UP Hemp Fiber Export: 100 टन पराली और कृषि कचरे से बना हाई-ग्रेड टेक्सटाइल फाइबर, अब अमेरिका और दक्षिण कोरिया पहुंचेगा यूपी का हेम्प
संभल के स्टार्टअप ने 100 टन भांग (हेम्प) के कृषि अवशेष से हाई-ग्रेड टेक्सटाइल धागा तैयार किया है। यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो में अमेरिका और दक्षिण कोरिया को निर्यात के लिए एमओयू हुआ है।
खेती-किसानी में फसल अवशेषों (पराली) को जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण और पर्यावरणीय संकट के बीच उत्तर प्रदेश के एक युवा कृषि स्टार्टअप ने नवाचार की अनूठी मिसाल कायम की है। संभल जनपद की कृषि-प्रौद्योगिकी इकाई 'भारत हेम्प एग्रो' ने लगभग 100 टन भांग (इंडस्ट्रियल हेम्प) के अनुपयोगी कृषि अवशेषों और डंठलों को उन्नत प्रसंस्करण तकनीक के माध्यम से प्रीमियम 'हाई-ग्रेड टेक्सटाइल फाइबर' में रूपांतरित करने में ऐतिहासिक सफलता हासिल की है।
ग्रेटर नोएडा स्थित इंडिया एक्सपो सेंटर एंड मार्ट में आयोजित 'उत्तर प्रदेश इंटरनेशनल ट्रेड शो-2026' (UPITS) के मंच से इस स्वदेशी नवाचार को वैश्विक पहचान मिली है। कंपनी ने अपने पर्यावरण-अनुकूल हेम्प फाइबर की वाणिज्यिक आपूर्ति के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएसए) और दक्षिण कोरिया के प्रमुख टेक्सटाइल व परिधान विनिर्माताओं के साथ निर्यात के औपचारिक सहमति पत्रों (MoUs) पर हस्ताक्षर किए हैं। यह सफलता दर्शाती है कि उत्तर प्रदेश का कृषि क्षेत्र अब पारंपरिक उपजों से आगे बढ़कर वैश्विक हरित फैशन (सस्टेनेबल फैशन) की आपूर्ति श्रृंखला का केंद्र बन रहा है।
2021 में हुई शुरुआत: कचरे से वैश्विक ब्रांड तक की यात्रा
भारत हेम्प एग्रो के संस्थापक आयुष सिंह ने अपनी उद्यमशीलता यात्रा का ब्योरा साझा करते हुए बताया कि इस परियोजना की परिकल्पना वर्ष 2021 में शुरू की गई थी। पारंपरिक रूप से औद्योगिक हेम्प की खेती के बाद उसके रेशेदार तने और अवशेष या तो खेतों में जला दिए जाते थे या कचरे के रूप में फेंक दिए जाते थे।
कंपनी ने शोध एवं विकास (R&D) के जरिए इन डंठलों से लिग्निन को अलग कर उच्च गुणवत्ता वाला रेशा (फाइबर) निकालने की स्वदेशी तकनीक विकसित की। परीक्षणों में यह साबित हुआ कि हेम्प से बना कपड़ा प्राकृतिक रूप से एंटीफंगल (फफूंद-रोधी) और एंटीबैक्टीरियल (जीवाणुरोधी) गुणों से युक्त होता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पारंपरिक कपास (कॉटन) की तुलना में हेम्प फाइबर के विनिर्माण में 70 प्रतिशत तक कम जल की खपत होती है, जिससे यह पर्यावरण और जल संरक्षण की दृष्टि से भविष्य का सबसे टिकाऊ कपड़ा माना जा रहा है।
1,000 किसानों की आमदनी दोगुनी, 3,000 परिवारों को सहारा
इस नवाचार का सबसे बड़ा सामाजिक और आर्थिक प्रभाव ग्रामीण स्तर पर देखने को मिला है। आयुष सिंह के अनुसार, संभल और आसपास के जनपदों के करीब एक हजार किसानों से सीधे हेम्प के कृषि अवशेषों की खरीद की जा रही है। जिस बायोमास का किसानों को पहले शून्य मूल्य मिलता था, अब उसके एवज में उन्हें अतिरिक्त वित्तीय आय प्राप्त हो रही है, जिससे इन किसानों की शुद्ध आय लगभग दोगुनी हो गई है।
इसके साथ ही, कच्चे माल के एकत्रीकरण, प्राथमिक छंटाई, बंडलिंग और परिवहन की संपूर्ण आपूर्ति श्रृंखला के माध्यम से लगभग 3,000 ग्रामीण परिवारों को स्थानीय स्तर पर नियमित रोजगार और आजीविका सहायता उपलब्ध हो रही है।
सरकारी नीतियों और वित्तीय अनुदान से मिली गति
स्टार्टअप की इस तेज प्रगति में केंद्र और राज्य सरकार की अनुकूल नीतियों ने उत्प्रेरक का काम किया है। उद्यम को प्रारंभिक चरण में उत्तर प्रदेश सरकार की 'प्रोटोटाइप डेवलपमेंट ग्रांट' और भारत सरकार की 'नेशनल एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर स्कीम' (एआईएफ) के तहत वित्तीय संबल प्राप्त हुआ।
संस्थापक ने रेखांकित किया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश में सूक्ष्म और कृषि आधारित उद्यमों के लिए जो सहायक तंत्र तैयार हुआ है, उसी का परिणाम है कि स्थानीय उत्पाद अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो जैसे मंचों पर लगातार भागीदारी से उन्हें विदेशी बायर्स से सीधा संवाद स्थापित करने का अवसर मिला, जिससे अब अंतरराष्ट्रीय निर्यात का मार्ग पूरी तरह प्रशस्त हो चुका है।
चीन के एकाधिकार को सीधी चुनौती
आयुष सिंह ने बताया कि भारत में औद्योगिक हेम्प उत्पादन की असीम भौगोलिक संभावनाएं होने के बावजूद घरेलू कपड़ा उद्योग लंबे समय से हेम्प आधारित फैब्रिक और यार्न के लिए चीन से होने वाले आयात पर निर्भर था।
केंद्रीय वस्त्र मंत्रालय द्वारा अपनी 'न्यू एज फाइबर पॉलिसी' के तहत हेम्प को संबद्ध प्राकृतिक रेशे (एलाइड फाइबर) के रूप में औपचारिक मान्यता दिए जाने के बाद इस क्षेत्र में घरेलू विनिर्माण को कानूनी और नीतिगत बल मिला है। संभल की इस इकाई द्वारा बड़े पैमाने पर फाइबर उत्पादन और अमेरिका व दक्षिण कोरिया को निर्यात का यह कदम भारत को तकनीकी और टिकाऊ वस्त्र उद्योग में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगा।
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