Saharanpur News: सहारनपुर मस्जिद ध्वस्तीकरण पर जमीयत उलेमा का बड़ा बयान, हाईकोर्ट जाने की तैयारी; कानूनी पहलुओं की जांच की मांग

कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित ऐतिहासिक मस्जिद को ढहाए जाने के बाद पैदा हुए हालात का जायजा लेने, मस्जिद कमेटी के सदस्यों

By INA News Desk
Sep 7, 2026 - 19:41
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Saharanpur News: सहारनपुर मस्जिद ध्वस्तीकरण पर जमीयत उलेमा का बड़ा बयान, हाईकोर्ट जाने की तैयारी; कानूनी पहलुओं की जांच की मांग

सहारनपुर: कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित ऐतिहासिक मस्जिद को ढहाए जाने के बाद पैदा हुए हालात का जायजा लेने, मस्जिद कमेटी के सदस्यों व खादिमों और शहर काजी जनाब नदीम अख्तर साहब से मुलाकात करने तथा मौजूद दस्तावेजों की जांच करने के लिए, जमीयत उलेमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना सैयद महमूद मदनी के निर्देश और प्रदेश अध्यक्ष मुफ्ती सैयद मुहम्मद अफ्फान मंसूरपुरी की हिदायत पर जमीयत उलेमा उत्तर प्रदेश का एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल प्रदेश महासचिव मौलाना अमीनुल हक़ अब्दुल्लाह कासमी के नेतृत्व में आज सहारनपुर पहुंचा।

प्रतिनिधिमंडल ने मस्जिद कमेटी, मुतवल्ली, स्थानीय उलेमाओं, बुद्धिजीवियों और मस्जिद व जमीन के मुस्लिम पक्ष से विस्तृत मुलाकात की और मामले के कानूनी व संवैधानिक पहलुओं का जायजा लेते हुए आगे की रणनीति पर बातचीत की।मस्जिद कमेटी के सदस्यों व खादिमों और शहर काजी जनाब नदीम अख्तर साहब से मुलाकात करने और मौजूद दस्तावेजों का जायजा लेने के बाद स्थानीय पत्रकारों से बातचीत करते हुए मौलाना अमीनुल हक़ अब्दुल्ला क़ासमी ने कहा कि कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद के मामले में प्रशासन की ओर से जिस जल्दबाजी के साथ ढहाने की कार्रवाई की गई है, उसने कई बुनियादी कानूनी सवाल खड़े कर दिए हैं।उन्होंने कहा कि इस मामले में सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने 16 जुलाई 2026 को ‘‘उत्तर प्रदेश पब्लिक प्रिमाइसेस एक्ट’’ के तहत मस्जिद को सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा करार देते हुए बेदखली का आदेश दिया था, जिसके खिलाफ मस्जिद कमेटी ने जिला जज की अदालत का रुख किया।

जिला अदालत ने भी मस्जिद पक्ष की अपील खारिज करते हुए सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखाय हालांकि मस्जिद पक्ष का कहना है कि इसके बाद भी उच्च न्यायालय (हाईकोर्ट) जाने के कानूनी रास्ते मौजूद थे और तुरंत ढहा देने की कार्रवाई ने इन कानूनी संभावनाओं को व्यावहारिक रूप से खत्म कर दिया।मौलाना अब्दुल्लाह क़ासमी ने कहा कि सबसे अहम सवाल यह है कि जब जमीन के मालिकाना हक, मस्जिद के पुराने होने, इसके ऐतिहासिक व नगर निगम रिकॉर्ड और वक्फ की हैसियत से जुड़े कई दस्तावेज खुद मुस्लिम पक्ष की ओर से अदालत के सामने पेश किए गएy थे, तो इन सभी पहलुओं की पूरी और निष्पक्ष जांच किए बिना इतनी जल्दबाजी में ढहाने की कार्रवाई क्यों की गई ? उन्होंने कहा कि मुस्लिम पक्ष का स्टैंड है कि संबंधित जमीन के पुराने राजस्व (रेवेन्यू) रिकॉर्ड में वाहिद खान और याकूब खान के नाम दर्ज हैं, जबकि मस्जिद के वक्फ में रजिस्ट्रेशन से जुड़े दस्तावेज भी पेश किए गए हैं। इन दावों और दस्तावेजों की पूरी कानूनी हैसियत का फैसला अदालतों में होना चाहिए, न कि केवल प्रशासनिक कार्रवाई के जरिए मामले को खत्म कर दिया जाए। मौलाना अब्दुल्लाह कासमी ने आगे कहा कि इस कार्रवाई के संबंध में 1991 के ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप (स्पेशल प्रोविजंस) एक्ट’ के तहत भी गंभीर कानूनी सवाल पैदा होते हैं।

