UP Politics News: भूपेंद्र चौधरी से लेकर मोहसिन रजा तक सपा पर हमलावर, पीडीए फॉर्मूले और चुनावी रणनीति पर उठाए सवाल
सपा प्रमुख अखिलेश यादव के पीडीए फॉर्मूले और हालिया बयानों पर योगी सरकार के मंत्रियों ने पलटवार किया है। रैली रद्द होने से लेकर प्रशासनिक संस्थाओं पर सवाल उठाने तक भाजपा ने कड़ा रुख अपनाया।
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लखनऊ। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा उठाए जा रहे राजनीतिक मुद्दों, उनके पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले और हाल ही में प्रस्तावित कार्यक्रमों के रद्द होने को लेकर उत्तर प्रदेश की सियासत में जुबानी जंग तेज हो गई है। योगी आदित्यनाथ सरकार के कई मंत्रियों और भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेताओं ने अखिलेश यादव पर सीधा राजनीतिक प्रहार करते हुए आरोप लगाया है कि जब भी सपा को चुनावी पराजय का सामना करना पड़ता है, वह संवैधानिक संस्थाओं, पुलिस प्रशासन और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) पर सवाल उठाने लगती है। वहीं, सपा की ओर से प्रशासन द्वारा अनुमति न दिए जाने के आरोपों को भी मंत्रियों ने पूरी तरह बेबुनियाद करार दिया है।
संविधान और संस्थाओं के प्रति आस्था पर सवाल
उत्तर प्रदेश भाजपा के प्रमुख नेताओं और मंत्रियों ने सपा की राजनीतिक कार्यशैली को नकारात्मक करार दिया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और प्रदेश सरकार के मंत्री भूपेंद्र चौधरी ने अखिलेश यादव के आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि समाजवादी पार्टी की निष्ठा देश के लोकतांत्रिक ढांचे और संविधान में नहीं बची है। उन्होंने आरोप लगाया कि सपा का मुख्य उद्देश्य केवल नकारात्मक एजेंडे को हवा देना और विकास कार्यों से जनता का ध्यान भटकाना है।
भूपेंद्र चौधरी ने कहा कि उत्तर प्रदेश की जनता पूर्ववर्ती सपा शासनकाल के दौरान देखी गई कानून-व्यवस्था की स्थिति, अराजकता और भाई-भतीजावाद को भूली नहीं है। जब चुनाव में जनादेश विपरीत आता है, तो पार्टी आत्ममंथन करने के बजाय प्रशासनिक मशीनरी और संवैधानिक संस्थाओं की साख पर आक्षेप मढ़ना शुरू कर देती है। जब वे जीतते हैं, तब इन व्यवस्थाओं में उन्हें कोई खोट नजर नहीं आता।
पीडीए की परिभाषा पर सियासी तकरार
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा लगातार आगे बढ़ाए जा रहे पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के समीकरण पर भी सत्ता पक्ष ने तीखा रुख अपनाया है। मंत्री हंसराज विश्वकर्मा ने इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वर्तमान सरकार के कार्यकाल में विकास के साथ-साथ राज्य की सांस्कृतिक विरासत और सभी वर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा रही है। उन्होंने दावा किया कि वास्तविक पीडीए किसी नारे का मोहताज नहीं है, बल्कि केंद्र और राज्य सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं में सभी वंचित और पिछड़े वर्गों को बिना किसी भेदभाव के जो प्रतिनिधित्व और लाभ मिल रहा है, वही असली सामाजिक न्याय है।
इसी क्रम में उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ भाजपा नेता मोहसिन रजा ने कहा कि सपा नेतृत्व जमीनी हकीकत से दूर होकर हताशा में बयानबाजी कर रहा है। उन्होंने कहा कि योगी सरकार ने अपराध और अपराधियों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाकर प्रदेश के हर तबके में सुरक्षा का भाव पैदा किया है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि आज सपा के भीतर ही असमंजस की स्थिति है कि क्या यह पार्टी का अंतिम चुनाव साबित होने जा रहा है या पीडीए के नाम पर कोई नया सियासी मंच खड़ा करने की तैयारी है।
'पर्ची-खर्ची' के खात्मे से बढ़ी बेचैनी: दिनेश प्रताप सिंह
राज्य सरकार के मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता दिनेश प्रताप सिंह ने भी अखिलेश यादव पर हमला बोला। उन्होंने कहा कि प्रदेश में जब से सरकारी नौकरियों और योजनाओं में बिचौलियों, 'पर्ची' और 'खर्ची' की संस्कृति खत्म हुई है, तब से विपक्षी दलों के समीकरण बिगड़ चुके हैं। पारदर्शी चयन प्रक्रियाओं और सीधे लाभार्थियों के खातों में मिलने वाली सुविधाओं ने पुरानी राजनीतिक कार्यप्रणाली को ध्वस्त कर दिया है।
