Balvatika UP: 3 से 6 वर्ष के बच्चों की मजबूत होगी शैक्षिक नींव, योगी सरकार ने बालवाटिकाओं को पूरी तरह क्रियाशील करने के दिए निर्देश
उत्तर प्रदेश में 3 से 6 वर्ष के बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा सुदृढ़ करने के लिए बालवाटिकाओं को पूरी तरह क्रियाशील किया जाएगा। 4 लर्निंग कॉर्नर, 70% उपस्थिति और ईसीसीई कोर ग्रुप के गठन के आदेश जारी।
- UP Pre Primary Education: आंगनबाड़ी केंद्रों में 3 घंटे का विशेष गतिविधि सत्र, हर बालवाटिका में विकसित होंगे 4 लर्निंग कॉर्नर
- NEP 2020 Uttar Pradesh: बालवाटिकाओं में 'जादुई पिटारा' और चहक से होगी पढ़ाई, 200 मीटर के दायरे वाले केंद्र प्राथमिक स्कूलों में होंगे शिफ्ट
- Basic Education Department UP: परिषदीय स्कूलों में प्री-प्राइमरी शिक्षा पर कड़ा फोकस, ईसीसीई कोर ग्रुप करेगा उपस्थिति व गुणवत्ता की निगरानी
लखनऊ। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 (एनईपी) की प्राथमिकताओं के अनुरूप उत्तर प्रदेश सरकार ने 3 से 6 वर्ष के आयुवर्ग के बच्चों के समग्र बौद्धिक, मानसिक और शारीरिक विकास के लिए राज्य की बालवाटिकाओं को पूरी तरह क्रियाशील बनाने का निर्णय लिया है। बेसिक शिक्षा विभाग का उद्देश्य प्राथमिक विद्यालयों की पहली कक्षा में औपचारिक प्रवेश से पूर्व बच्चों के भीतर भाषा, प्रारंभिक साक्षरता, संख्याज्ञान और सामाजिक-संवेगात्मक दक्षताओं की मजबूत बुनियाद तैयार करना है।
इस संबंध में शासन स्तर से विस्तृत नीतिगत दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। अपर मुख्य सचिव, बेसिक एवं माध्यमिक शिक्षा पार्थ सारथी सेन शर्मा की ओर से प्रदेश के सभी मंडलायुक्तों, जिलाधिकारियों, उप शिक्षा निदेशकों, डायट प्राचार्यों, जिला बेसिक शिक्षा अधिकारियों (बीएसए) और जिला कार्यक्रम अधिकारियों (डीपीओ) को आदेश प्रेषित कर बालवाटिकाओं के प्रभावी संचालन को सर्वोच्च प्राथमिकता पर रखने को कहा गया है।
खेल और गतिविधि आधारित होगी पढ़ाई, 3 घंटे का अनिवार्य कार्यक्रम
जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, परिषदीय प्राथमिक विद्यालय परिसरों में संचालित सह-अवस्थित (को-लोकेटेड) आंगनबाड़ी केंद्रों को पूर्ण बालवाटिका के रूप में व्यवस्थित किया जाएगा। इन बालवाटिकाओं में बच्चों के बैठने के लिए सुरक्षित, स्वच्छ और बालमैत्री कक्षा-कक्ष उपलब्ध कराए जाएंगे।
प्रत्येक बालवाटिका में आंगनबाड़ी कार्यकत्री, ईसीसीई एजुकेटर और विद्यालय के प्री-प्राइमरी नोडल अध्यापक के संयुक्त सहयोग से प्रतिदिन न्यूनतम तीन घंटे का समयबद्ध गतिविधि आधारित सत्र अनिवार्य रूप से संचालित होगा। यह शिक्षण प्रक्रिया किसी पारंपरिक पाठ्यक्रम की तरह रटने पर आधारित नहीं होगी, बल्कि खेल, संवाद, अभिनय और संगीत के माध्यम से संचालित की जाएगी। विभाग द्वारा विकसित दक्षता आधारित वार्षिक व मासिक कैलेंडर के अनुसार दैनिक गतिविधियों का संचालन होगा और उस कैलेंडर को बालवाटिका की दीवार पर प्रमुखता से चस्पा किया जाएगा ताकि अभिभावक भी जान सकें कि उनके बच्चे क्या सीख रहे हैं।
हर बालवाटिका में बनेंगे 4 लर्निंग कॉर्नर
नन्हे बच्चों की सीखने की जिज्ञासा को प्रोत्साहित करने के लिए प्रत्येक बालवाटिका कक्ष में चार विशिष्ट 'लर्निंग कॉर्नर' (सीखने के कोने) स्थापित किए जाएंगे:
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ब्लॉक कॉर्नर: जहां विभिन्न आकृतियों, रंगों और लकड़ी या प्लास्टिक के ब्लॉकों से बच्चे संरचनाएं बनाकर स्थानिक और गणितीय समझ विकसित करेंगे।
