Lucknow: यूपी राजनीति में नई हलचल: रोहिणी की एंट्री से बदलेगा दलित समीकरण? 2027 से पहले सियासी तापमान तेज।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले हलचल तेज होती दिख रही है। इस बार चर्चा के केंद्र में हैं रोहिणी घावरी
Reported by - Vijay laxmi singh
उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले हलचल तेज होती दिख रही है। इस बार चर्चा के केंद्र में हैं रोहिणी घावरी, जिन्होंने समाजवादी खेमे के साथ सक्रिय राजनीति में उतरने का संकेत देकर नए समीकरणों को जन्म दे दिया है। उनका यह कदम सीधे तौर पर चंद्रशेखर आजाद की राजनीतिक जमीन को चुनौती देने वाला माना जा रहा है।
सपा के साथ नई पारी, अखिलेश से बातचीत के बाद फैसला
सूत्रों के मुताबिक, रोहिणी ने हाल ही में अखिलेश यादव से बातचीत के बाद समाजवादी पार्टी के साथ जुड़कर काम करने का मन बनाया है। बातचीत के दौरान संभावित गठबंधन को लेकर भी चर्चा हुई, लेकिन सपा नेतृत्व की स्पष्ट लाइन के बाद रोहिणी ने अपना रुख तय कर लिया।
सोशल मीडिया पर भी उन्होंने सक्रियता दिखाते हुए संकेत दिया कि वे जल्द ही उत्तर प्रदेश में राजनीतिक अभियान शुरू करेंगी। उनके संदेश में “नई ऊर्जा” और “जमीनी स्तर पर जुड़ाव” पर जोर साफ दिखाई देता है।
200 सभाओं का ब्लूप्रिंट, नॉन-जाटव दलितों पर फोकस
रोहिणी जून में भारत लौटने के बाद पूरे प्रदेश में लगभग 200 सभाएं करने की तैयारी में हैं। उनकी रणनीति का मुख्य केंद्र नॉन-जाटव दलित समुदाय—खासकर पासी और वाल्मीकि समाज—को संगठित करना है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यूपी की दलित राजनीति लंबे समय से एक खास धड़े के इर्द-गिर्द केंद्रित रही है, जबकि अन्य उपजातियों में प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी को लेकर असंतोष बना रहा है। रोहिणी इसी असंतोष को राजनीतिक आधार में बदलने की कोशिश में हैं।
चंद्रशेखर पर सीधा हमला, सियासी टकराव तय
रोहिणी ने खुलकर चंद्रशेखर आजाद की राजनीति पर सवाल उठाए हैं। उनके बयानों से साफ है कि आने वाले समय में दोनों के बीच सीधा राजनीतिक टकराव देखने को मिल सकता है।
वे दलित वोटरों के बीच जाकर अपनी बात रखने और मौजूदा नेतृत्व पर सवाल खड़े करने की रणनीति पर काम कर रही हैं, जिससे जमीनी स्तर पर ध्रुवीकरण बढ़ने की संभावना है।
इंटरनेशनल नेटवर्क से टीम तैयार, यूपी बनेगा केंद्र
विदेश में रहकर पेशेवर जीवन जी रहीं रोहिणी घावरी फिलहाल यूरोप में अपने सहयोगियों के साथ रणनीतिक बैठकें कर रही हैं। जल्द ही वे एक संगठित टीम के साथ यूपी में सक्रिय होंगी।
सूत्र बताते हैं कि वे अपने एनजीओ नेटवर्क के जरिए भी सामाजिक आधार मजबूत करने की कोशिश करेंगी, जिससे राजनीतिक पकड़ को मजबूती मिल सके।
क्या बदल जाएगा दलित वोट बैंक का गणित?
विशेषज्ञों के अनुसार, अगर रोहिणी अपनी रणनीति में सफल होती हैं तो नॉन-जाटव दलित वोट बैंक में नया ध्रुवीकरण संभव है। इसका असर न केवल चंद्रशेखर आजाद बल्कि प्रदेश की प्रमुख पार्टियों—सपा और भाजपा—दोनों के समीकरणों पर पड़ सकता है। 2027 के चुनाव से पहले यह नई एंट्री दलित राजनीति को एक नया मोड़ दे सकती है, जहां पहचान, प्रतिनिधित्व और नेतृत्व—तीनों मुद्दे फिर से केंद्र में आ जाएंगे।
Also Read-Special Article: बंगाल में आक्रामक हुआ चुनाव प्रचार, जारी हुआ भाजपा संकल्प पत्र।
What's Your Reaction?









