Supreme Court on Hindi: 'ऐसा नहीं हो सकता कि तमिलनाडु में हिंदी न पढ़ाई जाए', सुप्रीम कोर्ट की राज्य सरकार को दो टूक

तमिलनाडु में हिंदी पढ़ाने से जुड़े मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। जस्टिस नागरत्ना की बेंच ने कहा कि तमिलनाडु की धरती पर हिंदी न पढ़ाई जाए, ऐसा संभव नहीं है।

By INA News Desk
Sep 17, 2026 - 17:45
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Supreme Court on Hindi: 'ऐसा नहीं हो सकता कि तमिलनाडु में हिंदी न पढ़ाई जाए', सुप्रीम कोर्ट की राज्य सरकार को दो टूक
  • Supreme Court on Hindi: 'ऐसा नहीं हो सकता कि तमिलनाडु में हिंदी न पढ़ाई जाए', सुप्रीम कोर्ट की राज्य सरकार को दो टूक
  • Tamil Nadu Hindi Language Row: जस्टिस नागरत्ना की तल्ख टिप्पणी 'सोच बदलनी होगी, हिंदी से परहेज मुमकिन नहीं'
  • सुप्रीम कोर्ट में भाषा विवाद पर अहम सुनवाई: तमिलनाडु सरकार की याचिका पर अदालत सख्त, शिक्षा नीति और हिंदी पर उठाया सवाल
  • SC Hearing on Hindi Teaching: तमिलनाडु में भाषा नीति पर सुप्रीम कोर्ट की दो टूक, कहा- भाषाई संकीर्णता से बाहर निकलना जरूरी

 By Vijay Laxmi Singh (Editor- In- Chief)

नई दिल्ली। देश में लंबे समय से भाषाई अस्मिता और शिक्षा प्रणाली में भाषाओं के चयन को लेकर जारी बहस के बीच भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अत्यंत स्पष्ट और सख्त रुख अख्तियार किया है। तमिलनाडु में हिंदी भाषा के अध्ययन-अध्यापन और शिक्षा नीति से जुड़े एक कानूनी मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने तल्ख मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा कतई नहीं हो सकता कि तमिलनाडु की धरती पर हिंदी न पढ़ाई जाए। पीठ ने राज्य की व्यवस्था को अपनी पारंपरिक सोच में बदलाव लाने की दो टूक हिदायत दी।

सर्वोच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष जब राज्य सरकार से जुड़े नीतिगत संदर्भ और भाषा संबंधी आपत्तियों की दलीलें रखी जा रही थीं, तब अदालत ने भाषाई समावेशिता और देश के संघीय ताने-बाने को ध्यान में रखते हुए गंभीर टिप्पणियां कीं। अदालत के इस मौखिक अवलोकन ने राष्ट्रीय स्तर पर एक बार फिर भाषा नीति, त्रि-भाषा सूत्र (Three-Language Formula) और विभिन्न राज्यों के भीतर अन्य भारतीय भाषाओं को सीखने की स्वतंत्रता पर व्यापक कानूनी व सामाजिक बहस को हवा दे दी है।

  • सुनवाई के दौरान अदालत की तीखी टिप्पणी

मामले की सुनवाई के दौरान पीठ ने याचिकाकर्ता और संबंधित पक्षों की दलीलों को सुनते हुए राज्य में अन्य भाषाओं, विशेषकर हिंदी के प्रति अपनाए जाने वाले प्रशासनिक दृष्टिकोण पर सवाल उठाए। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने सुनवाई कक्ष में स्पष्ट शब्दों में कहा कि दृष्टिकोण में लचीलापन और खुलापन होना समय की मांग है।

पीठ ने टिप्पणी की कि किसी भी क्षेत्र या राज्य को केवल भाषाई आग्रह के आधार पर किसी प्रमुख भारतीय भाषा के शिक्षण से पूरी तरह विमुख नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा, 'आपको अपनी सोच बदलनी होगी; ऐसा नहीं हो सकता कि तमिलनाडु की धरती पर हिंदी न पढ़ाई जाए।' पीठ का स्पष्ट आशय यह था कि भारत जैसे विविधतापूर्ण राष्ट्र में विद्यार्थियों और नागरिकों को व्यापक अवसर प्रदान करने के लिए भाषा सीखने के विकल्पों को अवरुद्ध नहीं किया जाना चाहिए।

