British Debt 109 Years Old: अंग्रेजों से 109 साल पुराना कर्ज मांगने पहुंचा एमपी का परिवार, जानें ब्रिटेन से क्या मिला जवाब
मध्य प्रदेश के सेठ जुम्मा लाल के परिवार ने 109 साल पुराने कर्ज की वापसी के लिए ब्रिटेन सरकार से संपर्क किया है। परिवार का कहना है कि यह लड़ाई सम्मान की है।
- Seth Jumma Lal Loan To British: 'बात पैसों की नहीं सम्मान की है', 109 साल पुराने ब्रिटिश कर्ज पर क्या बोले सेठ जुम्मा लाल के वंशज?
- अंग्रेजों को दिया था ₹11 हजार का लोन, 109 साल बाद कर्ज वसूलने ब्रिटेन पहुंचा मध्य प्रदेश का परिवार; जानिए पूरा मामला
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मध्य प्रदेश के एक स्वतंत्रता सेनानी और भामाशाह कहे जाने वाले सेठ जुम्मा लाल के परिवार ने इतिहास के पन्नों से एक अनोखा और दुर्लभ मामला सामने लाया है। प्रथम विश्व युद्ध (1915-1917) के दौरान तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत को दिए गए 11 हजार रुपये के कर्ज की भरपाई के लिए परिवार ने ब्रिटिश सरकार से पत्राचार किया है। लगभग 109 वर्ष पुराने इस ऐतिहासिक वित्तीय लेनदेन के पुख्ता दस्तावेजी सबूत और रसीदें आज भी परिवार के पास सुरक्षित हैं। सेठ जुम्मा लाल के प्रपौत्रों और वंशजों का कहना है कि यह कदम किसी आर्थिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के सम्मान और देश के स्वाभिमान के लिए उठाया गया है। इस अनोखी मांग के सामने आने के बाद यह मामला देश और विदेश में चर्चा का केंद्र बन गया है।
मध्य प्रदेश के रहने वाले सेठ जुम्मा लाल के वंशजों ने ब्रिटेन की सरकार और राजपरिवार से 109 साल पहले ब्रिटिश भारत सरकार द्वारा लिए गए वित्तीय ऋण की अदायगी की मांग की है। प्रथम विश्व युद्ध के समय ब्रिटिश हुकूमत ने युद्ध संकट से निपटने के लिए भारतीय रईसों और स्वतंत्रता संग्राम के भामाशाहों से धन जुटाया था। उसी दौरान सेठ जुम्मा लाल ने तत्कालीन ब्रिटिश वायसराय के माध्यम से 11 हजार रुपये का ऋण सरकारी बॉन्ड और प्रॉमिसरी नोट्स के रूप में दिया था। अब उनका परिवार उन मूल दस्तावेजों को आधार बनाकर औपचारिक रूप से इस कर्ज के निपटारे और स्वीकृति की मांग कर रहा है।
इतिहास के संदर्भों के अनुसार, वर्ष 1915 से 1917 के बीच प्रथम विश्व युद्ध की विभीषिका के दौरान ब्रिटिश सरकार को भारी वित्तीय संकट का सामना करना पड़ा था। उस समय भारत में ब्रिटिश प्रशासन ने 'वॉर लोन' या युद्ध ऋण योजनाएं शुरू की थीं। मध्य प्रदेश के प्रमुख कारोबारी और दानवीर सेठ जुम्मा लाल ने भी इसमें योगदान देते हुए उस समय की एक बड़ी राशि, यानी 11,000 रुपये का ऋण दिया था। अंग्रेजों ने इस राशि के एवज में आधिकारिक मुहर और हस्ताक्षर के साथ कानूनी रसीदें जारी की थीं।
दशकों तक यह दस्तावेज परिवार के पास सुरक्षित रहे। देश की आजादी के बाद भी यह फाइलें पारिवारिक धरोहर के रूप में रखी रहीं। हाल के दिनों में परिवार के सदस्यों ने इन ऐतिहासिक साक्ष्यों को एकत्रित किया और कानूनी सलाहकारों की मदद से लंदन स्थित यूके ट्रेजरी (ब्रिटिश वित्त मंत्रालय) और संबंधित विदेश कार्यालयों को पत्र भेजा। परिवार ने पत्र में 109 साल पुराने इस दस्तावेज की प्रति संलग्न करते हुए सवाल उठाया कि क्या ब्रिटिश सरकार इस ऐतिहासिक देनदारी को स्वीकार करती है या नहीं।
