Sugar Price Hike: क्यों महंगी हो रही है चीनी? जानिए अल नीनो और गन्ने की फसल को बर्बाद करने वाले Red Rot रोग का पूरा सच
Sugar Price Hike: देश में चीनी की कीमतों में तेजी के पीछे अल नीनो और गन्ने की फसल में फैला 'रेड रॉट' रोग मुख्य कारण हैं। जानिए इसका उत्पादन और बाजार पर क्या असर पड़ेगा।
- चीनी के दामों में उछाल: अल नीनो और रेड रॉट रोग से गन्ने के उत्पादन पर गहरा संकट, आम जनता की जेब पर असर
- चीनी क्यों हो रही है इतनी महंगी? समझिए अल नीनो और गन्ने का कैंसर कहे जाने वाले 'रेड रॉट' का पूरा गणित
- Sugar Price Rise: चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी का अंदेशा, अल नीनो के बाद गन्ने में फैला Red Rot रोग; उत्पादन घटने के संकेत
देश और दुनिया के कमोडिटी बाजारों में चीनी की कीमतों में लगातार तेजी का रुझान देखने को मिल रहा है। घरेलू खुदरा बाजार से लेकर थोक मंडियों तक चीनी के दाम बढ़ने के पीछे मुख्य रूप से दो बड़े कृषि संकट सामने आए हैं—पहला मौसमी चक्र को बिगाड़ने वाला अल नीनो प्रभाव और दूसरा गन्ने की खड़ी फसल को अंदर से खोखला करने वाला 'रेड रॉट' (Red Rot) फंगल रोग। प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक में बदलते मौसम और फसल रोगों के कारण कुल चीनी उत्पादन घटने की आशंका जताई जा रही है। इसका सीधा असर आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ रहा है, जिससे आने वाले त्योहारी सीजन में आम उपभोक्ताओं की रसोई के बजट और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग की लागत पर दबाव बढ़ना तय माना जा रहा है।
घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में चीनी की कीमतों में पिछले कुछ समय से लगातार मजबूती का रुख बना हुआ है। कृषि विशेषज्ञों और कमोडिटी विश्लेषकों के अनुसार, इस मूल्य वृद्धि के पीछे कोई आकस्मिक जमाखोरी नहीं, बल्कि उत्पादन स्तर पर आई गंभीर संरचनात्मक बाधाएं हैं। गन्ने के प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में मौसम के अनियमित पैटर्न यानी अल नीनो के कारण वर्षा के वितरण में असंतुलन देखा गया है। इसके साथ ही गन्ने के खेतों में 'रेड रॉट' यानी लाल सड़न रोग का तेजी से प्रसार हुआ है। इन दोनों कारकों के संयुक्त प्रभाव से गन्ने की प्रति हेक्टेयर पैदावार और मिलों में पेराई के दौरान निकलने वाले चीनी के रिकवरी प्रतिशत में भारी गिरावट की संभावना बन गई है, जिससे बाजार में आपूर्ति की कमी के संकेत मिल रहे हैं।
गन्ना उत्पादन में आई इस गिरावट को समझने के लिए सबसे पहले अल नीनो और रेड रॉट के दोहरे प्रभाव को देखना आवश्यक है। अल नीनो के कारण मॉनसून के दौरान कई गन्ना उत्पादक बेल्ट में सामान्य से कम बारिश या लंबे समय तक सूखा पड़ा, जिसके बाद अचानक हुई बेमौसम बारिश ने खेतों में जलजमाव की स्थिति पैदा कर दी। यह वातावरण 'कोलेटोट्राइकम फाल्केटम' (Colletotrichum falcatum) नामक फफूंद (Fungus) के पनपने के लिए पूरी तरह अनुकूल साबित हुआ, जो रेड रॉट रोग का मुख्य कारण है।
