Srinagar Half Marathon - सीने से 9 महीने का बच्चा बांधकर 21 किमी दौड़ीं कुलसुम बानो, हौसले ने जीता दिल
श्रीनगर में आयोजित हाफ मैराथन में 34 वर्षीय कुलसुम बानो ने 9 महीने के बच्चे को सीने से बांधकर 21 किमी की दौड़ पूरी की। जानिए उनके इस फैसले के पीछे की प्रेरणादायक कहानी।
- Inspiring Story - मातृत्व और खेल का अनूठा तालमेल, बच्चे को गोद में लेकर श्रीनगर हाफ मैराथन पूरी की
- Kulsum Bano Marathon - 'मां होने का मतलब सपनों का अंत नहीं', कश्मीर की कुलसुम ने पेश की मिसाल
- Kashmir Women Athletes - श्रीनगर की सड़कों पर दिखा मां का जज्बा, 34 वर्षीय कुलसुम बानो की प्रेरक कहानी
मातृत्व और खेल के प्रति अटूट समर्पण का अनूठा उदाहरण पेश करते हुए कश्मीर की 34 वर्षीय धाविका कुलसुम बानो ने श्रीनगर में आयोजित हाफ मैराथन में इतिहास रच दिया। कुलसुम ने अपने महज 9 महीने के बच्चे को सुरक्षित रूप से सीने से बांधकर 21 किलोमीटर की कठिन दौड़ न केवल शुरू की, बल्कि उसे तय समय में सफलतापूर्वक पूरा भी किया। श्रीनगर की सड़कों पर दौड़ती इस मां के हौसले और दृढ़ संकल्प ने वहां मौजूद हजारों दर्शकों और साथी धावकों को चकित कर दिया।

- मैराथन में बच्चे के साथ दौड़ने का फैसला क्यों?
कुलसुम बानो लंबे समय से एथलेटिक्स और दौड़ने का अभ्यास करती रही हैं। बच्चे के जन्म के बाद अमूमन अधिकांश महिला एथलीटों के लिए खेल के मैदान में लौटना शारीरिक और पारिवारिक चुनौतियों से भरा होता है। कुलसुम के सामने भी यह दुविधा थी कि वे इतने छोटे बच्चे को अकेले छोड़कर इतनी लंबी दौड़ में कैसे हिस्सा लें। बच्चे को घर पर किसी अन्य के भरोसे छोड़ने के बजाय उन्होंने बेबी-कैरियर की मदद से उसे सुरक्षित तरीके से अपने साथ ले जाने का निर्णय लिया।
- तैयारी और सुरक्षा का रखा पूरा ख्याल
इतने छोटे बच्चे के साथ 21 किलोमीटर दौड़ना आसान नहीं था। इसके लिए कुलसुम ने पहले से विशेष सावधानी बरती और नियमित रूप से हल्के अभ्यास के दौरान बच्चे के संतुलन व सुरक्षा का परीक्षण किया। दौड़ के दौरान भी उन्होंने गति से अधिक बच्चे की सुरक्षा, सांस लेने के आराम और उसके तापमान का ध्यान रखा। पूरे रास्ते बच्चा अपनी मां के सीने से लगकर शांत रहा और कुलसुम ने बिना रुके धीरे-धीरे अपने लक्ष्य की ओर कदम बढ़ाए।
- महिलाओं के लिए प्रेरणा
दौड़ पूरी करने के बाद कुलसुम बानो ने यह संदेश दिया कि मातृत्व किसी भी महिला के व्यक्तिगत लक्ष्यों, करियर या सपनों में बाधा नहीं बनता। उन्होंने कहा कि अक्सर समाज यह मान लेता है कि बच्चे के जन्म के बाद महिलाएं शारीरिक रूप से कठिन गतिविधियों से दूर हो जाती हैं, लेकिन सही संतुलन, इच्छाशक्ति और परिवार के सहयोग से किसी भी चुनौती को पार किया जा सकता है। उनकी यह उपलब्धि घाटी और देश भर की महिलाओं के लिए एक मिसाल बन गई है।
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