109 साल पुराने कर्ज से जुड़े मुख्य बिंदु
प्रथम विश्व युद्ध (1915-1917) के दौरान सेठ जुम्मा लाल ने ब्रिटिश हुकूमत को ₹11,000 का 'वॉर लोन' दिया था।
उस समय यह राशि करोड़ों रुपये के बराबर मानी जाती थी और इसके लिए अंग्रेजों ने आधिकारिक रसीद दी थी।
सेठ जुम्मा लाल के प्रपौत्रों का कहना है कि वे ब्याज सहित पैसा मांगने के बजाय ऐतिहासिक न्याय और सम्मान चाहते हैं।
ब्रिटेन सरकार के विदेश और वित्त विभागों को औपचारिक दस्तावेज और रिमाइंडर भेजे गए हैं।
सेठ जुम्मा लाल के परिवार के सदस्यों ने मीडिया से बात करते हुए स्पष्ट किया है कि उनके लिए यह मुद्दा पैसों से ज्यादा स्वाभिमान और ऐतिहासिक न्याय का है। परिवार के प्रपौत्र ने कहा, "यह बात सिर्फ पैसों की नहीं है, बात सम्मान की है। हमारे पूर्वज ने उस दौर में अंग्रेजों को संकट से उबारने या नीतिगत समझौतों के तहत यह राशि दी थी। हम यह स्थापित करना चाहते हैं कि जब ब्रिटेन की सरकार आज भी औपनिवेशिक काल के कई नियमों का हवाला देती है, तो उन्हें भारतीय नागरिकों से लिए गए कर्ज का सम्मान भी करना चाहिए।" ब्रिटेन की सरकार की प्रतिक्रिया के बारे में पूछे जाने पर परिजनों ने बताया कि शुरुआती पत्राचार के बाद ब्रिटिश प्रशासन से यह उत्तर मिला है कि वे मामले की पुरालेख (ऐतिहासिक रिकॉर्ड) शाखा से पड़ताल कर रहे हैं। हालांकि, ब्रिटिश ट्रेजरी और औपनिवेशिक रिकॉर्ड विभाग ने इस प्रक्रिया को काफी जटिल बताया है, क्योंकि 1947 में भारत की आजादी और सत्ता हस्तांतरण के समय कई वित्तीय देनदारियों का बंटवारा भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ था। फिलहाल आधिकारिक स्तर पर ब्रिटेन सरकार ने इस दावे पर अंतिम रुख स्पष्ट नहीं किया है।
यह मामला सामने आने के बाद भारत और ब्रिटेन के औपनिवेशिक इतिहास पर एक नई बहस छिड़ गई है। इतिहासकार और कानूनी विशेषज्ञ इस बात की समीक्षा कर रहे हैं कि क्या 1947 के भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम (Indian Independence Act 1947) के तहत इस प्रकार के व्यक्तिगत वॉर बॉन्ड्स या निजी ऋणों की जिम्मेदारी तत्कालीन ब्रिटिश सरकार की बनती है या यह भारत सरकार के खाते में आती है। इसके साथ ही इस घटना ने भारतीय उद्योगपतियों और रईसों द्वारा औपनिवेशिक काल में दिए गए वित्तीय योगदान और उसके बाद हुए शोषण की कहानियों को फिर से सुर्खियों में ला दिया है। सेठ जुम्मा लाल का परिवार अब इस मामले को कानूनी और कूटनीतिक रूप से आगे बढ़ाने की योजना बना रहा है। परिजनों का कहना है कि वे भारतीय विदेश मंत्रालय के माध्यम से भी अपनी बात रखने का प्रयास करेंगे ताकि इस ऐतिहासिक दस्तावेज को राष्ट्रीय संग्रहालय या अभिलेखागार में उचित स्थान मिल सके। यदि ब्रिटिश सरकार की ओर से कोई स्पष्ट और न्यायसंगत जवाब नहीं मिलता है, तो परिवार अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता या कानूनी विकल्पों पर विचार करने के लिए विशेषज्ञों की सलाह ले रहा है।
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