रेड रॉट को कृषि वैज्ञानिक 'गन्ने का कैंसर' भी कहते हैं। इस रोग से प्रभावित गन्ने का तना अंदर से पूरी तरह लाल हो जाता है और उसमें सफेद रंग के आड़े धब्बे पड़ जाते हैं। जब किसान गन्ने को बीच से चीरते हैं, तो उसमें से सिरके या शराब जैसी तीखी बदबू आती है। यह फफूंद गन्ने के संवहनी ऊतकों (Vascular Tissues) को बंद कर देती है, जिससे पौधे को पोषक तत्व और पानी मिलना बंद हो जाता है। धीरे-धीरे गन्ने की पत्तियां ऊपर से सूखकर पीली पड़ने लगती हैं और पूरा पौधा सूख जाता है। सबसे गंभीर बात यह है कि इस रोग से प्रभावित गन्ने में मौजूद सुक्रोज (मिठास) सड़कर ग्लूकोज और अल्कोहल में बदलने लगता है, जिससे चीनी मिलों को ऐसे गन्ने से चीनी निकालने में भारी नुकसान होता है। उत्तर प्रदेश की सबसे लोकप्रिय किस्म 'को-0238' (Co 0238) पिछले कुछ वर्षों में इस रोग के प्रति अत्यधिक संवेदनशील पाई गई है, जिसके चलते बड़े पैमाने पर रकबा प्रभावित हुआ है।
चीनी उद्योग से जुड़े मिल मालिकों और इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स के प्रतिनिधियों का कहना है कि उत्पादन में कमी आने से मिलों की पेराई लागत बढ़ रही है। मिलर्स का तर्क है कि गन्ने से चीनी का रिकवरी रेट घटने से प्रति क्विंटल चीनी उत्पादन का खर्च बढ़ गया है, जिसे बाजार में समायोजित करना अनिवार्य हो गया है। दूसरी ओर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और गन्ना अनुसंधान संस्थानों के वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी है कि वे रेड रॉट प्रभावित खेतों में तुरंत फसल चक्र बदलें और पुरानी संवेदनशील किस्मों के स्थान पर नई रोग प्रतिरोधी किस्मों (जैसे Co 0118, Co 15023) की बुआई करें। किसान संगठनों ने सरकार से मांग की है कि फसल नुकसान की भरपाई के लिए मुआवजा दिया जाए और किसानों को स्वस्थ बीज उपलब्ध कराने के लिए विशेष सहायता योजना चलाई जाए।
कृषि वैज्ञानिक वर्तमान में रेड रॉट प्रतिरोधी बीजों के तेजी से वितरण और जैव-कवकनाशी उपचारों के प्रयोग पर जोर दे रहे हैं। केंद्र और राज्य सरकारों के कृषि विभाग प्रभावित इलाकों में सघन निगरानी अभियान चला रहे हैं ताकि बीमारी को नए क्षेत्रों में फैलने से रोका जा सके। आने वाले महीनों में नई फसल की पेराई शुरू होने के साथ ही वास्तविक उत्पादन के आधिकारिक आंकड़े सामने आएंगे। सरकार स्थिति को संतुलित रखने के लिए चीनी के स्टॉक नियंत्रण नियमों, निर्यात नीतियों और घरेलू आपूर्ति को बनाए रखने के लिए बाजार हस्तक्षेप जैसे कदमों पर विचार कर सकती है। चीनी के दामों में इस संभावित उछाल का असर बहुआयामी दिखाई दे रहा है। खुदरा स्तर पर आम परिवारों के मासिक राशन बजट पर सीधा असर पड़ रहा है। इसके साथ ही एफएमसीजी (FMCG) सेक्टर, कन्फेक्शनरी उद्योग, शीतल पेय (Soft Drinks), बेकरी और मिठाई निर्माताओं की इनपुट लागत में बढ़ोतरी होना तय है, जिसका अंतिम बोझ अंततः ग्राहकों की जेब पर ही पड़ेगा। इसके अलावा सरकार की 'एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम' (EBP) पर भी इसका आंशिक प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि चीनी की घरेलू उपलब्धता और कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए सरकार को गन्ने के रस या बी-हैवी शीरे से एथेनॉल बनाने के कोटे की समीक्षा करनी पड़ सकती है।
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