UP Politics: लखनऊ में पोस्टर वॉर से गरमाई सियासत, अतीक-आजम और मुख्तार के सहारे अखिलेश यादव पर तीखा हमला
लखनऊ में लगे एक राजनीतिक पोस्टर ने यूपी की सियासत में हलचल मचा दी है। अतीक अहमद, आजम खान और मुख्तार अंसारी की तस्वीरों के जरिए सपा प्रमुख अखिलेश यादव पर सीधा निशाना साधा गया है।
- UP Politics: लखनऊ में पोस्टर वॉर से गरमाई सियासत, अतीक-आजम और मुख्तार के सहारे अखिलेश यादव पर तीखा हमला
- यही चलाते थे सरकार': लखनऊ की सड़कों पर लगे विवादित पोस्टर, सपा प्रमुख अखिलेश यादव को घेरा
- Lucknow Poster War: 'माफिया के अखिलेश' वाले होर्डिंग से हड़कंप, सपा और भाजपा के बीच जुबानी जंग तेज
- यूपी में नया पोस्टर विवाद: अतीक, आजम और मुख्तार की तस्वीरों से अखिलेश यादव पर निशाना, निवेदक का नाम गायब
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की सड़कों पर एक बार फिर 'पोस्टर वॉर' के जरिए सियासी पारा चढ़ गया है। शहर के प्रमुख चौराहे पर लगे एक तीखे राजनीतिक पोस्टर ने राज्य के राजनीतिक गलियारों में भारी हलचल पैदा कर दी है। इस पोस्टर में पूर्व सांसद दिवंगत अतीक अहमद, सपा के वरिष्ठ नेता आजम खान और दिवंगत मुख्तार अंसारी की बड़ी तस्वीरों को प्रदर्शित करते हुए समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर सीधा हमला बोला गया है।
होर्डिंग पर बड़े अक्षरों में लिखा गया है- "आजम, अतीक और मुख्तार, यही चलाते थे सरकार"। इसके ठीक नीचे एक और पंक्ति लिखी गई है- "अखिलेश के माफिया, माफिया के अखिलेश"। पृष्ठभूमि में अखिलेश यादव की धुंधली तस्वीर के साथ यह संदेश दर्शाने की कोशिश की गई है कि समाजवादी पार्टी के शासनकाल में कानून-व्यवस्था पर इन चेहरों का प्रभाव था। हालांकि, इस विवादित पोस्टर को किसने लगवाया और इसके पीछे किस संगठन या राजनीतिक दल का हाथ है, इसे लेकर पोस्टर पर कोई आधिकारिक नाम, मुद्रक या निवेदक का उल्लेख नहीं किया गया है।
- कानून-व्यवस्था और पुराने दौर को लेकर शुरू हुई तीखी बहस
उत्तर प्रदेश में उपचुनावों और आगामी राजनीतिक रणनीतियों की सुगबुगाहट के बीच लगे इस पोस्टर ने दोनों प्रमुख प्रतिद्वंद्वी दलों के बीच तनातनी बढ़ा दी है। राज्य में सत्ता पक्ष अक्सर समाजवादी पार्टी के कार्यकाल को 'माफिया राज' और 'तुष्टिकरण' से जोड़कर घेरता रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने भाषणों में पूर्ववर्ती सरकारों के दौरान कानून-व्यवस्था की स्थिति और संगठित अपराध के नेटवर्क पर लगातार सवाल उठाते रहे हैं।
इस पोस्टर के जरिए एक बार फिर उसी नैरेटिव को धार देने का प्रयास किया गया है। अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी, जो कभी पूर्वांचल और प्रयागराज बेल्ट में बड़े आपराधिक व राजनीतिक प्रभाव वाले चेहरे माने जाते थे, उनकी तस्वीरों को आजम खान के साथ रखकर यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि सपा के शीर्ष नेतृत्व की राजनीतिक धुरी इन्हीं नामों के इर्द-गिर्द घूमती थी।
- समाजवादी पार्टी की कड़ी प्रतिक्रिया: ध्यान भटकाने की साजिश
पोस्टर सामने आने के बाद समाजवादी पार्टी के खेमे में तीखी नाराजगी देखी जा रही है। पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह सत्ता पक्ष की ओर से जनता का ध्यान बुनियादी समस्याओं से भटकाने का एक सुनियोजित प्रयास है।
सपा प्रवक्ताओं का आरोप है कि जब भी प्रदेश में बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की समस्याएं, पेपर लीक या पुलिस व्यवस्था पर सवाल उठते हैं, तो इस प्रकार के बेनामी होर्डिंग्स और भड़काऊ पोस्टर लगवाकर मुख्य मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश की जाती है। पार्टी का कहना है कि प्रदेश की जनता मौजूदा शासन की विफलताएं देख रही है और इस तरह की नकारात्मक राजनीति से समाजवादी पार्टी के पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) अभियान पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है। सपा कार्यकर्ताओं ने नगर निगम और पुलिस प्रशासन से बिना अनुमति लगाए गए ऐसे विवादित पोस्टरों को तत्काल हटाने और लगाने वालों पर विधिक कार्रवाई की मांग की है।
- राजनीतिक हमलों का नया हथियार बना 'पोस्टर वॉर'
उत्तर प्रदेश की राजनीति में पोस्टरों के जरिए एक-दूसरे पर तंज कसना और तीखे आरोप लगाना कोई नई परिपाटी नहीं है। बीते कुछ महीनों में लखनऊ में कई मौकों पर पोस्टर युद्ध देखने को मिला है। कभी सत्ता पक्ष की ओर से 'बंटेंगे तो कटेंगे' जैसे नारों के समर्थन में पोस्टर नजर आए, तो कभी समाजवादी पार्टी के नेताओं की तरफ से 'जुड़ेंगे तो जीतेंगे' और विकास के नारों के जवाबी पोस्टर लगाए गए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि डिजिटल दौर में भी सड़क किनारे लगे बड़े होर्डिंग्स का मनोवैज्ञानिक असर काफी गहरा होता है। ऐसे पोस्टर न केवल आम जनता की नजर में आते हैं, बल्कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर तेजी से वायरल होकर विमर्श की मुख्य धारा बन जाते हैं। अज्ञात निवेदक के नाम से लगाए जाने वाले ये पोस्टर अक्सर दलों को कानूनी जवाबदेही से भी बचाते हैं और राजनीतिक संदेश भी पूरी ताकत से पहुंचा देते हैं।
सार्वजनिक संपत्तियों, बिजली के खंभों या मुख्य चौराहों पर बिना नगर निगम की अनुमति के इस तरह के संवेदनशील और राजनीतिक रूप से प्रेरित होर्डिंग्स लगाना संपत्ति विरूपण निवारण अधिनियम का उल्लंघन माना जाता है।
स्थानीय प्रशासन के सूत्रों के अनुसार, शहर के विभिन्न हिस्सों में बिना अनुमति लगे विज्ञापनों और राजनीतिक होर्डिंग्स की निगरानी की जा रही है। पुलिस यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि यह पोस्टर किस प्रिंटिंग प्रेस से छपवाया गया और इसे लगाने वाले लोग कौन थे। किसी भी प्रकार के सार्वजनिक तनाव या कानून-व्यवस्था की स्थिति से बचने के लिए प्रशासन अलर्ट मोड पर है।
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