इस कानून का बुनियादी मकसद यह है कि 15 अगस्त 1947 को किसी भी पूजा स्थल का जो धार्मिक स्वरूप था, उसे बरकरार रखा जाए और उसके धार्मिक स्वरूप में बदलाव को रोका जाए। मस्जिद पक्ष का स्पष्ट रुख है कि यह इबादतगाह 1947 से पहले भी मस्जिद की हैसियत से मौजूद थी और इसकी धार्मिक हैसियत के बारे में पुराने रिकॉर्ड और सबूत मौजूद हैं। ऐसे में एक स्थापित मस्जिद को ढहाने की कार्रवाई 1991 के कानून की मूल भावना और इसके सुरक्षात्मक उद्देश्य के खिलाफ नजर आती है। प्रशासन की ओर से अगर यह रुख अपनाया जाता है कि यह कानून इस मामले पर लागू नहीं होता, तो इस बुनियादी कानूनी सवाल का फैसला भी उच्च न्यायालय में होना चाहिए। जमीयत उलेमा इस पहलू को भी अपनी आगामी कानूनी कार्रवाई में पूरी ताकत के साथ उठाएगी और अदालत से अपील करेगी कि 1991 के कानून की मांगों और इसके बुनियादी मकसद को ध्यान में रखते हुए इस कार्रवाई की फिर से कानूनी जांच की जाए।

उन्होंने कहा कि हालांकि प्रशासन की ओर से इस कार्रवाई को अदालती आदेशों का पालन बताया जा रहा है, लेकिन यह भी एक अहम कानूनी सवाल है कि अदालत के फैसले में तुरंत ढहाने का स्पष्ट आदेश मौजूद था या सिर्फ बेदखली के पिछले आदेश को बरकरार रखा गया था। इस पहलू की भी उच्च न्यायालय में कानूनी जांच जरूरी है। मौलाना अब्दुल्लाह कासमी ने कहा कि किसी धार्मिक स्थल को ढहाना एक बहुत ही संवेदनशील मामला है, जिससे लोगों की धार्मिक भावनाएं और अहसास जुड़े होते हैं। ऐसे मामले में जिस जल्दबाजी के साथ कार्रवाई की गई, उससे जनता के अंदर भारी बेचैनी पैदा हुई है और यह स्थिति भविष्य में प्रदेश और देश की शांति व्यवस्था और आपसी सौहार्द के लिए भी चिंता का कारण बन सकती है। कानून लागू करने वाली एजेंसियों, जिला प्रशासन और सरकार की यह बुनियादी जिम्मेदारी है कि वे ऐसे संवेदनशील मामलों में असाधारण सावधानी, समझदारी और संयम का प्रदर्शन करें और देश को किसी भी संभावित अशांति, अराजकता और तनाव से सुरक्षित रखें। उन्होंने कहा कि जमीयत उलेमा की स्थापना ही देश में शांति व न्याय की स्थापना, हर नागरिक को उसके संवैधानिक व कानूनी अधिकार दिलाने और विशेष रूप से मुसलमानों के धार्मिक स्थलों, मस्जिदों, मदरसों और अन्य दीनी संस्थानों की सुरक्षा के लिए संघर्ष करने के उद्देश्य से हुई है।

जमीयत उलेमा अपने इसी बुनियादी मकसद और अपनी जिम्मेदारी को ध्यान में रखते हुए इस मामले में पूरी ताकत के साथ कानूनी संघर्ष करेगी। जिन जिम्मेदार लोगों या संस्थाओं की ओर से अगर कोई गैर-कानूनी कार्रवाई साबित होती है, तो उनके खिलाफ भी कानून के मुताबिक मुकदमा लड़ा जाएगा, और मस्जिद की कानूनी व शरिया सुरक्षा, उसकी बहाली और दोबारा निर्माण के लिए भी हर संभव कोशिश की जाएगी। मौलाना अब्दुल्लाह क़ासमी ने कहा कि हमारा मक़सद किसी टकराव या तनाव को बढ़ावा देना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि हर नागरिक और हर धार्मिक संस्था को कानून के मुताबिक पूरा न्याय और कानूनी सुरक्षा प्राप्त हो। उन्होंने कहा कि अगर मस्जिद कमेटी की ओर से मस्जिद के अंदर मौजूद सामान, धार्मिक वस्तुओं या अन्य संपत्तियों के नुकसान या गायब होने के जो आरोप सामने आए हैं, उनकी भी बाकायदा जांच होनी चाहिए और अगर किसी भी तरह की अनियमितता साबित होती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।

मौलाना अब्दुल्लाह क़ासमी ने कहा कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद इस मामले में खामोश नहीं बैठेगी और मस्जिद कमेटी को कानूनी मदद मुहैया कराते हुए जरूरत के मुताबिक मामले को हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक ले जाया जाएगा। प्रतिनिधिमंडल में जमीयत उलेमा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष मौलाना मुहम्मद आक़िल कासमी, प्रदेश उपाध्यक्ष मुफ्ती मुहम्मद बिनयामीन क़ासमी, प्रदेश सचिव कारी अब्दुल मुईद चैधरी, जमीयत सद्भावना मंच के प्रदेश संयोजक मौलाना मूसा कासमी, जमीयत उलेमा जिला सहारनपुर के अध्यक्ष मौलाना मुहम्मद गुलफाम मजाहिरी, जिला महासचिव मौलाना सरताज मजाहिरी, मौलाना फरीद अहमद मजाहिरी, मौलाना एहसानुल हक कासमी सहित अन्य प्रमुख उलेमा और जिम्मेदार लोग मौजूद थे।

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