EC Appointment Dispute: चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को तुरंत निलंबित किया जाए—कपिल सिब्बल ने उठाई मांग, निष्पक्षता पर सवाल
राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता और संवैधानिक गरिमा का हवाला देते हुए चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को तत्काल निलंबित करने की मांग की है।
- Kapil Sibal on Election Commission: राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल का बड़ा बयान, चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के निलंबन की वकालत
- Election Commission News: चुनाव आयोग की स्वायत्तता पर फिर तकरार, कपिल सिब्बल ने की ज्ञानेश कुमार पर तत्काल कार्रवाई की मांग
- Sibal Demands EC Suspension: चुनाव प्रक्रिया की शुचिता का दिया हवाला, सिब्बल बोले- संवैधानिक संस्थाओं में जन-विश्वास जरूरी
नई दिल्ली। राज्यसभा सांसद और देश के वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) की कार्यप्रणाली और स्वायत्तता पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को तत्काल प्रभाव से निलंबित करने की मांग की है। राष्ट्रीय राजधानी में मीडिया से बातचीत और अपने सार्वजनिक बयानों के दौरान सिब्बल ने संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता का मुद्दा उठाया और आरोप लगाया कि चुनावी तंत्र में निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए सख्त प्रशासनिक कदम उठाना अनिवार्य हो गया है।
कपिल सिब्बल का यह बयान ऐसे समय में आया है जब विपक्षी दल लगातार चुनाव आयोग की संरचना, हालिया नियुक्ति प्रक्रिया और आदर्श आचार संहिता के अनुपालन को लेकर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग पर सवाल खड़े करते रहे हैं।
- संवैधानिक शुचिता और जन-विश्वास का संकट
कपिल सिब्बल ने अपनी मांग के समर्थन में तर्क दिया कि निर्वाचन आयोग किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ होता है। यदि आम जनता या राजनीतिक दलों के मन में इस संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता और तटस्थता को लेकर कोई भी संदेह उत्पन्न होता है, तो वह पूरी चुनावी प्रक्रिया की साख को प्रभावित करता है।
उन्होंने कहा कि चुनाव आयुक्तों की जिम्मेदारी केवल चुनाव संपन्न कराना नहीं है, बल्कि यह प्रदर्शित करना भी है कि सभी पक्षों के लिए 'लेवल प्लेइंग फील्ड' (समान अवसर) मौजूद है। सिब्बल के अनुसार, यदि किसी पदस्थ संवैधानिक पदाधिकारी पर पक्षपात या नियमों के लचीले क्रियान्वयन के आरोप लगते हैं, तो शुचिता बनाए रखने के लिए स्वतंत्र जांच और अंतरिम कार्रवाई आवश्यक हो जाती है।
- नियुक्ति प्रक्रिया पर पहले से जारी कानूनी बहस
ज्ञानेश कुमार की चुनाव आयुक्त के रूप में नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा पारित नए कानून—मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम—के तहत गठित तीन सदस्यीय समिति की सिफारिश पर हुई थी। इस चयन समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता शामिल होते हैं।
विपक्षी दलों और कई नागरिक संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट के उस पूर्व फैसले का हवाला देते हुए इस कानून का कड़ा विरोध किया था, जिसमें चयन समिति के भीतर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को भी शामिल रखने की व्यवस्था दी गई थी। विपक्ष का आरोप रहा है कि मुख्य न्यायाधीश को समिति से बाहर रखकर सरकार ने चयन प्रक्रिया में बहुमत का नियंत्रण अपने हाथ में रखा है, जिससे आयोग की पूर्ण स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है।
- विपक्ष के आरोप बनाम सरकार का स्टैंड
कपिल सिब्बल द्वारा ज्ञानेश कुमार के निलंबन की मांग उठाए जाने के बाद राजनीतिक गलियारों में बहस तेज हो गई है। कांग्रेस सहित विभिन्न विपक्षी दल लंबे समय से शिकायत करते रहे हैं कि सत्तापक्ष और विपक्ष के नेताओं द्वारा आचार संहिता के कथित उल्लंघनों पर आयोग का रुख एक समान नहीं रहता।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार और सत्तारूढ़ दल ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि चुनाव आयोग पूरी तरह से स्वायत्त और पारदर्शी संवैधानिक संस्था है। सरकार का तर्क रहा है कि आयुक्तों की नियुक्ति संसद द्वारा विधिवत पारित कानून के तहत की गई है और बिना किसी ठोस वैधानिक आधार के संवैधानिक पदाधिकारियों पर व्यक्तिगत हमले करना लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने की सोची-समझी रणनीति है।
- संवैधानिक पद से हटाने की वैधानिक प्रक्रिया
संवैधानिक जानकारों का मानना है कि किसी चुनाव आयुक्त को सीधे प्रशासनिक आदेश से निलंबित या पदमुक्त नहीं किया जा सकता। संविधान के अनुच्छेद 324 के प्रावधानों के अनुसार, चुनाव आयुक्तों को कार्यकाल की सुरक्षा प्राप्त है। नियमों के तहत किसी चुनाव आयुक्त को पद से केवल तभी हटाया जा सकता है जब मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) इस संबंध में राष्ट्रपति को अपनी औपचारिक सिफारिश भेजें। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समान महाभियोग (इंपीचमेंट) जैसी जटिल संसदीय प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। ऐसे में सिब्बल की यह मांग वैधानिक से अधिक राजनीतिक और नैतिक दबाव बनाने के रूप में देखी जा रही है।
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