महिला का कहना है कि ऑटो चलाने से उन्हें समय की स्वतंत्रता मिली है। अब वे कब काम करना चाहती हैं और कब विश्राम, इसका नियंत्रण पूरी तरह उनके अपने हाथों में है। सबसे बड़ी बात यह है कि अब उनके पास अपनी मानसिक शांति और आत्मसम्मान सुरक्षित है।
- सोशल मीडिया पर मिली सराहना, वर्क कल्चर पर छिड़ी बहस
महिला के इस अदम्य साहस और आत्मनिर्भरता की कहानी सामने आने के बाद डिजिटल माध्यमों पर लोगों की जबरदस्त प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। नेटिजन्स ने महिला के फैसले की सराहना करते हुए कहा कि सम्मानजनक आजीविका का कोई भी कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता, बशर्ते वह आत्मसम्मान और शांति प्रदान करे।
साथ ही इस घटना ने भारतीय कॉर्पोरेट सेक्टर में विशेषकर आईटी और बीपीओ कंपनियों में काम करने वाले कर्मचारियों की नाइट शिफ्ट, असामान्य वर्किंग आवर्स और मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों पर एक नई बहस छेड़ दी है। समाजशास्त्रियों का मानना है कि आधुनिक परिवारों में कामकाजी महिलाओं पर दोहरी जिम्मेदारी का जो बोझ डाला जाता है, यह मामला उसकी भी एक गंभीर बानगी है।
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