दिनेश प्रताप सिंह ने आगे आरोप लगाया कि आज समाज के विभिन्न वर्गों की बात करने वाली सपा अपने सम्मेलनों और प्रेस वार्ताओं में शाक्य, कुशवाहा और चौरसिया जैसे मेहनतकश समाजों के वास्तविक हितों की अनदेखी करती रही है। उन्होंने कहा कि युवाओं और नई पीढ़ी की बात करने वाले पूर्व मुख्यमंत्री के कार्यकाल में कानून व्यवस्था की स्थिति क्या थी, यह प्रदेश का हर नागरिक जानता है। उस समय कानून की जगह रसूखदार तत्वों का दबदबा चलता था, जिसे मौजूदा सरकार ने कानून के दायरे में लाकर समाप्त किया है। उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाले समय में भी प्रदेश की जनता पारदर्शी सुशासन और बुनियादी विकास के पक्ष में ही अपना समर्थन जारी रखेगी।
रैली की अनुमति न मिलने के दावों पर मंत्रियों का जवाब
हाल ही में समाजवादी पार्टी की एक प्रस्तावित जनसभा और कार्यक्रम के रद्द होने के बाद लगाए गए आरोपों पर भी सरकार के मंत्रियों ने विस्तृत जवाब दिया है। सपा नेतृत्व का आरोप था कि शासन और प्रशासन के असहयोग तथा अनुमति न मिलने के कारण कार्यक्रम को स्थगित करना पड़ा।
इस पर पलटवार करते हुए परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह ने कहा कि यात्रा या कार्यक्रम रद्द होने के पीछे प्रशासनिक बाधा का तर्क पूरी तरह निराधार है। उन्होंने कहा कि यदि इरादा पक्का हो, तो आवागमन के लिए आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध है। उन्होंने उल्लेख किया कि संबंधित क्षेत्र के निकट जेवर एयरपोर्ट जैसी सुविधाएं विकसित हो रही हैं और राज्य में छह लेन के आधुनिक एक्सप्रेसवे व हाईवे का नेटवर्क मौजूद है, जिससे कहीं भी सुगमता से पहुंचा जा सकता है। ऐसे में यात्रा न करने के लिए केवल बहाने तलाशे जा रहे हैं।
वहीं, राज्य सरकार के मंत्री अनिल कुमार ने कहा कि विपक्ष की यह पुरानी आदत बन चुकी है कि पहले कार्यक्रमों की घोषणा की जाए और फिर आंतरिक तैयारियों की कमी को छिपाने के लिए प्रशासन के सिर पर ठीकरा फोड़ दिया जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि अनुमति से जुड़ी प्रक्रियाएं स्थानीय स्तर पर नियमों के तहत तय होती हैं और इसमें किसी तरह का राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं किया जाता।
कैबिनेट मंत्री कपिल देव अग्रवाल ने भी प्रशासनिक प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए कहा कि किसी भी राजनीतिक या सार्वजनिक सभा के आयोजन की अनुमति देना जिला प्रशासन और पुलिस के अधिकार क्षेत्र में आता है। प्रशासन सुरक्षा, स्थानीय यातायात, कानून-व्यवस्था और तय प्रोटोकॉल की समीक्षा करने के बाद ही कोई निर्णय लेता है। प्रदेश की भाजपा सरकार किसी भी दल को लोकतांत्रिक तरीके से अपने विचार रखने या सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित करने से नहीं रोकती। यदि आयोजक तय शर्तों और प्रक्रियाओं को समय पर पूरा नहीं कर पाते हैं, तो इसका दोष सरकार पर मढ़ना अनुचित है।
बढ़ती सियासी सरगर्मी और आगामी रणनीति
जैसे-जैसे राज्य में विभिन्न संगठनात्मक गतिविधियां और आगामी चुनावों की तैयारियां गति पकड़ रही हैं, समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के बीच बयानबाजी का दायरा लगातार चौड़ा होता जा रहा है। एक तरफ जहां अखिलेश यादव पीडीए के जरिए पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं को लामबंद करने के लिए रैलियों, बयानों और सोशल मीडिया अभियानों का सहारा ले रहे हैं, वहीं भाजपा उनके कार्यकाल की कमियों, विकास कार्यों की रफ्तार और पारदर्शी शासन व्यवस्था को रेखांकित कर जनता के बीच जा रही है।
आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि प्रशासनिक स्वीकृतियों और रैलियों के विवाद के बीच विपक्ष अपनी जमीनी रणनीति को किस तरह पुनर्गठित करता है, जबकि सत्ता पक्ष इन तमाम मुद्दों पर आक्रामक रुख बनाए रखने की तैयारी में नजर आ रहा है।
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