West Bengal Politics: बंगाल उपचुनाव से पहले बड़ा सियासी भूचाल, चुनाव आयोग ने फ्रीज किया तृणमूल कांग्रेस का नाम और चुनाव चिह्न

पश्चिम बंगाल में उपचुनाव से पहले चुनाव आयोग ने ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस के नाम और 'घास पर दो फूल' चुनाव चिह्न के इस्तेमाल पर दोनों गुटों के लिए अंतरिम रोक लगा दी है।

By INA News Desk
Sep 18, 2026 - 15:45
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West Bengal Politics: बंगाल उपचुनाव से पहले बड़ा सियासी भूचाल, चुनाव आयोग ने फ्रीज किया तृणमूल कांग्रेस का नाम और चुनाव चिह्न
  • TMC Symbol Row: न नाम मिलेगा न 'घास पर दो फूल' का सिंबल, ममता बनर्जी और बागी गुट के विवाद में चुनाव आयोग का सख्त फैसला
  • Election Commission Action: टीएमसी में आंतरिक विभाजन के दावों के बीच चुनाव चिह्न सीज, जानिए क्या है दोनों गुटों का रुख
  • बंगाल की राजनीति में नया मोड़: पार्टी सिंबल और नाम पर रोक को ममता गुट ने बताया अवैध, विरोधी खेमे ने किया आयोग के आदेश का स्वागत

कोलकाता/नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में होने वाले आगामी विधानसभा उपचुनावों से ऐन पहले राज्य के राजनीतिक परिदृश्य में अप्रत्याशित और बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने एक महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश पारित करते हुए 'ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' (AITC) के मूल नाम और उसके अधिकृत चुनाव चिह्न 'घास पर दो फूल' (जोड़ा घास) के इस्तेमाल पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। आयोग ने यह कदम पार्टी के भीतर दो परस्पर विरोधी गुटों के बीच संगठन और चुनाव चिह्न पर वास्तविक दावेदारी को लेकर खड़े हुए विवाद के मद्देनजर उठाया है।

निर्वाचन आयोग द्वारा जारी आदेश के मुताबिक, जब तक पार्टी के आंतरिक विभाजन और वास्तविक उत्तराधिकार से जुड़े विवाद का अंतिम कानूनी निपटारा नहीं हो जाता, तब तक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला मुख्य गुट और असंतुष्ट बागी गुट दोनों में से कोई भी पक्ष मूल पार्टी के नाम और पारंपरिक चुनाव चिह्न का इस्तेमाल नहीं कर सकेगा। आगामी उपचुनावों की प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाए रखने के लिए आयोग ने दोनों पक्षों को निर्देश दिया है कि वे अपने प्रत्याशियों के लिए अलग-अलग अंतरिम नाम और स्वतंत्र चुनाव चिह्नों के विकल्पों की सूची आयोग के समक्ष प्रस्तुत करें।

  • फैसले पर आमने-सामने आए दोनों गुट

चुनाव आयोग के इस अंतरिम निर्णय के बाद पश्चिम बंगाल की सियासत में तीखा आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गया है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले आधिकारिक गुट ने आयोग के इस कदम को पूरी तरह असंवैधानिक, राजनीति से प्रेरित और विधि-विरुद्ध करार दिया है। पार्टी के वरिष्ठ प्रवक्ताओं और विधिक सलाहकारों का कहना है कि तृणमूल कांग्रेस एक पंजीकृत और मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है, जिसके पास राज्य विधानसभा और संसद के दोनों सदनों में भारी संख्याबल है। उन्होंने आरोप लगाया कि लोकतांत्रिक जनादेश को कमजोर करने के लिए प्रशासनिक अधिकारों का दुरुपयोग किया जा रहा है और वे इस आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के विधिक विकल्पों पर विचार कर रहे हैं।

दूसरी ओर, पार्टी से असंतुष्ट विद्रोही गुट ने चुनाव आयोग के फैसले का पुरजोर स्वागत किया है। विद्रोही खेमे के नेताओं का दावा है कि पार्टी के मूल संविधान और आंतरिक लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का लंबे समय से उल्लंघन किया जा रहा था। उन्होंने कहा कि आयोग का यह फैसला साबित करता है कि पार्टी केवल कुछ व्यक्तियों की निजी जागीर नहीं है, बल्कि उसके संस्थापक सदस्यों और कार्यकर्ताओं का समान अधिकार है। बागी गुट ने इसे जमीनी कार्यकर्ताओं की नैतिक जीत बताते हुए आयोग के समक्ष अपनी निष्ठा और विधिवत दावेदारी साबित करने की बात कही है।

