Gujarat Crime News: न शव मिला, न 40 गवाह टिके; फिर भी लिव-इन पार्टनर की हत्या में पुलिस इंस्पेक्टर को कैसे हुई सजा?

गुजरात में बिना शव बरामद हुए और 40 से ज्यादा गवाहों के मुकरने के बावजूद पुलिस इंस्पेक्टर अजय देसाई को लिव-इन पार्टनर की हत्या में उम्रकैद की सजा सुनाई गई।

By INA News Desk
Aug 16, 2026 - 17:22
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Gujarat Crime News: न शव मिला, न 40 गवाह टिके; फिर भी लिव-इन पार्टनर की हत्या में पुलिस इंस्पेक्टर को कैसे हुई सजा?
  • गुजरात का चर्चित स्वीटी पटेल हत्याकांड: फॉरेंसिक साक्ष्यों और डीएनए के दम पर पुलिस इंस्पेक्टर अजय देसाई को उम्रकैद
  • बिना लाश और 40 से ज्यादा गवाहों के मुकरने के बाद भी कातिल इंस्पेक्टर को उम्रकैद: जानें अदालत में कैसे साबित हुआ जुर्म
  • Gujarat Crime: लिव-इन पार्टनर हत्याकांड में निलंबित पुलिस इंस्पेक्टर को उम्रकैद, फॉरेंसिक व परिस्थितिजन्य साक्ष्य बने आधार

गुजरात के वडोदरा जिले की एक विशेष सत्र अदालत ने आपराधिक न्यायशास्त्र की दृष्टि से एक अत्यंत दुर्लभ और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए निलंबित पुलिस इंस्पेक्टर अजय देसाई को अपनी लिव-इन पार्टनर स्वीटी पटेल की हत्या का दोषी करार दिया है। इस सनसनीखेज मामले में पीड़िता का शव कभी बरामद नहीं हो सका और अभियोजन पक्ष के 40 से अधिक प्रमुख गवाह भी अदालत में अपने बयानों से मुकर गए थे। इसके बावजूद, पुलिस और फॉरेंसिक विशेषज्ञों द्वारा तैयार की गई परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की अटूट कड़ी, बरामद हड्डियों के अंशों की डीएनए मैपिंग, कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (सीडीआर) और वैज्ञानिक परीक्षणों ने अदालत में दोष सिद्ध करने में निर्णायक भूमिका निभाई। अदालत ने आरोपी को आजीवन कारावास की सजा सुनाते हुए यह स्पष्ट किया कि वैज्ञानिक साक्ष्यों के सामने तकनीकी खामियां टिक नहीं सकतीं।

यह आपराधिक मामला जून 2021 का है, जब वडोदरा जिले के करजण क्षेत्र से 37 वर्षीय स्वीटी पटेल अचानक संदिग्ध परिस्थितियों में लापता हो गई थीं। स्वीटी पटेल गुजरात पुलिस में तैनात सब-इंस्पेक्टर (बाद में इंस्पेक्टर) अजय देसाई के साथ पिछले कई वर्षों से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही थीं और दोनों का एक दो वर्षीय पुत्र भी था।

लापता होने के कई दिनों बाद जब परिजनों के दबाव में जांच तेज हुई, तो यह सामान्य गुमशुदगी का मामला न होकर एक सुनियोजित हत्याकांड के रूप में सामने आया। जांच एजेंसियों के अनुसार, शादी के पारिवारिक दबाव और आपसी कलह के चलते आरोपी पुलिस अधिकारी ने कथित तौर पर घर में ही गला दबाकर स्वीटी पटेल की हत्या कर दी और साक्ष्य मिटाने के उद्देश्य से शव को अटाली गांव स्थित एक सुनसान निर्माणाधीन होटल के पीछे ले जाकर लकड़ी और ज्वलनशील पदार्थों की मदद से पूरी तरह जला दिया।

वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपी ने मामले को सामान्य गुमशुदगी का रूप देने का भरसक प्रयास किया। चूंकि आरोपी स्वयं पुलिस विभाग में सेवारत था, इसलिए उसने जांच से बचने और कानूनी प्रक्रियाओं को चकमा देने के लिए हर संभव रणनीति अपनाई। उसने परिजनों को गुमराह किया कि स्वीटी झगड़ा करके कहीं चली गई है। मामले की गंभीरता को देखते हुए जब राज्य सरकार ने जांच गुजरात आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) और अपराध शाखा (क्राइम ब्रांच) को सौंपी, तो कड़ियां जुड़नी शुरू हुईं। जांच दल ने उस स्थान की शिनाख्त की जहां शव को जलाया गया था। जमीन की गहरी खुदाई और फॉरेंसिक जांच के बाद वहां से राख और जली हुई सूक्ष्म हड्डियों के टुकड़े बरामद किए गए।

अदालत में मुकदमे की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष को उस समय भारी झटके लगे जब घटना से जुड़े 40 से ज्यादा महत्वपूर्ण गवाह अपने बयानों से मुकर गए। प्रत्यक्षदर्शियों के अभाव और मुख्य गवाहों के पक्षद्रोही (होस्टाइल) होने के बाद मामले का पूरा दारोमदार वैज्ञानिक और तकनीकी साक्ष्यों पर टिक गया।

फॉरेंसिक साक्ष्य

अभियोजन पक्ष की ओर से सरकारी वकीलों ने अदालत में दलील दी कि कानून की नजर में 'कॉर्पस डेलिक्टी' (शव की भौतिक उपस्थिति) अनिवार्य नहीं है, यदि परिस्थितिजन्य साक्ष्य संदेह से परे यह साबित कर दें कि पीड़ित की हत्या की गई है। फॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरी (एफएसएल) ने घटनास्थल से मिले हड्डियों के अति-सूक्ष्म अवशेषों का मिलान पीड़िता के जैविक पुत्र और माता-पिता के डीएनए से सफलता पूर्वक स्थापित किया, जिसने यह साबित कर दिया कि जले हुए अवशेष स्वीटी पटेल के ही थे।

इसके अलावा, आरोपी की गाड़ी के जीपीएस मूवमेंट, मोबाइल टावर लोकेशन, वारदात की रात पेट्रोल और लकड़ी की व्यवस्था से जुड़े डिजिटल रिकॉर्ड्स और पॉलीग्राफ टेस्ट के निष्कर्षों ने आरोपी के बचाव के तर्कों को पूरी तरह खारिज कर दिया। बचाव पक्ष ने गवाहों के मुकरने और प्रत्यक्ष साक्ष्य न होने का हवाला देकर बरी करने की मांग की थी, लेकिन अदालत ने वैज्ञानिक सुबूतों को सर्वोपरि माना।

इस अदालती फैसले को भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में एक नजीर (लैंडमार्क वर्डिक्ट) के रूप में देखा जा रहा है। आमतौर पर यह धारणा रहती है कि शव न मिलने और गवाहों के मुकर जाने पर हत्या का मुकदमा अदालत में कमजोर पड़ जाता है। इस निर्णय ने यह साबित कर दिया है कि यदि जांच एजेंसी अत्याधुनिक फॉरेंसिक तकनीकों और डिजिटल ट्रेल का पेशेवर इस्तेमाल करे, तो शक्तिशाली आरोपियों को भी कानून के शिकंजे में लाया जा सकता है। इस फैसले से पुलिस जांच में फॉरेंसिक साइंस, डीएनए विश्लेषण और डिजिटल साक्ष्यों के महत्व पर कानूनी मुहर लगी है। साथ ही, यह फैसला गवाहों के पक्षद्रोही होने की बढ़ती प्रवृत्ति के बावजूद न्याय की उम्मीद को मजबूत करता है।

सत्र अदालत द्वारा दोषी करार दिए जाने और उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के बाद आरोपी पक्ष के पास उच्च न्यायालय (हाईकोर्ट) में अपील दायर करने का कानूनी विकल्प उपलब्ध है। दूसरी ओर, कानूनी विशेषज्ञ इस फैसले का अध्ययन कर रहे हैं क्योंकि यह मामला भविष्य में बिना शव बरामदगी वाले जटिल आपराधिक मुकदमों के लिए संदर्भ के रूप में उद्धृत किया जाएगा। अभियोजन पक्ष ने भी अपील की स्थिति में उच्च अदालत में इन वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर सजा को बरकरार रखने की तैयारी की है।

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