हाई-प्रोफाइल बाबा सिद्दीकी हत्याकांड में मकोका कोर्ट की बड़ी कार्रवाई, मुख्य साजिशकर्ता अमोल गायकवाड़ की जमानत अर्जी खारिज
महाराष्ट्र के हाई-प्रोफाइल बाबा सिद्दीकी हत्याकांड मामले में कानूनी मोर्चे पर एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया
- शूटरों को पनाह देने और संगठित अपराध सिंडिकेट को बढ़ावा देने के ठोस सबूत, अदालत ने आरोपी को नहीं माना राहत का हकदार
- मुंबई की विशेष अदालत ने कानूनी दलीलों को किया सिरे से खारिज, आपराधिक साजिश में सहभागिता के आधार पर लिया कड़ा फैसला
महाराष्ट्र के हाई-प्रोफाइल बाबा सिद्दीकी हत्याकांड मामले में कानूनी मोर्चे पर एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। मुंबई की एक विशेष मकोका (महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गनाइज्ड क्राइम एक्ट) अदालत ने इस सनसनीखेज मामले के एक प्रमुख आरोपी अमोल गायकवाड़ की जमानत याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। अदालत ने मामले की गंभीरता और उपलब्ध साक्ष्यों का गहन अध्ययन करने के बाद यह स्पष्ट किया कि आरोपी किसी भी प्रकार की न्यायिक राहत या जमानत पाने का हकदार नहीं है। इस फैसले के बाद यह साफ हो गया है कि इस हत्याकांड के पीछे सक्रिय पूरे संगठित अपराध सिंडिकेट की कड़ियों को जोड़ने के लिए जांच एजेंसियां बेहद मजबूत स्थिति में हैं, जिससे आरोपियों को जेल की सलाखों के पीछे ही रहना होगा।
यह पूरा मामला राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के वरिष्ठ नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री बाबा सिद्दीकी की जघन्य हत्या से जुड़ा हुआ है। गौरतलब है कि पिछले दिनों मुंबई के बांद्रा ईस्ट इलाके में स्थित उनके बेटे जीशान सिद्दीकी के कार्यालय के बाहर तीन अज्ञात हमलावरों ने घात लगाकर बाबा सिद्दीकी पर अंधाधुंध गोलियां बरसाई थीं, जिसके बाद अस्पताल में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई थी। इस भीषण हत्याकांड ने पूरे देश की राजनीति और कानून व्यवस्था को हिलाकर रख दिया था। घटना के तुरंत बाद मुंबई पुलिस की अपराध शाखा ने इस मामले की तफ्तीश अपने हाथ में ली थी और जांच के दौरान लॉरेंस बिश्नोई गैंग से जुड़े होने के दावों के बीच इस संगठित अपराध के नेटवर्क का भंडाफोड़ किया था।
अमोल गायकवाड़ की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान विशेष मकोका अदालत के न्यायाधीश सत्यनारायण आर. नवंदर ने अभियोजन पक्ष और बचाव पक्ष दोनों की दलीलों को बेहद विस्तार से सुना। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री और साक्ष्य इस बात की ओर सीधा इशारा करते हैं कि अमोल गायकवाड़ इस जघन्य अपराध को अंजाम देने वाले शूटरों को सुरक्षित पनाह और आश्रय देने की गतिविधियों में सीधे तौर पर शामिल था। अदालत ने यह भी माना कि उसकी यह भूमिका इस पूरे हत्याकांड को अंजाम देने के लिए रची गई आपराधिक साजिश का एक अभिन्न हिस्सा थी, जिसके कारण उसे इस मामले से अलग करके नहीं देखा जा सकता। मकोका की विशेष अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी अमोल गायकवाड़ की भूमिका को सिंडिकेट के अन्य सह-आरोपियों की तुलना में किसी भी प्रकार से कम महत्वपूर्ण या छोटा नहीं आंका जा सकता है, क्योंकि उसने वारदात के बाद मुख्य अपराधियों को छुपाने का विशिष्ट कार्य किया था।
बचाव पक्ष के वकीलों ने अदालत के समक्ष तर्क दिया था कि अमोल गायकवाड़ पूरी तरह से निर्दोष है और उसे इस मामले में केवल संदेह के आधार पर झूठा फंसाया गया है। उनके द्वारा यह दलील भी दी गई कि जांच अधिकारी ने गिरफ्तारी से जुड़े कुछ अनिवार्य कानूनी प्रावधानों का पूरी तरह से पालन नहीं किया है, जिसके कारण यह गिरफ्तारी तकनीकी रूप से दोषपूर्ण मानी जानी चाहिए। इसके साथ ही बचाव पक्ष ने आरोपी के कथित कबूलनामे को भी दबाव और धमकियों के तहत दर्ज किया गया बताते हुए उसे अमान्य घोषित करने की मांग की थी, लेकिन अदालत ने इन सभी दावों को साक्ष्यों के सामने कमजोर पाते हुए अमान्य कर दिया।
इसके विपरीत, विशेष लोक अभियोजक और पीड़ित पक्ष के वकीलों ने जमानत याचिका का पुरजोर विरोध किया। अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि जांच के दौरान ऐसे पुख्ता डिजिटल और भौतिक साक्ष्य मिले हैं जो यह साबित करते हैं कि अमोल गायकवाड़ ने हत्या की इस पूरी योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए सिंडिकेट के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर काम किया था। उसका मुख्य काम शूटरों को वारदात को अंजाम देने के बाद छिपने के ठिकाने और रसद मुहैया कराना था, ताकि वे कानून के शिकंजे से बच सकें। अभियोजन पक्ष ने दलील दी कि मकोका जैसे कड़े कानून के तहत ऐसे गंभीर मामलों में जमानत देने से समाज में गलत संदेश जाएगा और जांच की दिशा प्रभावित हो सकती है।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने एक अन्य सह-आरोपी आकाशदीप राज सिंह को बॉम्बे हाई कोर्ट से मिली जमानत का हवाला देते हुए समानता (पैरिटी) के आधार पर अमोल गायकवाड़ के लिए भी राहत की मांग की थी। हालांकि, विशेष न्यायाधीश ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि दोनों आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोप पूरी तरह से अलग प्रकृति के हैं। हाई कोर्ट ने उस सह-आरोपी की अपराध में संलिप्तता को संदेहास्पद पाया था, जबकि अमोल गायकवाड़ के खिलाफ शूटरों को पनाह देने और साजिश रचने के सीधे और स्पष्ट सबूत रिकॉर्ड पर मौजूद हैं। इसलिए, कड़े मकोका कानून की धारा 21(4) के तहत जब तक अदालत संतुष्ट न हो कि आरोपी निर्दोष है, तब तक उसे जमानत नहीं दी जा सकती।
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