सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय का हिंदी अनुवाद जारी, बाल शोषण सामग्री देखना और रखना भी अब दंडनीय अपराध
उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले का हिंदी अनुवाद जारी। बाल यौन शोषण सामग्री डाउनलोड करना और देखना दंडनीय अपराध। इलाहाबाद हाईकोर्ट पोर्टल पर ई-पुस्तिका उपलब्ध।
देश के बच्चों के अधिकारों और इंटरनेट पर उनकी सुरक्षा के लिए नजीर बने एक ऐतिहासिक फैसले को जन-जन तक सुलभ बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा 'जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन अलायन्स बनाम एस. हरीश' मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले का हिंदी अनुवाद ई-पुस्तिका के रूप में प्रकाशित कर दिया गया है। 'ई-पुस्तिका स्वरूप में ऐतिहासिक निर्णय' श्रृंखला के छठवें संस्करण के तहत तैयार की गई यह डिजिटल पुस्तक विधिक शोधार्थियों, अधिवक्ताओं, न्यायिक अधिकारियों और कानून की पढ़ाई कर रहे छात्रों के लिए अत्यंत उपयोगी और ज्ञानवर्धक स्रोत साबित होगी।
इस महत्वपूर्ण फैसले में शीर्ष अदालत ने यह व्यवस्था दी है कि बाल यौन शोषण से संबंधित अश्लील सामग्री को केवल डाउनलोड करना, देखना या किसी भी रूप में अपने पास सहेजना भारतीय दंड विधान के तहत एक संज्ञेय और गंभीर अपराध है। तत्कालीन मुख्य न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया था, जिसमें कहा गया था कि ऐसी सामग्री को केवल देखना या संचित करना अपराध नहीं है जब तक कि उसे आगे किसी अन्य व्यक्ति को न भेजा जाए। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी की थी कि इस प्रकार का संकीर्ण दृष्टिकोण बच्चों की सुरक्षा के लिए बने कानूनों की आत्मा को चोट पहुंचाता है और ऐसे घिनौने अपराधों को सामान्य बनाने का काम करता है।
सर्वोच्च न्यायालय ने इस निर्णय के माध्यम से कानूनी और प्रशासनिक व्यवस्था के लिए व्यापक दिशा-निर्देश भी तय किए। न्यायालय ने निर्देशित किया कि विधिक प्रक्रियाओं, अदालती आदेशों और निर्णयों में पुराने अश्लीलता संबंधी शब्दों के स्थान पर 'बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार सामग्री' शब्द का ही औपचारिक उपयोग किया जाए। इसके साथ ही पीड़ित बच्चों को तत्काल सहायता सेवाएं, संवेदनशील आयु वर्ग के लिए व्यापक शिक्षा कार्यक्रम, दोषियों के लिए प्रभावी सुधार प्रक्रियाएं तथा समाज में जागरूकता बढ़ाने के लिए व्यापक अभियान चलाने के निर्देश दिए गए। न्यायालय ने केंद्र सरकार को एक विशेषज्ञ समिति गठित करने और संसद को कानून के प्रासंगिक प्रावधानों में आवश्यक सुधार करने पर विचार करने का भी सुझाव दिया।
यह हिंदी अनुवाद परियोजना मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली के मार्गदर्शन में सुवास प्रकोष्ठ प्रयागराज और लखनऊ की एआई असिस्टेड लीगल ट्रांसलेशन एडवाइजरी समिति द्वारा संचालित की जा रही है। इस अनुवाद समिति में न्यायमूर्ति अजित कुमार, न्यायमूर्ति समीर जैन, न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान और न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह शामिल हैं। इस महत्वपूर्ण प्रकाशन की प्रस्तावना न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी द्वारा लिखी गई है, जिन्होंने पूर्व में एक अधिवक्ता के रूप में बच्चों के संरक्षण और अधिकारों के लिए इस प्रकरण में प्रभावी पैरवी की थी।
न्यायिक निर्णयों की भाषा को आमजन और क्षेत्रीय भाषाभाषी कानूनी जानकारों के लिए सुलभ बनाने के उद्देश्य से यह पहल की गई है। इच्छुक पाठक और कानून के अध्येता इस पूरी ई-पुस्तिका को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर ई-निर्णय पत्रिका अनुभाग से पूरी तरह निशुल्क डाउनलोड कर अध्ययन कर सकते हैं।
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