Sanjay Raut on Political Remarks: 'कभी कॉकरोच बोलते हो, कभी दिमागी नक्सल...', संजय राउत का विरोधियों पर तीखा हमला

शिवसेना (UBT) सांसद संजय राउत ने विरोधियों द्वारा विपक्षी नेताओं के खिलाफ इस्तेमाल की जा रही अमर्यादित भाषा पर तीखा पलटवार किया है। पढ़ें पूरी खबर।

Aug 18, 2026 - 13:09
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Sanjay Raut on Political Remarks: 'कभी कॉकरोच बोलते हो, कभी दिमागी नक्सल...', संजय राउत का विरोधियों पर तीखा हमला
  • Sanjay Raut Statement: विपक्षी नेताओं पर अमर्यादित टिप्पणियों को लेकर भड़के संजय राउत, कहा- लोकतंत्र में ऐसी भाषा अस्वीकार्य
  • "कभी कॉकरोच बोलते हो, कभी दिमागी नक्सल...": संजय राउत ने राजनीतिक बयानों पर बोला तीखा हमला, जानें क्या कहा
  • Sanjay Raut Targets Opponents: विवादित बयानों को लेकर बरसे संजय राउत, अमर्यादित भाषा के इस्तेमाल पर उठाए कड़े सवाल

शिवसेना (यूबीटी) के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत ने विपक्षी दलों और नेताओं के खिलाफ सार्वजनिक विमर्श में की जा रही तीखी व अमर्यादित टिप्पणियों पर कड़ा एतराज जताया है। मुंबई में पत्रकारों से बातचीत करते हुए उन्होंने विरोधियों के बयानों पर सीधा पलटवार किया और कहा कि विपक्ष के नेताओं के लिए कभी 'कॉकरोच' तो कभी 'दिमागी नक्सल' जैसे अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो लोकतांत्रिक शिष्टाचार के खिलाफ है। उन्होंने राजनीतिक बहस के गिरते स्तर पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन गरिमा का हनन किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं हो सकता।

शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) गुट के सांसद संजय राउत ने विपक्षी नेताओं को निशाना बनाकर की जाने वाली व्यक्तिगत और अमर्यादित भाषा के बढ़ते चलन पर कड़ा प्रहार किया है। हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों और विपक्षी दलों के नेताओं के खिलाफ दिए गए आपत्तिजनक संबोधनों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में वैचारिक विरोध की जगह व्यक्तिगत लांछन और अपमानजनक उपमाओं ने ले ली है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से सवाल उठाया कि विरोधियों के लिए इस प्रकार के शब्दों का चयन आखिर किस प्रकार की राजनीतिक संस्कृति को दर्शाता है।

देश और राज्य की राजनीति में पक्ष और विपक्ष के बीच चल रही बयानबाजी के बीच संजय राउत ने मीडिया से चर्चा के दौरान विरोधियों के हमलों का सिलसिलेवार जवाब दिया। उन्होंने रेखांकित किया कि जब भी विपक्ष जनहित के मुद्दों या नीतियों पर सवाल उठाता है, तो तार्किक जवाब देने के बजाय अपमानजनक उपाधियां गढ़ी जाने लगती हैं। कभी नेताओं की तुलना कॉकरोच जैसे कीटों से की जाती है, तो कभी उन्हें 'दिमागी नक्सल' या अन्य भ्रामक शब्दों से संबोधित किया जाता है।

संजय राउत ने कहा कि राजनीतिक संवाद में आलोचना और जवाबदेही तय करने का अधिकार संविधान ने हर जनप्रतिनिधि और नागरिक को दिया है। जब सत्ता या प्रतिद्वंद्वी दल बुनियादी सवालों से बचने के लिए ऐसे शब्दों का सहारा लेते हैं, तो यह लोकतांत्रिक संस्थाओं और विमर्श की गरिमा को कमजोर करता है। उन्होंने साफ किया कि इस प्रकार के आक्रामक और अपमानजनक संबोधनों से न तो विपक्ष की आवाज दबाई जा सकती है और न ही जनता के बुनियादी मुद्दों को भटकाया जा सकता है।

संजय राउत के इस तीखे बयान के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। विपक्षी गठबंधन के कई नेताओं ने उनके रुख का समर्थन करते हुए कहा है कि राजनीतिक चर्चाओं में मर्यादा और शालीनता की सीमाएं टूट रही हैं। विपक्षी दलों का कहना है कि मुद्दों पर आधारित बहस के बजाय व्यक्तिगत चरित्र हनन की राजनीति को बढ़ावा दिया जा रहा है।

वहीं दूसरी ओर, सत्ता पक्ष के प्रवक्ताओं का तर्क है कि राजनीति में आक्रामकता दोनों तरफ से देखने को मिलती है और विपक्ष भी कई बार संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ बेहद तीखे शब्दों का प्रयोग करता है। उनका कहना है कि बयानों को संदर्भ से काटकर पेश करने के बजाय समग्र राजनीतिक आचरण पर विचार किया जाना चाहिए।

संजय राउत का यह बयान भारतीय राजनीति में भाषा के गिरते स्तर और ध्रुवीकरण की बहस को फिर से सामने ले आया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले कुछ समय में चुनावी और गैर-चुनावी दोनों दौरों में तीखे और आपत्तिजनक शब्दों का उपयोग सामान्य होता जा रहा है। इससे स्वस्थ बहस की गुंजाइश कम हो रही है और नेताओं के बीच व्यक्तिगत कटुता बढ़ रही है। इस प्रकार की बयानबाजी न केवल जनमानस में नकारात्मक संदेश देती है बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों और संसदीय परंपराओं के लिए भी चिंता का विषय बनती जा रही है।

आने वाले दिनों में राजनीतिक मंचों और प्रेस वार्ताओं के दौरान इस प्रकार की बयानबाजी पर टकराव और तेज होने की संभावना है। विपक्षी दल इस मुद्दे को सार्वजनिक मंचों पर उठाकर यह संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं कि उन्हें निशाना बनाने के लिए स्तरहीन भाषा का सहारा लिया जा रहा है। वहीं, राजनीतिक विश्लेषक उम्मीद जता रहे हैं कि सभी राजनीतिक दलों के शीर्ष नेतृत्व को अपने प्रवक्ताओं और नेताओं के लिए भाषा की गरिमा तय करने को लेकर आत्ममंथन करना चाहिए।

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