  • तमिलनाडु में भाषा का ऐतिहासिक और नीतिगत विवाद

तमिलनाडु में भाषा का मुद्दा दशकों से अत्यंत संवेदनशील और राजनीतिक रूप से गहरा प्रभाव रखने वाला विषय रहा है। राज्य में वर्ष 1968 से ही द्वि-भाषा नीति (Two-Language Formula) लागू है, जिसके तहत सरकारी और अधिकांश सहायता प्राप्त विद्यालयों में केवल तमिल और अंग्रेजी भाषा के माध्यम से ही अध्ययन की अनुमति दी जाती रही है।

केंद्र सरकार की राष्ट्रीय शिक्षा नीतियों में हमेशा से त्रि-भाषा सूत्र की वकालत की जाती रही है, जिसमें मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा के अलावा हिंदी और अंग्रेजी (या किसी अन्य आधुनिक भारतीय भाषा) को शामिल करने का प्रस्ताव होता है। हालांकि, तमिलनाडु की विभिन्न राजनीतिक ताकतें और सत्तासीन सरकारें हमेशा से हिंदी को 'थोपे जाने' का आरोप लगाकर इसका कड़ा विरोध करती आई हैं। राज्य का यह तर्क रहा है कि दो भाषाएं मातृभाषा के रूप में तमिल और वैश्विक संपर्क के लिए अंग्रेजी विद्यार्थियों के समग्र विकास के लिए पर्याप्त हैं।

  • अदालत के रुख के संवैधानिक और व्यावहारिक मायने

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी औपचारिक आदेश का हिस्सा भले न हो, लेकिन यह देश की शीर्ष न्यायपालिका के उस दृष्टिकोण को रेखांकित करती है जो नागरिकों की भाषाई गतिशीलता को बढ़ावा देता है।

संविधान के तहत प्रत्येक नागरिक को देश के किसी भी हिस्से में निवास करने, शिक्षा प्राप्त करने और रोजगार तलाशने का मूल अधिकार प्राप्त है। अदालत के अवलोकन के पीछे यह अंतर्निहित तर्क देखा जा रहा है कि यदि किसी राज्य में कोई छात्र या नागरिक स्वेच्छा से हिंदी या अन्य कोई भारतीय भाषा सीखना चाहता है, तो राज्य की नीति उसमें अवरोधक नहीं बननी चाहिए। दूसरे राज्यों से आने वाले केंद्रीय कर्मचारियों के बच्चों, निजी शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों और उच्च शिक्षा व राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं के लिए बहु-भाषाई वातावरण को अदालत अत्यंत उपयोगी मानती है।

  • विद्यार्थियों के भविष्य और रोजगार का सवाल

इस मामले में केवल राजनीतिक अस्मिता ही नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के करियर और पेशेवर अवसरों का पक्ष भी प्रमुखता से जुड़ता है। आज देश के विभिन्न महानगरों, आईटी हब्स, विनिर्माण केंद्रों और केंद्रीय सेवाओं में अंतरराज्यीय आवागमन सामान्य बात हो चुका है। ऐसे में भाषा की बाध्यता को शिथिल करने की मांग कई अभिभावक संघों और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा उठाई जाती रही है।

याचिका के संदर्भ में यह बात भी रेखांकित की गई कि निजी संस्थानों में जहां सीबीएसई या आईसीएसई पाठ्यक्रम के तहत हिंदी का विकल्प मिलता है, वहीं राज्य बोर्ड के कई विद्यालयों में संसाधन और शिक्षकों के अभाव या नीतिगत प्रतिबंध के चलते छात्रों के पास यह विकल्प उपलब्ध नहीं रहता। अदालत की मौखिक प्रतिक्रिया ने इसी विषमता की ओर ध्यान आकर्षित किया है।

सर्वोच्च न्यायालय की इस सख्त टिप्पणी के बाद अब राज्य प्रशासन और विधिक प्रतिनिधियों के अगले कदमों पर पूरे देश की निगाहें टिक गई हैं। कानूनी हलकों में यह देखना दिलचस्प होगा कि राज्य सरकार अदालत की इस चिंता पर क्या आधिकारिक हलफनामा या स्पष्टीकरण प्रस्तुत करती है।

जहां एक ओर राज्य सरकार अपनी भाषाई स्वायत्तता और विधानमंडल द्वारा पारित ऐतिहासिक नीतियों के आधार पर अपना पक्ष रख सकती है, वहीं शीर्ष अदालत का यह स्पष्ट संदेश है कि संघीय ढांचे में राष्ट्रीय समन्वय, आपसी भाषाई समझ और विद्यार्थियों के व्यापक हित को किसी भी संकीर्ण दायरे में सीमित नहीं किया जा सकता। इस मामले में आगामी सुनवाई के दौरान विस्तृत कानूनी विमर्श होने की पूरी संभावना है।

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