  • सिंबल आर्डर 1968 और चुनाव आयोग की शक्ति

राजनीतिक दलों में विभाजन या चुनाव चिह्न पर दोहरे दावे की स्थिति में निर्वाचन आयोग 'चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968' (Election Symbols (Reservation and Allotment) Order, 1968) के पैरा 15 के तहत प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करता है। जब किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के दो परस्पर विरोधी गुट खुद को ही 'असली पार्टी' बताते हुए एक ही सिंबल पर दावा ठोकते हैं, तो आयोग के समक्ष मुख्य रूप से दो प्रमुख कसौटियां होती हैं:

संगठनात्मक बहुमत: पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी, प्रदेश कमेटियों और प्रतिनिधि परिषदों में किस गुट के पास कितने अधिकृत सदस्यों का समर्थन है।

विधायी बहुमत: संसद (लोकसभा व राज्यसभा) और राज्य विधानसभा या विधान परिषद में निर्वाचित विधायकों और सांसदों की संख्या किस खेमे के पक्ष में अधिक है।

जब उपचुनाव या आम चुनाव सिर पर होते हैं और आयोग के पास दोनों पक्षों के हलफनामों, दलीलों और दस्तावेजों की विस्तृत जांच का पर्याप्त समय नहीं होता, तब कानूनन किसी भी एक पक्ष को अनुचित चुनावी लाभ मिलने से रोकने के लिए नाम और सिंबल को 'फ्रीज' (रोकना) किया जाता है। इससे पहले भी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर शिवसेना, लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) और अन्नाद्रमुक (AIADMK) जैसे दलों के मामलों में आयोग इसी तरह की प्रक्रिया अपना चुका है।

  • आगामी उपचुनावों पर क्या होगा असर?

पश्चिम बंगाल में आगामी उपचुनावों के संदर्भ में आयोग का यह फैसला बेहद संवेदनशील माना जा रहा है। अब चुनाव मैदान में उतरने वाले तृणमूल पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों को अस्थायी तौर पर आवंटित नए नामों और मुफ्त प्रतीकों (Free Symbols) के सहारे जनता के बीच जाना होगा।

पश्चिम बंगाल में 'घास पर दो फूल' का सिंबल तृणमूल कांग्रेस के गठन (1998) के समय से ही मतदाताओं के बीच पार्टी की प्राथमिक पहचान रहा है। ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरी वार्डों तक पार्टी का प्रचार इसी प्रतीक पर केंद्रित रहा है। ऐसे में अचानक चुनाव चिह्न पर रोक लगने से मतदाताओं के बीच असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। दोनों ही गुटों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे कम समय के भीतर अपने नए चुनाव चिह्न को मतदाताओं तक कैसे पहुंचाते हैं।

इस विवाद ने राज्य के विपक्षी दलों विशेषकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), वाममोर्चा और कांग्रेस को भी राजनीतिक हमले का नया अवसर दे दिया है। विपक्षी दलों का कहना है कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर लंबे समय से चल रही गुटबाजी और सत्ता संघर्ष अब खुलकर सतह पर आ गया है। उनका आरोप है कि पार्टी के भीतर सांगठनिक नियंत्रण और वित्तीय प्रभुत्व को लेकर खींचतान चल रही थी, जिसके परिणामस्वरूप यह संवैधानिक संकट खड़ा हुआ है।

वहीं, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कानूनी लड़ाई लंबी खिंचने वाली है। उपचुनावों के बाद भी चुनाव आयोग में दोनों पक्षों के बीच शक्ति प्रदर्शन चलेगा, जहां शपथपत्रों और मूल हस्ताक्षर वाले दस्तावेजों की सत्यता जांची जाएगी। जब तक आयोग किसी एक गुट को वास्तविक उत्तराधिकारी घोषित नहीं करता या मामला अदालत में नहीं सुलझता, तब तक राज्य का सियासी पारा गर्म रहने के पूरे आसार हैं।

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