Supreme Court: 'मतदान का अधिकार छीनना शरीर से आत्मा निकालने जैसा', जस्टिस उज्जल भुइयां की दो टूक
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने एक व्याख्यान में दो टूक कहा कि किसी भी भारतीय नागरिक से वोट देने का अधिकार नहीं छीना जा सकता। इसे उन्होंने 'शरीर से आत्मा निकालने' के समान बताया।
- वोटिंग अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस भुइयां का बड़ा बयान: किसी भी नागरिक से कोई नहीं छीन सकता वोट का हक
- मताधिकार पर बोले जस्टिस उज्जल भुइयां: वोटर लिस्ट और नागरिक अधिकारों से वंचित करना लोकतंत्र की आत्मा पर आघात
- SC Justice Ujjal Bhuyan Statement: मतदाता पहचान और वोटिंग अधिकार पर टिप्पणी, बताया संवैधानिक लोकतंत्र का मूल आधार
नई दिल्ली। भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां ने लोकतांत्रिक प्रणाली और नागरिकों के बुनियादी अधिकारों पर बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी टिप्पणी की है। एक सार्वजनिक संगोष्ठी में नागरिकता और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े विवादों के संदर्भ में बोलते हुए जस्टिस भुइयां ने स्पष्ट किया कि किसी भी भारतीय नागरिक से उसके मतदान का अधिकार किसी भी परिस्थिति में छीना नहीं जा सकता। उन्होंने इस अधिकार की तुलना मानव अस्तित्व से करते हुए कहा कि किसी योग्य नागरिक को वोट देने के हक से वंचित करना 'शरीर से आत्मा को अलग कर देने' जैसा गंभीर कदम है।
न्यायमूर्ति भुइयां का यह वक्तव्य ऐसे समय में आया है जब देश के विभिन्न हिस्सों में नागरिकता सत्यापन, मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण और संबंधित प्रशासनिक प्रक्रियाओं को लेकर अक्सर विधिक एवं सार्वजनिक बहसें देखने को मिलती हैं। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि एक जीवंत लोकतंत्र की पहचान इस बात से तय होती है कि उसका अंतिम नागरिक भी बिना किसी संशय या प्रशासनिक बाधा के अपने जनप्रतिनिधि को चुनने की स्वतंत्रता रखता है।
- संवैधानिक लोकतंत्र का प्राणतत्व है मताधिकार
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने अपने संबोधन में भारतीय संविधान की प्रस्तावना और लोकतांत्रिक मूल्यों का उल्लेख किया। उन्होंने रेखांकित किया कि लोकतंत्र केवल शासन चलाने की एक व्यवस्था भर नहीं है, बल्कि यह नागरिक की गरिमा और उसकी सक्रिय भागीदारी का प्रतीक है। जब एक नागरिक मतदान केंद्र पर जाकर अपना मत दर्ज करता है, तो वह राज्य और संविधान के साथ अपने प्रत्यक्ष अनुबंध की पुष्टि करता है।
जस्टिस भुइयां ने कहा कि मताधिकार के बिना एक नागरिक की स्थिति अधिकार-विहीन व्यक्ति जैसी हो जाती है। यदि किसी वैध नागरिक को तकनीकी कारणों, प्रशासनिक प्रक्रिया की जटिलताओं या किसी अन्य आधार पर मतदान सूची से बाहर कर दिया जाता है, तो यह केवल एक अधिकार का हनन नहीं है, बल्कि यह उसके नागरिक वजूद पर सीधा प्रहार है। इसी स्थिति को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने 'शरीर से आत्मा निकालने' का सशक्त रूपक प्रयोग किया।
- प्रशासनिक प्रक्रियाओं में सतर्कता और पारदर्शिता की दरकार
अपने व्याख्यान में जस्टिस भुइयां ने मतदाता सूचियों के शुद्धिकरण या नागरिकता व निवास सत्यापन से जुड़ी प्रक्रियाओं के संदर्भ में सावधानी बरतने का आह्वान किया। न्यायिक दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि राज्य और निर्वाचन प्राधिकरणों की यह संवैधानिक जिम्मेदारी है कि कोई भी पात्र व्यक्ति छूटे नहीं।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि प्रशासनिक त्रुटि या मनमाने फैसलों के चलते वास्तविक भारतीय नागरिकों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने की गुंजाइश शून्य होनी चाहिए। चुनाव आयोग और मैदानी अधिकारियों को यह समझना होगा कि उनके हाथ में जो दायित्व है, वह किसी व्यक्ति के सबसे पवित्र लोकतांत्रिक अधिकार को निर्धारित करता है। इसलिए किसी भी प्रकार की जांच या सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी, कानून-सम्मत और मानवीय दृष्टिकोण पर आधारित होनी चाहिए।
- संवैधानिक संरक्षण
भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर मतदान के अधिकार की महत्ता को प्रतिपादित किया है। हालांकि तकनीकी रूप से भारत में मतदान का अधिकार एक वैधानिक (Statutory) अधिकार है जो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of the People Act, 1951) और संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत संचालित होता है, लेकिन विभिन्न फैसलों में शीर्ष अदालत ने इसे 'संविधान के बुनियादी ढांचे' (Basic Structure) और मौलिक अधिकारों की अभिव्यक्ति से अभिन्न माना है।
जस्टिस भुइयां की यह टिप्पणी उसी समृद्ध न्यायिक परंपरा को आगे बढ़ाती है, जिसमें नागरिकों के मताधिकार को किसी भी शासकीय लापरवाही से सुरक्षित रखने की वकालत की गई है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि अदालतों का प्राथमिक दायित्व नागरिकों के इन मूलभूत अधिकारों के प्रहरी (Sentinel on the qui vive) के रूप में कार्य करना है, ताकि कार्यपालिका की किसी भी चूक से आम जनता का लोकतांत्रिक हक सुरक्षित रहे।
न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां के इस दो टूक संदेश का विधि जगत और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने स्वागत किया है। कानूनी जानकारों का कहना है कि जब शीर्ष अदालत के वर्तमान न्यायाधीश इस तरह के संवेदनशील मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखते हैं, तो इससे प्रशासनिक अधिकारियों को स्पष्ट संदेश जाता है कि प्रक्रियागत सख्ती के नाम पर मूल अधिकारों से समझौता नहीं किया जा सकता।
यह संबोधन स्पष्ट करता है कि चुनावी सुधारों और मतदाता सूचियों के अद्यतन की प्रक्रिया का मूल उद्देश्य मताधिकार का विस्तार करना होना चाहिए, न कि किसी पात्र नागरिक को हाशिए पर धकेलना।
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