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पुस्तक कॉर्नर (रीडिंग कॉर्नर): सचित्र, रंगीन और बड़े अक्षरों वाली बाल कहानियां, जिनसे बच्चों में पुस्तकों को पलटने और चित्रों के माध्यम से कहानी समझने की आदत पड़े।
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कला एवं क्राफ्ट कॉर्नर: क्ले मॉडलिंग, कागज की कलाकृतियां, चित्रकला और रंग भरने के साधन, जिससे बच्चों की उंगलियों की मांसपेशियां मजबूत हों।
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प्रदर्शन व नाटक कॉर्नर: मुखौटे, कठपुतलियां और घरेलू खिलौने, जिनके माध्यम से बच्चे सामाजिक भूमिकाओं का अभिनय कर अपने संवेगात्मक विकास को गति दे सकें।
इसके साथ ही, राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एससीईआरटी) द्वारा तैयार विशेष अध्ययन किट जैसे 'चहक-1, 2, 3', 'कदम' और 'कलांकुर' अभ्यास पुस्तिकाओं का शत-प्रतिशत उपयोग सुनिश्चित कराया जाएगा। बच्चों के खिलौनों के लिए 'जादुई पिटारा' (वंडर बॉक्स), प्रिंट-रिच वातावरण, बालमैत्री फर्नीचर, सुरक्षित आउटडोर खेल सामग्री तथा छोटे बच्चों के अनुकूल हैंडवॉश यूनिट और शौचालयों की व्यवस्था अनिवार्य की गई है।
70 प्रतिशत उपस्थिति और 100 प्रतिशत नामांकन का लक्ष्य
शासनादेश में स्पष्ट किया गया है कि विद्यालय के सेवित क्षेत्र (कैचमेंट एरिया) में रहने वाले 3 से 6 वर्ष के सभी बच्चों का चिन्हीकरण कर उनका शत-प्रतिशत नामांकन बालवाटिका में कराया जाए। केवल नाम दर्ज करना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि नियमित रूप से न्यूनतम 70 प्रतिशत औसत उपस्थिति दर्ज कराना अनिवार्य होगा।
इस उपस्थिति लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक, आंगनबाड़ी कार्यकत्री, आशा बहू, महिला एवं बाल विकास विभाग की सुपरवाइजर और संबंधित खंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) मिलकर काम करेंगे। बच्चों के विकास का निरंतर रिकॉर्ड रखने के लिए एक 'समग्र प्रगति पत्र' तैयार होगा, जिसकी समीक्षा वर्ष में कम से कम दो बार अभिभावक-शिक्षक बैठक में साझा की जाएगी।
जिला स्तर पर ईसीसीई कोर ग्रुप रखेगा नजर
बालवाटिकाओं की गुणवत्ता, मॉनिटरिंग और विभागों के बीच आपसी समन्वय को सुदृढ़ रखने के लिए प्रत्येक जिले में 'प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा' (ईसीसीई) कोर ग्रुप का गठन किया जाएगा।
इस कोर ग्रुप में समग्र शिक्षा के जिला समन्वयक (प्रशिक्षण/निपुण), डायट के नामित विशेषज्ञ, राज्य संदर्भ समूह (एसआरजी), अकादमिक रिसोर्स पर्सन (एआरपी), शिक्षक संकुल और बाल विकास परियोजना अधिकारी (सीडीपीओ) शामिल होंगे।
यह कोर ग्रुप न केवल शैक्षणिक सामग्री और शिक्षकों के क्षमता संवर्धन (ट्रेनिंग) की निगरानी करेगा, बल्कि उन सभी आंगनबाड़ी केंद्रों के स्थानांतरण पर भी सीधी नजर रखेगा जो वर्तमान में विद्यालयों के 200 मीटर के दायरे में किसी किराए के या गैर-विभागीय भवन में चल रहे हैं। ऐसे सभी केंद्रों को प्राथमिकता के आधार पर प्राथमिक विद्यालय परिसर के सुरक्षित भवनों में स्थानांतरित कराया जाएगा।
प्राथमिक शिक्षा में बदलाव की मजबूत नींव
बेसिक शिक्षा विभाग का मानना है कि औपचारिक स्कूली शिक्षा शुरू करने से पहले यदि बच्चे का मानसिक और शारीरिक विकास वैज्ञानिक पद्धति से हो, तो कक्षा-1 में पहुंचने पर बच्चों में स्कूल छोड़ने (ड्रॉपआउट) की प्रवृत्ति पूरी तरह समाप्त हो जाती है। बालवाटिकाओं का यह पुनर्गठन प्रदेश के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों को भी आधुनिक निजी प्री-स्कूलों जैसी सुविधाएं और सीखने का माहौल निःशुल्क उपलब्ध कराएगा।
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